1 तीमुथियुस 2
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
पौलुस अपने जवान साथी तीमुथियुस को लिखते हैं, जो इफिसुस की कलीसिया की अगुआई कर रहा है। पहली बात जो पौलुस कहते हैं, वह है प्रार्थना, विनती, निवेदन और धन्यवाद, सब मनुष्यों के लिए, यहाँ तक कि राजाओं और ऊँचे पदवालों के लिए भी, ताकि विश्वासी शांति और भक्ति के साथ जीवन बिता सकें। फिर पौलुस उस बड़े सच की ओर इशारा करते हैं जिस पर यह सब खड़ा है, परमेश्वर एक ही है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच एक ही बिचवई है, यीशु मसीह, जिन्होंने अपने आप को सबके छुटकारे के दाम में दे दिया। परमेश्वर चाहते हैं कि सब मनुष्यों का उद्धार हो और वे सत्य को पहचान लें। इसी उद्देश्य से पौलुस को प्रचारक और प्रेरित ठहराया गया।
इसके बाद पौलुस मंडली की उपासना की व्यवस्था की बात करते हैं। पुरुष बिना क्रोध और विवाद के पवित्र हाथ उठाकर प्रार्थना करें। स्त्रियाँ संकोच और संयम के साथ अपने आपको संवारें, बाहरी सजावट से नहीं बल्कि भले कामों से। फिर एक कठिन हिस्सा आता है, स्त्री चुपचाप, पूरी अधीनता में सीखे, उपदेश न करे, पुरुष पर अधिकार न चलाए। पौलुस इसका कारण उत्पत्ति की कहानी से जोड़ते हैं, आदम पहले बनाया गया, फिर हव्वा, और आदम नहीं बहकाया गया, पर स्त्री बहकावे में आई। अंत में एक वादा है, स्त्री बच्चे जनने के द्वारा उद्धार पाएगी, यदि वह विश्वास, प्रेम और पवित्रता में स्थिर रहे।
इसका मतलब क्या है?
यह अध्याय दो हिस्सों में बंटा हुआ लगता है, पर असल में एक ही सोच से जुड़ा है, कलीसिया कैसे जीती है और यह बाहर की दुनिया के सामने कैसी दिखती है। पौलुस चाहते हैं कि विश्वासी हर किसी के लिए, यहाँ तक कि उन शासकों के लिए भी जो उन्हें सता रहे थे, प्रार्थना करें। यह कोई सुरक्षित, आराम की मांग नहीं है, यह इस विश्वास से निकलता है कि परमेश्वर सच में चाहते हैं कि सब लोग बचें, चाहे वे किसी भी देश या पद के हों।
फिर आता है वह हिस्सा जो आज बहुत सवाल उठाता है, स्त्री और पुरुष की भूमिका। इसे टालना ईमानदारी नहीं होगी। यह पहली सदी की इफिसुस की मंडली के लिए लिखा गया था, जहाँ शायद कुछ स्त्रियाँ बिना सीखे उपदेश देने लगी थीं, और झूठी शिक्षा फैल रही थी। पौलुस का जोर व्यवस्था और सीखने पर है, न कि स्त्री की कमतरी पर, क्योंकि वे उसी पत्र में उसे परमेश्वर की भक्ति करनेवाली और उद्धार पाने वाली कहते हैं। फिर भी यह आयतें सरल नहीं हैं, और उन्हें आसान बनाना उनके साथ अन्याय होगा। कलीसियाएँ आज भी इस पर अलग-अलग समझ रखती हैं, और यह ठीक है कि तुम इस पर सवाल पूछो, बिना यह मानने के कि सवाल पूछना अविश्वास है।
मूल कड़ी
इस अध्याय के बीच में एक वाक्य है जो पूरी बाइबल की कहानी को थाम लेता है, परमेश्वर एक ही है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच एक ही बिचवई है, यीशु मसीह। उत्पत्ति में आदम और हव्वा के धोखे के बाद इंसान और परमेश्वर के बीच एक दूरी आ गई। यहाँ पौलुस उसी कहानी को याद करते हैं, पर तुरंत मसीह की ओर मोड़ देते हैं, जिन्होंने अपने आप को सबके छुटकारे के दाम में दे दिया। जहाँ पहला आदम असफल हुआ, वहाँ मसीह ने अपना जीवन देकर वह दूरी पाट दी। इसी वजह से पौलुस कहते हैं कि परमेश्वर चाहते हैं कि सब मनुष्यों का उद्धार हो, यह किसी एक जाति या पद तक सीमित नहीं है। यह वादा हर उस व्यक्ति तक पहुँचता है जो सत्य को पहचानने के लिए तैयार है।
तुम्हारे लिए
