1 तीमुथियुस 2
प्राथमिक आयु (7-12) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
The Explanation
पौलुस तीमुथियुस को लिखता है, जो एक जवान अगुआ है और एक मंडली की देखभाल करता है। पौलुस सबसे पहले यह आग्रह करता है कि सब मनुष्यों के लिए प्रार्थना की जाए, विनती की जाए, निवेदन और धन्यवाद दिया जाए, यहाँ तक कि राजाओं और ऊँचे पदवालों के लिए भी। क्यों? ताकि लोग शांति और भक्ति में जीवन बिता सकें। यह परमेश्वर को अच्छा लगता है, क्योंकि वे चाहते हैं कि सब मनुष्यों का उद्धार हो और वे सत्य को जान लें।
फिर पौलुस एक बहुत बड़ी बात कहता है, परमेश्वर एक ही है, और परमेश्वर तथा मनुष्यों के बीच केवल एक ही बिचवई है, यानी वह जो दोनों के बीच खड़ा होकर उन्हें जोड़ता है, यीशु मसीह। उन्होंने अपने आपको सब के लिए दे दिया, जैसे किसी को छुड़ाने के लिए दाम चुकाया जाता है। पौलुस बताता है कि उसे इसी खुशखबरी को सुनाने के लिए भेजा गया है।
आगे पौलुस मंडली के जीवन के बारे में कुछ निर्देश देता है, पुरुष बिना क्रोध किए पवित्र हाथ उठाकर प्रार्थना करें, स्त्रियाँ सादगी और भले कामों से अपने आपको सजाएँ। इसके बाद पौलुस कुछ बातें लिखता है जो तीमुथियुस की मंडली की एक खास परिस्थिति से जुड़ी हैं, और जो पढ़ने में हमें कठिन और अनसुलझी लगती हैं। हम इस पर आगे ईमानदारी से बात करेंगे।
What Does This Mean?
इस अध्याय का दिल यह है, परमेश्वर हर तरह के इंसान से प्रेम करते हैं। राजा हो या साधारण व्यक्ति, अमीर हो या गरीब, परमेश्वर सब का उद्धार चाहते हैं। इसलिए प्रार्थना केवल अपने और अपनों के लिए नहीं होती, बल्कि उन लोगों के लिए भी जिन्हें हम पसंद नहीं करते, या जो हम पर हुकूमत करते हैं।
और यीशु मसीह के बारे में जो लिखा है, वह भी गहरा है। परमेश्वर और मनुष्य के बीच खाई बहुत गहरी थी, हमारे पाप के कारण। मसीह ने खुद को दे दिया ताकि वह खाई पार हो सके। इसलिए किसी और मध्यस्थ, किसी और रास्ते की जरूरत नहीं, केवल एक ही बिचवई काफी है।
जो निर्देश स्त्रियों के बारे में हैं, उन्हें समझना आसान नहीं है। पौलुस उस समय की एक खास मंडली से बात कर रहा है, और यह पूरे बाइबल में एक ऐसा हिस्सा है जिस पर सच्चे मसीही आज भी अलग अलग तरीके से सोचते हैं। यह ईमानदार रहना ठीक है कि हर सवाल का जवाब हमें तुरंत नहीं मिलता।
The Common Thread
इस अध्याय का केंद्र यीशु मसीह हैं। परमेश्वर एक ही है, और उनके पास आने का रास्ता भी एक ही है, यीशु मसीह के द्वारा। यह पूरी बाइबल की कहानी का सार है, परमेश्वर ने मनुष्य को नहीं छोड़ा, बल्कि खुद रास्ता बनाया। पुराने नियम में परमेश्वर बार बार अपनी वाचा, यानी अपने वादे को निभाते रहे, और यहाँ पौलुस दिखाता है कि वह वाचा यीशु में पूरी हुई। मसीह ने अपने आपको छुड़ौती के दाम में दिया, जैसे कोई कैद से छुड़ाने के लिए कीमत चुकाता है। यह प्रेम की सबसे बड़ी कहानी है।
For You
आज जब तुम प्रार्थना करते हो, केवल अपने परिवार और दोस्तों के लिए मत माँगो। उन लोगों के लिए भी प्रार्थना करो जो देश चलाते हैं, स्कूल में तुम्हारे ऊपर हैं, या जिनसे तुम सहमत नहीं होते। यह कठिन है, लेकिन परमेश्वर को यह अच्छा लगता है।
और यह भी सोचो, तुम अपने आपको कैसे दिखाना चाहते हो, कपड़ों से, चीजों से, या अपने भले कामों और अपने दिल से? पौलुस कहता है कि सच्ची सुंदरता भले कामों में दिखती है। तुम्हें कब लगता है कि कोई सच में सुंदर है, बाहर से या अंदर से?
