विलापगीत 2
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
एक बार यरूशलेम शहर बहुत सुंदर था। उसकी दीवारें ऊँची थीं, उसका मंदिर चमकता था। पर अब? यरूशलेम टूट चुका है। दुश्मन आए, शहरपनाह गिरा दी, फाटक तोड़ डाले। विलापगीत 2 में यह बताया गया है कि जब परमेश्वर के लोगों ने बार-बार उनकी बात नहीं मानी, तो परमेश्वर ने उन्हें सज़ा दी। यह पढ़ना कठिन है, पर सच है।
लेखक कहता है, "यहोवा ने सिय्योन की पुत्री को कोप के बादलों से ढाँप दिया है।" जैसे कोई किला गिरा दिया जाता है, वैसे ही मंदिर और महल गिरा दिए गए। राजा और याजक दोनों को अपमान सहना पड़ा। भविष्यद्वक्ता, जो परमेश्वर की बातें सुनाते थे, अब कुछ नहीं सुन पा रहे थे।
पर सबसे दुखद बात कुछ और है। शहर के चौकों में छोटे बच्चे भूख से बेहोश हो रहे हैं। वे अपनी माँ से पूछते हैं, "अन्न और दाखमधु कहाँ हैं?" और फिर वे अपनी माँ की गोद में ही दम तोड़ देते हैं। क्या तुमने कभी किसी को इतना भूखा देखा है? लेखक की आँखों से आँसू बहते हैं, वह कहता है, "मेरी आँखें आँसू बहाते-बहाते धुँधली पड़ गई हैं।"
शहर के पास से गुज़रने वाले लोग हँसते हैं और ताली बजाते हैं। वे कहते हैं, "क्या यह वही नगरी है जिसे परम सुन्दरी कहते थे?" दुश्मन खुश होते हैं, दाँत पीसते हैं। यह देखना कितना दुखद रहा होगा, अपने ही घर को इस तरह गिरता देखना।
फिर भी लेखक हार नहीं मानता। वह परमेश्वर की ओर मुड़ता है और कहता है, "हे सिय्योन की पुत्री, अपने आँसू रात दिन नदी के समान बहाती रह। प्रभु के सम्मुख अपने मन की बातों को धारा के समान उण्डेल।" वह परमेश्वर से पुकारता है, "हे यहोवा दृष्टि कर, और देख।" रोना भी एक तरह की प्रार्थना है।
इसका क्या अर्थ है?
यह कहानी हमें बताती है कि परमेश्वर की बातें हल्के में नहीं ली जा सकतीं। जब परमेश्वर के लोग बार-बार अपनी मनमानी करते रहे, तो इसके नतीजे आए। परमेश्वर खिलौना नहीं हैं जिनसे खेला जाए। पर ध्यान दो, लेखक फिर भी रोते हुए परमेश्वर के पास ही जाता है, कहीं और नहीं। दुख में भी वह जानता है कि परमेश्वर ही सुन सकते हैं।
सम्बन्ध सूत्र
बहुत साल बाद, एक और शहर यरूशलेम पर यीशु मसीह रोए थे। उन्होंने भी उस शहर को देखकर आँसू बहाए, क्योंकि लोग परमेश्वर की बात नहीं सुनना चाहते थे। यीशु मसीह ने खुद वह दुख अपने ऊपर ले लिया, सूली पर। जब यीशु मसीह मरे, तब वे उस सज़ा को अपने ऊपर उठा रहे थे, जो हमारे पापों के कारण हम पर आनी थी। विलापगीत का रोना, यीशु मसीह के दुख की ओर इशारा करता है।
तुम्हारे लिए
जब तुमसे कुछ गलत हो जाए, तो क्या तुम परमेश्वर से दूर भागते हो या उनके पास जाते हो? आज रात सोने से पहले, अगर तुम्हारे मन में कुछ भारी हो, कोई दुख या डर, तो उसे परमेश्वर को बता दो। जैसे लेखक ने अपने आँसू परमेश्वर के सामने उंडेले, वैसे ही तुम भी अपनी बातें उनसे कह सकते हो। वे सुनते हैं।
बातचीत के लिए
अगर तुम उस समय यरूशलेम में होते, तो तुम्हें सबसे ज़्यादा दुख किस बात का होता?
जब तुम्हें कुछ बुरा लगता है, तो तुम परमेश्वर को कैसे बता सकते हो?
साथ में प्रार्थना
हे प्रभु, कभी-कभी हमारे मन में दुख होता है। हमें सिखाइए कि हम अपने आँसू और अपनी बातें आपके सामने ला सकें, जैसे यरूशलेम के लोगों ने की। धन्यवाद कि यीशु मसीह ने हमारे लिए दुख उठाया। हमें अपने पास खींच लीजिए। आमीन।
विलापगीत 2 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
विलापगीत 2 किस विषय में है?
विलापगीत 2 क्या कहता है?
विलापगीत 2 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे विलापगीत 2 से क्या सीख सकते हैं?
विलापगीत 2 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
मेरी आँखें आँसू बहाते-बहाते रह गईं, मेरी अन्तड़ियाँ ऐंठी जाती हैं," यह कोई कविता नहीं, यह शरीर में उतरा हुआ दुःख है। यिर्मयाह रोता है क्योंकि बच्चे गलियों में मूर्छित पड़े हैं। उसने दूर से दुःख नहीं देखा, वह उसमें डूब गया। तेरे आसपास किसी की पीड़ा तुझे कहाँ तक छूती है? क्या तू सचमुच देखता है, या सिर्फ़ जानता है?
तेरे आँसू रात दिन नदी के समान बहते रहें! तू विश्राम न ले।" यरूशलेम की टूटी शहरपनाह से कहा जा रहा है कि रोओ, रुको मत। दुख को जल्दी सँभाल लेने का दबाव यहाँ नहीं है। तेरे आँसू भी प्रार्थना हैं, और वे परमेश्वर के सामने बहते हैं, किसी सूनी दीवार के सामने नहीं।
निश्चय यही वह दिन है जिसकी हम बाट जोहते थे।" शत्रु तेरे गिरने की तारीख पहले से गिन रहे थे। सबसे गहरी चोट यही है, जब तेरा टूटना किसी और का उत्सव बन जाए। पर ध्यान दे, यिर्मयाह इन तानों का जवाब नहीं देता, वह इन्हें परमेश्वर के सामने रख देता है। तेरे ताने सुनने वाला कोई है।
जो पुरनिये कभी नगर के फाटक पर बैठकर न्याय करते थे, वे अब "भूमि पर चुपचाप बैठे हैं।" सलाह देने वाले मुँह के पास कोई शब्द नहीं बचा। कभी दुःख इतना गहरा होता है कि समझदारी भी चुप हो जाती है, और यही ईमानदारी होती है। तेरे जीवन में भी ऐसा कोई कोना है जहाँ जवाब खत्म हो गए हैं? परमेश्वर उस चुप्पी से नहीं डरता। वह धूल में तेरे पास बैठता है।
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