योना 2
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
योना अब कहाँ है? एक बड़ी मछली के पेट के अंदर, गहरे समुद्र में, अंधेरे में। यह वही योना है जो परमेश्वर की आज्ञा से भाग रहा था, जो जहाज़ पर सोता रहा जब तूफान आया, जिसे नाविकों ने समुद्र में फेंक दिया था। अब वह पूरी तरह अकेला है, और वहीं से वह प्रार्थना करता है।
योना 2 में हम पढ़ते हैं कि उसने अपने परमेश्वर यहोवा से पुकार कर कहा, "मैंने संकट में पड़े हुए यहोवा की दुहाई दी, और उसने मेरी सुन ली है।" वह याद करता है कि पानी ने उसे कैसे घेर लिया था, लहरें उसके ऊपर से बहती गईं, समुद्री घास उसके सिर में लिपट गई। वह कहता है कि वह पहाड़ों की जड़ तक पहुँच गया था, यानी वह जगह जहाँ से लौटना नामुमकिन लगता है।
लेकिन ठीक वहीं, उस गहराई में, वह कुछ याद करता है। वह कहता है, "जब मैं मूर्छा खाने लगा, तब मैंने यहोवा को स्मरण किया।" और फिर वह भरोसे से कहता है कि परमेश्वर ने उसके प्राणों को गड्ढे में से उठाया है। अंत में वह वादा करता है कि वह धन्यवाद के साथ बलिदान चढ़ाएगा, और कहता है, "उद्धार यहोवा ही से होता है।" फिर यहोवा मछली को आज्ञा देते हैं, और वह योना को सूखी ज़मीन पर उगल देती है।
इसका अर्थ क्या है?
यह अध्याय एक प्रार्थना है, लेकिन यह कोई सुंदर, आसान प्रार्थना नहीं है। यह किसी ऐसे व्यक्ति की प्रार्थना है जो सच में डूब रहा था, जिसने सोचा था कि अब सब खत्म हो गया है। ध्यान दें, योना यह नहीं कहता कि "मैंने कोई गलती नहीं की।" वह अपनी हालत को साफ़ शब्दों में बताता है, अंधेरा, पानी, डर। और फिर भी वह परमेश्वर की ओर मुँह करता है, न कि किसी और दिशा में।
यह हमें कुछ गहरी बात सिखाता है। योना ने भागने की कोशिश की थी, फिर भी परमेश्वर ने उसे नहीं छोड़ा। यह ऐसा नहीं है कि योना ने अपने आप को बचाया, बल्कि उसने पुकारा और परमेश्वर ने सुना। पद 9 में एक वाक्य है जो पूरी किताब का दिल है, "उद्धार यहोवा ही से होता है।" उद्धार यानी बचाया जाना, छुटकारा पाना। योना यह समझ गया कि वह खुद अपनी जान नहीं बचा सकता था। सिर्फ परमेश्वर बचा सकते हैं।
बड़ी कहानी से जुड़ाव
क्या आपने कभी सोचा है कि तीन दिन और तीन रात मछली के पेट में, फिर बाहर आना, कैसा लगता है? यीशु मसीह ने खुद एक बार योना का ज़िक्र किया और कहा कि जैसे योना तीन दिन मछली के पेट में रहा, वैसे ही वे भी तीन दिन कब्र में रहेंगे, फिर से जी उठेंगे। योना की कहानी एक तरह से आगे की ओर इशारा करती है, उस दिन की ओर जब यीशु मसीह सच में मर गए और सच में फिर जी उठे, ताकि हम बचाए जा सकें।
योना का "गड्ढे में से उठाया जाना" एक छोटी सी झलक है उस बड़े उद्धार की, जो परमेश्वर बाद में यीशु मसीह के द्वारा पूरी दुनिया के लिए करेंगे। यह वादा जो परमेश्वर ने हमेशा रखा है, कि वे अपने लोगों को नहीं छोड़ते, चाहे वे कितनी भी गहराई में गिर जाएँ।
आपके लिए
कभी-कभी हम भी ऐसा महसूस करते हैं जैसे हम "गहरे सागर" में हैं, अकेले, डरे हुए, शायद अपनी ही गलती की वजह से वहाँ पहुँचे। योना की प्रार्थना हमें दिखाती है कि हमें अपनी हालत छुपाने की ज़रूरत नहीं है। परमेश्वर के सामने ईमानदार होना ठीक है, यह कहना ठीक है, "मैं डरा हुआ हूँ" या "मैंने गलती की है।"
लेकिन योना यह भी दिखाता है कि अंधेरे में भी परमेश्वर को याद करना संभव है। शायद आज आपकी ज़िंदगी में कोई कठिन जगह है, जहाँ आपको लगता है कि कोई आपकी नहीं सुन रहा। योना की तरह, आप भी पुकार सकते हैं, और भरोसा रख सकते हैं कि परमेश्वर सुनते हैं, चाहे उत्तर कैसे और कब आए, यह हम नहीं जानते।
आपस में बात करें
योना ने अपनी गलती के बारे में सीधे कुछ नहीं कहा, फिर भी परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना सुनी। इसके बारे में आप क्या सोचते हैं?
क्या आपको कभी ऐसा लगा है कि आप किसी "गहरे सागर" में हैं? उस समय आपने क्या किया?
साथ में प्रार्थना
प्रिय परमेश्वर, धन्यवाद कि आप तब भी सुनते हैं जब हम अंधेरे में होते हैं। जब हमें लगे कि हम डूब रहे हैं, हमें याद दिलाइए कि हम आपकी ओर पुकार सकते हैं। धन्यवाद कि उद्धार आपसे ही आता है, और धन्यवाद कि आपने यीशु मसीह के द्वारा हमें बचाया है। आमीन।
योना 2 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
योना 2 किस विषय में है?
योना 2 क्या कहता है?
योना 2 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे योना 2 से क्या सीख सकते हैं?
योना 2 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
मछली के पेट के अँधेरे में योना कहता है, "जो व्यर्थ मूरतों पर मन लगाते हैं, वे अपने करुणानिधान को छोड़ देते हैं।" पर सोच, यह बात वह अपने ही बारे में कह रहा है। उसकी मूरत पत्थर की नहीं थी, उसकी अपनी ज़िद थी, यह सोच कि नीनवे दया के लायक नहीं। तेरी वह ज़िद कौन सी है, जो तुझे परमेश्वर की करुणा से दूर खींच रही है?
मछली के पेट में बैठकर योना कहता है, "मैंने अपने संकट के कारण यहोवा की दुहाई दी, और उसने मेरी सुन ली।" ध्यान दे, वह अभी बाहर नहीं आया है। हालात नहीं बदले, पर वह जानता है कि उसकी आवाज़ सुनी गई। कभी-कभी परमेश्वर का पहला उत्तर बाहर निकलना नहीं, बल्कि यह भरोसा होता है कि अंधेरे में भी तेरी पुकार अनसुनी नहीं गई। तू अभी किस पेट के भीतर से पुकार रहा है?
मछली के पेट में, अंधेरे में, योना कहता है, "जब मेरा प्राण मूर्छित होने लगा, तब मैंने यहोवा को स्मरण किया।" ध्यान दे, उसे परमेश्वर तब याद आया जब सब खत्म होने लगा। शर्म की बात? हो सकता है। पर देख, वहाँ से उठी प्रार्थना भी मंदिर तक पहुँच गई। तेरी देर से की गई पुकार भी उसके कानों तक पहुँचती है।
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