3 से 6 वर्ष के बच्चे के लिए

1 शमूएल 18

नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

एक लड़का था। उसका नाम था दाऊद। दाऊद अभी-अभी एक बड़ी लड़ाई से लौटा था। उसने एक बहुत बड़े आदमी को हराया था। सब लोग खुश थे।

राजा शाऊल के महल में एक और लड़का था। उसका नाम था योनातान। योनातान ने दाऊद को देखा। और जानते हो क्या हुआ? योनातान के दिल में कुछ हुआ। उसे दाऊद बहुत, बहुत अच्छा लगा। जैसे सबसे अच्छा दोस्त।

योनातान ने अपना सुंदर कोट उतारा। और दाऊद को दे दिया। अपनी तलवार भी दे दी। अपना धनुष भी। सब कुछ दे दिया। क्योंकि योनातान दाऊद से बहुत प्यार करता था।

फिर सब औरतें गली में आईं। वे नाच रही थीं। वे गा रही थीं। ढोल बज रहे थे। वे गा रही थीं: "दाऊद ने बहुत सारे दुश्मन हराए!"

पर राजा शाऊल ने यह सुना। और शाऊल को अच्छा नहीं लगा। बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। शाऊल का दिल गुस्से से भर गया।

एक दिन दाऊद वीणा बजा रहा था। बहुत सुंदर संगीत। पर शाऊल के हाथ में भाला था। और शाऊल ने भाला फेंका! दाऊद जल्दी से हट गया। परमेश्वर ने दाऊद को बचाया।

परमेश्वर दाऊद के साथ थे। हर दिन। हर जगह। दाऊद जो भी करता, अच्छा करता। क्योंकि परमेश्वर उसके साथ थे।

इसका क्या मतलब है?

देखो, दाऊद अकेला नहीं था। शाऊल गुस्सा था। शाऊल दाऊद को मारना चाहता था। पर दाऊद डरा नहीं। क्यों? क्योंकि परमेश्वर उसके पास थे। बिल्कुल पास। जैसे पापा अपने बच्चे के पास होते हैं।

और योनातान भी था। एक सच्चा दोस्त। जिसने अपना सब कुछ दाऊद को दे दिया।

जुड़ी हुई कहानी

बहुत, बहुत साल बाद, एक और राजा आया। उसका नाम था यीशु। यीशु भी परमेश्वर के प्यारे थे। यीशु ने भी अपना सब कुछ दे दिया। बिल्कुल योनातान की तरह। पर और भी ज़्यादा। यीशु ने अपनी जान दे दी। हमारे लिए। क्योंकि यीशु हमसे बहुत प्यार करते हैं।

और परमेश्वर हमेशा अपने बच्चों के साथ रहते हैं। कल भी। आज भी। हमेशा।

तुम्हारे लिए

क्या तुम्हारा कोई दोस्त है? योनातान ने दाऊद को अपना कोट दिया। तुम भी किसी को कुछ दे सकते हो। एक खिलौना। एक मुस्कान। एक गले लगना।

और सुनो: परमेश्वर तुम्हारे साथ भी हैं। जब तुम खेलते हो। जब तुम सोते हो। जब तुम डरते हो। हमेशा।

बातचीत करो

योनातान ने दाऊद को क्या-क्या दिया?

क्या तुम भी किसी दोस्त को कुछ देना चाहते हो? क्या?

साथ में प्रार्थना

प्यारे परमेश्वर, आप बहुत अच्छे हैं। आप दाऊद के साथ थे। आप मेरे साथ भी हैं। मुझे अच्छे दोस्त दीजिए। और मुझे भी अच्छा दोस्त बनाइए। यीशु के नाम में। आमीन।

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1 शमूएल 18 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

1 शमूएल 18 किस विषय में है?
एक लड़का था। उसका नाम था दाऊद। दाऊद अभी-अभी एक बड़ी लड़ाई से लौटा था। उसने एक बहुत बड़े आदमी को हराया था। सब लोग खुश थे।
1 शमूएल 18 क्या कहता है?
फिर सब औरतें गली में आईं। वे नाच रही थीं। वे गा रही थीं। ढोल बज रहे थे। वे गा रही थीं: "दाऊद ने बहुत सारे दुश्मन हराए!"
1 शमूएल 18 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
परमेश्वर दाऊद के साथ थे। हर दिन। हर जगह। दाऊद जो भी करता, अच्छा करता। क्योंकि परमेश्वर उसके साथ थे।
नन्हे बच्चे 1 शमूएल 18 से क्या सीख सकते हैं?
बहुत, बहुत साल बाद, एक और राजा आया। उसका नाम था यीशु। यीशु भी परमेश्वर के प्यारे थे। यीशु ने भी अपना सब कुछ दे दिया। बिल्कुल योनातान की तरह। पर और भी ज़्यादा। यीशु ने अपनी जान दे दी। हमारे लिए। क्योंकि यीशु हमसे बहुत प्यार करते हैं।
1 शमूएल 18 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
और सुनो: परमेश्वर तुम्हारे साथ भी हैं। जब तुम खेलते हो। जब तुम सोते हो। जब तुम डरते हो। हमेशा।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

शाऊल दाऊद से डरता था, क्योंकि यहोवा दाऊद के साथ था और शाऊल के पास से अलग हो गया था।" शाऊल को दाऊद की तलवार से डर नहीं था, उसे उस उपस्थिति से डर था जो अब उसके पास नहीं थी। जब किसी और की आशीष हमें बेचैन करती है, तो शायद असली दर्द यह है कि हमारा अपना मन परमेश्वर से खाली हो गया है। ईर्ष्या का इलाज तुलना नहीं, लौट आना है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 5

दाऊद हर जगह भेजा गया और हर जगह सफल हुआ। इतना कि "वह सारी प्रजा और शाऊल के कर्मचारियों की दृष्टि में भी अच्छा ठहरा।" सोचिए, गोलियत को मारने के बाद भी वह घमंडी नहीं हुआ, चुपचाप शाऊल के अधीन सेवा करता रहा।

सफलता के बाद विनम्र बने रहना, यही तो असली परीक्षा है। क्या आज आपकी जीत आपको और झुका रही है, या ऊँचा उठा रही है?

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For parents and teachers: विशेष रूप से 3 से 6 वर्ष के बच्चों को ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए लिखा गया। इसे अपने बच्चे के साथ बातचीत की शुरुआत के रूप में उपयोग करें, एकमात्र स्रोत के रूप में नहीं। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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