याकूब 1
नन्हे और पूर्व-विद्यालय बच्चे (आयु 3-6) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
याकूब नाम का एक आदमी था। वह यीशु से बहुत प्यार करता था। उसने एक चिट्ठी लिखी। दूर-दूर रहने वाले भाई-बहनों के लिए। वे सब परेशान थे। जीवन में कठिन दिन आते थे। जैसे समुद्र में बड़ी लहरें आती हैं। और नाव को हिला देती हैं।
याकूब ने लिखा, डरो मत। कठिन दिनों में भी खुश रहो। क्योंकि कठिन दिन तुम्हें मजबूत बनाते हैं। जैसे धूप घास को सुखा देती है। और फूल मुरझा जाता है। पर मजबूत पेड़ खड़ा रहता है।
अगर किसी को समझ नहीं आता क्या करना है, तो वह परमेश्वर से पूछे। परमेश्वर खुशी से देते हैं। वे कभी डांटते नहीं। बस पूरे भरोसे से पूछना चाहिए। शक करना ठीक नहीं। शक करनेवाला लहर जैसा होता है, इधर-उधर बहता है।
इसका क्या मतलब है?
याकूब ने एक और बात लिखी। हर अच्छी चीज़ ऊपर से आती है। परमेश्वर के पास से। वे बदलते नहीं। सूरज कभी बादल के पीछे छिप जाता है। पर परमेश्वर हमेशा एक जैसे रहते हैं। वे हमेशा भले हैं।
याकूब ने लिखा, सुनने में जल्दी करो। बोलने में धीरे करो। और गुस्से में बहुत धीरे। क्योंकि गुस्सा भला काम नहीं करता।
फिर याकूब ने एक तस्वीर दी। कोई आईने में अपना चेहरा देखता है। फिर चला जाता है। और भूल जाता है वह कैसा दिखता था। याकूब ने कहा, परमेश्वर का वचन सुनना ऐसा ना हो। सुनो, और फिर वैसा ही करो।
एक ही कहानी की कड़ी
परमेश्वर के पास एक वचन है। वह वचन हृदय में बीज जैसे बोया जाता है। जैसे एक दाना ज़मीन में गिरता है। और फिर बड़ा हो जाता है। यह वचन यीशु के बारे में है। यीशु हमें बचाते हैं। परमेश्वर ने अपने प्यार से हमें नया जीवन दिया। जैसे पहला फल पेड़ पर आता है, वैसे ही हम भी नए हैं। परमेश्वर हमेशा भला देते हैं, कभी बुरा नहीं।
तुम्हारे लिए
क्या तुम्हारा भी कोई कठिन दिन होता है? जब कोई तुमसे नाराज़ होता है, या तुम गिर जाते हो? तब परमेश्वर से पूछो। वे तुम्हें बुद्धि देंगे। और याकूब ने यह भी लिखा, जो अकेले हैं, उनकी मदद करो। जिनके पास पापा या मम्मी नहीं हैं। यह परमेश्वर को बहुत भाता है।
बात करें
जब तुम्हारा कोई दिन कठिन होता है, तुम किससे मदद माँगते हो?
तुम किसी अकेले बच्चे की मदद कैसे कर सकते हो?
चलो प्रार्थना करें
प्रिय परमेश्वर, कभी-कभी दिन कठिन होते हैं। पर आप हमेशा भले हैं। जब मुझे समझ ना आए, मुझे बुद्धि दीजिए। और मुझे मदद कीजिए, अकेले बच्चों से प्यार करने में। आमीन।
याकूब 1 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
याकूब 1 किस विषय में है?
याकूब 1 क्या कहता है?
याकूब 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
नन्हे बच्चे याकूब 1 से क्या सीख सकते हैं?
याकूब 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
जब किसी की परीक्षा हो, तो वह यह न कहे कि मेरी परीक्षा परमेश्वर की ओर से होती है।" दोष ऊपर की ओर फेंकना कितना आसान है। परिस्थिति ऐसी थी, मजबूरी थी, परमेश्वर ने ही रास्ता बंद किया। पर गौर कर, बुराई की तरफ खींचने वाली आवाज़ उसकी नहीं है। वह तुझे गिराने के लिए नहीं, थामने के लिए खड़ा है। फिर आज वह आवाज़ कहाँ से आ रही है?
हे मेरे प्रिय भाइयों, धोखा न खाओ।" याकूब यह चेतावनी बीच में रखता है, एक तरफ परीक्षा की बात, दूसरी तरफ ऊपर से आने वाला हर उत्तम वरदान। सबसे बड़ा धोखा यही है कि हम परमेश्वर को अपने दुख का कारण मान लें और उसकी भलाई पर शक करने लगें। जिस दिन तेरा मन कहे कि परमेश्वर तुझसे कुछ अच्छा छीन रहा है, ठहर जा। वह आवाज़ उसकी नहीं है।
दीन भाई अपने ऊँचे पद पर घमण्ड करे।" याकूब यह नहीं कहता कि गरीबी को भूल जाओ, वह कहता है कि अपनी असली पहचान देखो। दुनिया तुझे तेरी जेब से नापती है, परमेश्वर ने तुझे अपने परिवार में बिठाया है। जिस कुर्सी पर तू आज बैठा है वह किसी ने नहीं दी, मसीह ने दी है। आज जब कोई तुझे छोटा समझे, याद रखना कि तेरा ऊँचा पद कहीं और लिखा है।
यदि कोई अपने आपको भक्त समझे, और अपनी जीभ पर लगाम न दे, पर अपने हृदय को धोखा दे, तो उसकी भक्ति व्यर्थ है।"
गौर करो, याकूब ने यह नहीं कहा कि ऐसा आदमी दूसरों को धोखा देता है। वह अपने ही हृदय को धोखा देता है। आराधना के बाद गाड़ी में बैठते ही जो शब्द निकलते हैं, वही बताते हैं कि भीतर क्या है। लगाम घोड़े को कमज़ोर नहीं करती, उसे दिशा देती है। तेरी जीभ किसके हाथ में है?
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