13 वर्ष और उससे बड़े किशोर के लिए

2 इतिहास 32

किशोर (13 वर्ष और उससे बड़े) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

अध्याय की शुरुआत में अश्शूर का राजा सन्हेरीब यहूदा पर चढ़ाई करता है। हिजकिय्याह घबराकर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठता। वह अपने हाकिमों के साथ सलाह करता है, शहर के बाहर के सोतों को पाटता है ताकि दुश्मन को पानी न मिले, शहरपनाह मज़बूत करता है, हथियार बनवाता है। यह सब बहुत व्यावहारिक और बुद्धिमानी भरी तैयारी है। लेकिन हिजकिय्याह यहीं नहीं रुकता। वह लोगों को इकट्ठा करके कहता है कि जो हमारे साथ है वह अश्शूर के राजा से बड़ा है, क्योंकि हमारे साथ परमेश्वर यहोवा हैं, जो हमारी ओर से लड़ते हैं।

फिर सन्हेरीब के कर्मचारी मनोवैज्ञानिक युद्ध शुरू करते हैं। वे ऊँचे स्वर में यरूशलेम की दीवार पर बैठे लोगों को यहूदी भाषा में चिल्लाकर कहते हैं कि हिजकिय्याह का परमेश्वर उन देवताओं जैसा ही है जिन्होंने किसी भी देश को नहीं बचाया। यह सीधा हमला है, परमेश्वर को मनुष्यों की बनाई मूर्तियों के बराबर बताना। हिजकिय्याह और यशायाह नबी इस पर चुप नहीं रहते, वे प्रार्थना करके स्वर्ग की ओर दुहाई देते हैं। और परमेश्वर एक दूत भेजते हैं जो अश्शूर की पूरी छावनी को नष्ट कर देता है। सन्हेरीब लज्जित होकर लौटता है और अपने ही बेटों के हाथों मारा जाता है।

इसके बाद अध्याय का रुख बदलता है। हिजकिय्याह बीमार पड़ता है, प्रार्थना करता है, परमेश्वर उसे चिन्ह देकर ठीक करते हैं। पर पाठ साफ़ कहता है, हिजकिय्याह ने उस उपकार का बदला नहीं दिया क्योंकि उसका मन फूल उठा था। धन-वैभव बढ़ता है, वह खुद को दीन करता है, इसलिए क्रोध नहीं भड़कता। पर जब बाबेल के दूत उससे मिलने आते हैं, परमेश्वर उसे अकेला छोड़ देते हैं ताकि देखें कि उसके मन में सचमुच क्या है।

इसका क्या अर्थ है?

यह अध्याय दिखाता है कि विश्वास अंधा भरोसा नहीं है जो तैयारी को नकारता है। हिजकिय्याह दीवार भी बनाता है और प्रार्थना भी करता है। दोनों साथ चलते हैं। पर असली युद्ध हथियारों का नहीं था, शब्दों का था। सन्हेरीब के कर्मचारियों ने यह नहीं कहा कि हम मज़बूत हैं, उन्होंने कहा तुम्हारा परमेश्वर कुछ नहीं कर सकता। यही वह बात है जो आज भी तुम्हारे सामने आती है, जब कोई कहता है कि विश्वास बचकाना है, कि सब धर्म एक जैसे हैं, कि कोई सुनने वाला ऊपर नहीं बैठा।

और फिर सबसे ईमानदार हिस्सा आता है। हिजकिय्याह, जिसने अभी-अभी परमेश्वर का इतना बड़ा चमत्कार देखा, कुछ ही पद बाद अभिमान से भर जाता है। बाइबल इसे छुपाती नहीं। यह दिखाता है कि जीत के बाद का समय अक्सर युद्ध से ज़्यादा खतरनाक होता है। डर में आदमी झुककर प्रार्थना करता है, पर सफलता में वह भूल जाता है कि यह सब किसकी देन थी।

समान सूत्र

यह कहानी परमेश्वर के उस वादे की ओर इशारा करती है कि वे अपने लोगों को बचाते हैं, भले ही हालात असंभव दिखें। घिरा हुआ यरूशलेम, भारी सेना के सामने अकेला खड़ा, और फिर एक रात में सब पलट जाता है, यह उस बड़ी कहानी का हिस्सा है जो आगे चलकर एक सलीब पर पूरी होती है, जहाँ हालात सबसे ज़्यादा असंभव दिखे और फिर सबसे बड़ी जीत हुई। पर हिजकिय्याह की कहानी यह भी दिखाती है कि हर इंसानी राजा, चाहे कितना भी भला हो, आखिर में अपने मन के फूल जाने का शिकार हो जाता है। यही कारण है कि यह कहानी अपने आप में पूरी नहीं होती, यह एक ऐसे राजा की ज़रूरत की ओर इशारा करती है जिसका मन कभी फूलता नहीं, जो अपने आप को ऊँचा नहीं बल्कि नीचा करता है, यीशु मसीह की ओर।