तुम शायद रोज़ किसी न किसी बहस में उलझे रहते हो, कौन सही है, किसकी राय मानी जाए, सच क्या है। यह अध्याय कहता है कि सत्य कोई राय नहीं है, यह एक व्यक्ति है, यीशु मसीह, जो परमेश्वर और मनुष्य के बीच खड़े हैं। इससे तुम्हारी बहसों को थोड़ी नई दिशा मिल सकती है, तुम सत्य की तलाश एक विश्वास प्रणाली में नहीं, बल्कि एक व्यक्ति में करते हो।
प्रार्थना की बात भी तुम्हारे लिए है। पौलुस कहते हैं सबके लिए प्रार्थना करो, यहाँ तक कि उनके लिए भी जो तुमसे असहमत हैं या तुम्हें कठिन लगते हैं। यह उन शिक्षकों, नेताओं, या साथियों के लिए भी लागू होता है जिनसे तुम चिढ़ते हो।
और उन कठिन आयतों के बारे में, बजाय इसके कि तुम उन्हें नज़रअंदाज़ करो या उनसे डरो, उन पर सोचो, पढ़ो, पूछो। यह ठीक है कि विश्वास के भीतर तनाव और सवाल हों। परमेश्वर तुमसे यह नहीं मांगते कि तुम सोचना बंद कर दो, वे चाहते हैं कि तुम सत्य को भली भाँति पहचान लो।
बातचीत करें
अगर परमेश्वर सच में चाहते हैं कि "सब मनुष्यों का उद्धार हो", तो इसका उन लोगों के लिए क्या मतलब है जिन्हें तुम पसंद नहीं करते या जिनसे तुम असहमत हो?
इस अध्याय के कठिन हिस्सों को पढ़कर तुम्हें कैसा लगा, और तुम उन्हें किस तरह अपने विश्वास में जगह देते हो, बिना उन्हें नज़रअंदाज़ किए या बिना उनसे डरे?
साथ मिलकर प्रार्थना
प्रभु यीशु, आप ही वह बिचवई हैं जिन्होंने अपने आप को हमारे लिए दे दिया। हमें सत्य को भली भाँति पहचानने में मदद दें, और हमें उन सबके लिए प्रार्थना करना सिखाएँ जिनसे मिलना आसान नहीं है। हमारे सवालों से मत डरें, बल्कि हमें अपने पास और नज़दीक खींच लें। आमीन।
1 तीमुथियुस 2 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
1 तीमुथियुस 2 किस विषय में है?
1 तीमुथियुस 2 क्या कहता है?
1 तीमुथियुस 2 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर 1 तीमुथियुस 2 से क्या सीख सकते हैं?
1 तीमुथियुस 2 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
और आदम बहकाया न गया, पर स्त्री बहकावे में आकर अपराध में पड़ गई।" बहकावे में आना, यही सबसे डरावनी बात है। हव्वा ने जान बूझकर बगावत नहीं की थी, वह बस एक मीठी सी बात पर भरोसा कर बैठी। आज भी झूठ चिल्लाकर नहीं आता, वह समझाकर आता है। इसलिए परमेश्वर का वचन किसी और के मुँह से सुनना काफी नहीं, तुझे खुद उसे जानना होगा।
परमेश्वर एक ही है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही मध्यस्थ है, अर्थात् मसीह यीशु जो मनुष्य है।" ध्यान दे, पौलुस यह बात तब कहता है जब वह सब मनुष्यों के लिए प्रार्थना करने को कह रहा है। यानी जिस दरवाज़े से तू भीतर आया, वही दरवाज़ा उसके लिए भी खुला है जिसे तू सबसे दूर समझता है। तेरी प्रार्थना में उसका नाम है?
पौलुस पहले हव्वा की चूक याद दिलाता है, और फिर तुरंत जीवन की ओर मुड़ जाता है। जहाँ शाप गहरा था, वहीं परमेश्वर ने आशा रख दी। "फिर भी बच्चे जनने के द्वारा उसका उद्धार होगा; यदि वे संयम सहित विश्वास, प्रेम और पवित्रता में स्थिर रहें।" ध्यान दे, ज़ोर बच्चों पर नहीं, स्थिर रहने पर है। तेरी रोज़ की छोटी सी वफ़ादारी उसकी नज़र से छिपी नहीं।
स्त्री चुपचाप, पूरी अधीनता में सीखे।" इस वाक्य में जो सबसे पहले चुभता है वह शायद "चुपचाप" है, पर ठहरकर देखो, आज्ञा तो सीखने की है। उस समय में यह कहना ही बड़ी बात थी कि वह भी शिष्य बने, परमेश्वर का वचन सुने। सवाल यह है कि क्या तू सीखने को तैयार है, या पहले से सब जानने के भ्रम में बैठा है?
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