Talk About It
तुम्हारे लिए किसी ऐसे इंसान के लिए प्रार्थना करना कठिन क्यों है जिससे तुम सहमत नहीं हो? फिर भी क्या तुम उसके लिए प्रार्थना कर सकते हो?
पौलुस कहता है कि यीशु एक ही बिचवई हैं। इसका मतलब क्या है, यह जानकर कि परमेश्वर के पास आने के लिए तुम्हें और कुछ नहीं चाहिए?
Praying Together
प्रभु यीशु, धन्यवाद कि आप ही वह रास्ता हैं जिससे हम परमेश्वर के पास आ सकते हैं। हमें सिखाइए कि हम हर तरह के लोगों के लिए प्रार्थना करें, राजाओं के लिए भी, और जिनसे हम सहमत नहीं हैं उनके लिए भी। हमारे दिल को भला बनाइए, न कि केवल हमारा दिखावा। आमीन।
1 तीमुथियुस 2 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
1 तीमुथियुस 2 किस विषय में है?
1 तीमुथियुस 2 क्या कहता है?
1 तीमुथियुस 2 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
बच्चे 1 तीमुथियुस 2 से क्या सीख सकते हैं?
1 तीमुथियुस 2 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
और आदम बहकाया न गया, पर स्त्री बहकावे में आकर अपराध में पड़ गई।" बहकावे में आना, यही सबसे डरावनी बात है। हव्वा ने जान बूझकर बगावत नहीं की थी, वह बस एक मीठी सी बात पर भरोसा कर बैठी। आज भी झूठ चिल्लाकर नहीं आता, वह समझाकर आता है। इसलिए परमेश्वर का वचन किसी और के मुँह से सुनना काफी नहीं, तुझे खुद उसे जानना होगा।
परमेश्वर एक ही है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही मध्यस्थ है, अर्थात् मसीह यीशु जो मनुष्य है।" ध्यान दे, पौलुस यह बात तब कहता है जब वह सब मनुष्यों के लिए प्रार्थना करने को कह रहा है। यानी जिस दरवाज़े से तू भीतर आया, वही दरवाज़ा उसके लिए भी खुला है जिसे तू सबसे दूर समझता है। तेरी प्रार्थना में उसका नाम है?
पौलुस पहले हव्वा की चूक याद दिलाता है, और फिर तुरंत जीवन की ओर मुड़ जाता है। जहाँ शाप गहरा था, वहीं परमेश्वर ने आशा रख दी। "फिर भी बच्चे जनने के द्वारा उसका उद्धार होगा; यदि वे संयम सहित विश्वास, प्रेम और पवित्रता में स्थिर रहें।" ध्यान दे, ज़ोर बच्चों पर नहीं, स्थिर रहने पर है। तेरी रोज़ की छोटी सी वफ़ादारी उसकी नज़र से छिपी नहीं।
स्त्री चुपचाप, पूरी अधीनता में सीखे।" इस वाक्य में जो सबसे पहले चुभता है वह शायद "चुपचाप" है, पर ठहरकर देखो, आज्ञा तो सीखने की है। उस समय में यह कहना ही बड़ी बात थी कि वह भी शिष्य बने, परमेश्वर का वचन सुने। सवाल यह है कि क्या तू सीखने को तैयार है, या पहले से सब जानने के भ्रम में बैठा है?
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