3 से 6 वर्ष के बच्चे के लिए

होशे 13

नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

एक समय की बात है। इस्राएल के लोग रेगिस्तान में थे। वहाँ रेत गरम थी, बहुत गरम। सूरज सिर पर जल रहा था। पानी कहीं नहीं था, दूर दूर तक नहीं। लोगों के गले सूखे थे, पन्ने जैसे। तब परमेश्वर आए। उन्होंने कहा, "मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ।" उन्होंने चट्टान से पानी निकाला। ठंडा, मीठा पानी। उन्होंने आसमान से रोटी भेजी। ताज़ी, अच्छी सुगंध वाली रोटी। लोगों के पेट भर गए। लोग खुश हो गए, बहुत खुश।

पर फिर कुछ हुआ। पेट भर गया, तो लोग भूल गए। वे भूल गए कि पानी किसने दिया था। वे भूल गए कि रोटी किसने दी थी। उन्होंने चाँदी निकाली। आग में चाँदी को गरम किया, पिघलाया। फिर उससे छोटी मूरतें बनाईं। छोटे छोटे बछड़ों जैसी मूरतें। और वे उन मूरतों को चूमने लगे।

परमेश्वर ने यह देखा। परमेश्वर बहुत दुखी हुए।

इसका क्या मतलब है?

परमेश्वर ने कहा, "मैं शेर जैसा बनूँगा।" परमेश्वर ने कहा, "मैं रास्ते में छिपकर बैठूँगा, जैसे चीता।" परमेश्वर ने कहा, "मैं भालू जैसा भी बनूँगा।" यह सुनकर डर लगता है, है ना? पर परमेश्वर सच में दुखी थे, गुस्से में नहीं बस। जब कोई अपने सबसे प्यारे को भूल जाता है, तो दिल में बहुत दर्द होता है। लोगों ने पूछा, "अब हमारा राजा कहाँ है?" "कौन हमें बचाएगा?" पर उनका राजा उन्हें बचा न सका। सिर्फ परमेश्वर बचा सकते थे। और लोग यही भूल गए थे।

मुख्य सूत्र

पर सुनो, यहाँ एक बड़ी बात है। परमेश्वर ने यह भी कहा, "मैं उनको मृत्यु से छुटकारा दूँगा।" परमेश्वर ने कहा, "हे मृत्यु, तेरी शक्ति कहाँ रही?" परमेश्वर हार मानने वाले नहीं थे। वे अपने लोगों को छोड़ेंगे नहीं, कभी नहीं। यही वादा बहुत बाद में सच हुआ। जब यीशु मसीह मरे हुओं में से जी उठे। मृत्यु हार गई, पूरी तरह हार गई। परमेश्वर ने अपना वादा रखा।

तुम्हारे लिए

तुम भी कभी परमेश्वर को भूल सकते हो। जब सब अच्छा चलता है, तब भूलना आसान होता है। पर परमेश्वर तुम्हें कभी नहीं भूलते। वे तुम्हें रोज़ रोटी देते हैं। वे तुम्हें रोज़ पानी देते हैं। आज रात जब तुम खाना खाओ, तो सोचो, "यह रोटी परमेश्वर ने दी।" और उनको धन्यवाद कहो, धीरे से।

बात करें

परमेश्वर ने रेगिस्तान में लोगों को क्या-क्या दिया? तुम आज परमेश्वर को किस बात के लिए धन्यवाद कहना चाहोगे?

साथ में प्रार्थना

प्रिय परमेश्वर, धन्यवाद कि आप हमें रोटी देते हैं। धन्यवाद कि आप हमें कभी नहीं भूलते। हमें भी आपको याद रखने में मदद करें। आमीन।

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होशे 13 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

होशे 13 किस विषय में है?
एक समय की बात है। इस्राएल के लोग रेगिस्तान में थे। वहाँ रेत गरम थी, बहुत गरम। सूरज सिर पर जल रहा था। पानी कहीं नहीं था, दूर दूर तक नहीं। लोगों के गले सूखे थे, पन्ने जैसे। तब परमेश्वर आए। उन्होंने कहा, "मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ।" उन्होंने चट्टान से पानी निकाला। ठंडा, मीठा पानी। उन्होंने आसमान से रोटी भेजी। ताज़ी, अच्छी सुगंध वाली रोटी। लोगों के पेट भर गए। लोग खुश हो गए, बहुत खुश।
होशे 13 क्या कहता है?
पर फिर कुछ हुआ। पेट भर गया, तो लोग भूल गए। वे भूल गए कि पानी किसने दिया था। वे भूल गए कि रोटी किसने दी थी। उन्होंने चाँदी निकाली। आग में चाँदी को गरम किया, पिघलाया। फिर उससे छोटी मूरतें बनाईं। छोटे छोटे बछड़ों जैसी मूरतें। और वे उन मूरतों को चूमने लगे।
होशे 13 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
परमेश्वर ने कहा, "मैं शेर जैसा बनूँगा।" परमेश्वर ने कहा, "मैं रास्ते में छिपकर बैठूँगा, जैसे चीता।" परमेश्वर ने कहा, "मैं भालू जैसा भी बनूँगा।" यह सुनकर डर लगता है, है ना? पर परमेश्वर सच में दुखी थे, गुस्से में नहीं बस। जब कोई अपने सबसे प्यारे को भूल जाता है, तो दिल में बहुत दर्द होता है। लोगों ने पूछा, "अब हमारा राजा कहाँ है?
नन्हे बच्चे होशे 13 से क्या सीख सकते हैं?
पर सुनो, यहाँ एक बड़ी बात है। परमेश्वर ने यह भी कहा, "मैं उनको मृत्यु से छुटकारा दूँगा।" परमेश्वर ने कहा, "हे मृत्यु, तेरी शक्ति कहाँ रही?" परमेश्वर हार मानने वाले नहीं थे। वे अपने लोगों को छोड़ेंगे नहीं, कभी नहीं। यही वादा बहुत बाद में सच हुआ। जब यीशु मसीह मरे हुओं में से जी उठे। मृत्यु हार गई, पूरी तरह हार गई। परमेश्वर ने अपना वादा रखा।
होशे 13 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
तुम भी कभी परमेश्वर को भूल सकते हो। जब सब अच्छा चलता है, तब भूलना आसान होता है। पर परमेश्वर तुम्हें कभी नहीं भूलते। वे तुम्हें रोज़ रोटी देते हैं। वे तुम्हें रोज़ पानी देते हैं। आज रात जब तुम खाना खाओ, तो सोचो, "यह रोटी परमेश्वर ने दी।" और उनको धन्यवाद कहो, धीरे से।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

जच्चा की सी पीड़ाएँ उसको होंगी, वह निर्बुद्धि पुत्र है; क्योंकि प्रसव के समय वह गर्भ के मुख पर नहीं आता" (होशे 13:13)। कितनी अजीब तस्वीर है, वह बच्चा जो बाहर आने से इनकार कर देता है। पीड़ा तो आ चुकी है, नया जीवन दरवाजे पर है, पर वह रुका हुआ है। कहीं तुम भी तो उस टूटने से बचते नहीं फिर रहे, जिसके पार परमेश्वर तुम्हें नया जन्म देना चाहता है?

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For parents and teachers: विशेष रूप से 3 से 6 वर्ष के बच्चों को ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए लिखा गया। इसे अपने बच्चे के साथ बातचीत की शुरुआत के रूप में उपयोग करें, एकमात्र स्रोत के रूप में नहीं। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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