तुम्हारे लिए

शायद तुम्हारे जीवन में सन्हेरीब जैसी कोई आवाज़ नहीं आती जो दीवार से चिल्लाती हो, पर स्क्रीन पर, क्लासरूम में, किसी बहस में वही सवाल आता है, क्या तुम्हारा परमेश्वर सचमुच कुछ कर सकता है, या यह सिर्फ एक सांत्वना है जो तुमने खुद बना ली है। हिजकिय्याह का जवाब चीखना नहीं था, प्रार्थना थी। यह याद रखने लायक बात है, जब विश्वास पर हमला हो, तो पहला कदम बहस जीतना नहीं, घुटनों पर जाना है।

और दूसरी बात उतनी ही ज़रूरी है। जब जीवन अच्छा चल रहा हो, परीक्षा में नंबर आ रहे हों, रिश्ते ठीक हों, सब कुछ अपनी जगह पर हो, तभी मन के फूलने का खतरा सबसे ज़्यादा होता है। मुश्किल समय में परमेश्वर को याद करना आसान है। सफलता के समय उन्हें याद रखना असली परीक्षा है।

बात करें

तुम्हारे जीवन में वे कौन सी आवाज़ें हैं जो हिजकिय्याह पर हुए हमले जैसी हैं, जो कहती हैं कि तुम्हारा विश्वास बेबुनियाद है? तुम उनका सामना कैसे करते हो?

क्या तुम्हारे जीवन में कोई ऐसा समय आया है जब सब कुछ अच्छा चल रहा था और तुम्हें एहसास हुआ कि तुम परमेश्वर को भूलने लगे थे? उस समय क्या हुआ था?

साथ में प्रार्थना

हे प्रभु, जब शब्द हमारे विश्वास को कमज़ोर करने की कोशिश करें, तब हमें हिजकिय्याह जैसा साहस दीजिए कि हम आपके पास भागें। और जब जीवन अच्छा चले, तब हमारे मन को फूलने से बचाइए। हमें वह नम्रता दीजिए जो हर हाल में आपकी ओर देखती रहे। आमीन।

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2 इतिहास 32 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

2 इतिहास 32 किस विषय में है?
अध्याय की शुरुआत में अश्शूर का राजा सन्हेरीब यहूदा पर चढ़ाई करता है। हिजकिय्याह घबराकर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठता। वह अपने हाकिमों के साथ सलाह करता है, शहर के बाहर के सोतों को पाटता है ताकि दुश्मन को पानी न मिले, शहरपनाह मज़बूत करता है, हथियार बनवाता है। यह सब बहुत व्यावहारिक और बुद्धिमानी भरी तैयारी है। लेकिन हिजकिय्याह यहीं नहीं रुकता। वह लोगों को इकट्ठा करके कहता है कि जो हमारे साथ है वह अश्शूर के राजा से बड़ा है, क्योंकि हमारे साथ परमेश्वर यहोवा हैं, जो हमारी ओर से लड़ते हैं।
2 इतिहास 32 क्या कहता है?
इसके बाद अध्याय का रुख बदलता है। हिजकिय्याह बीमार पड़ता है, प्रार्थना करता है, परमेश्वर उसे चिन्ह देकर ठीक करते हैं। पर पाठ साफ़ कहता है, हिजकिय्याह ने उस उपकार का बदला नहीं दिया क्योंकि उसका मन फूल उठा था। धन-वैभव बढ़ता है, वह खुद को दीन करता है, इसलिए क्रोध नहीं भड़कता। पर जब बाबेल के दूत उससे मिलने आते हैं, परमेश्वर उसे अकेला छोड़ देते हैं ताकि देखें कि उसके मन में सचमुच क्या है।
2 इतिहास 32 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
और फिर सबसे ईमानदार हिस्सा आता है। हिजकिय्याह, जिसने अभी-अभी परमेश्वर का इतना बड़ा चमत्कार देखा, कुछ ही पद बाद अभिमान से भर जाता है। बाइबल इसे छुपाती नहीं। यह दिखाता है कि जीत के बाद का समय अक्सर युद्ध से ज़्यादा खतरनाक होता है। डर में आदमी झुककर प्रार्थना करता है, पर सफलता में वह भूल जाता है कि यह सब किसकी देन थी।
किशोर 2 इतिहास 32 से क्या सीख सकते हैं?
शायद तुम्हारे जीवन में सन्हेरीब जैसी कोई आवाज़ नहीं आती जो दीवार से चिल्लाती हो, पर स्क्रीन पर, क्लासरूम में, किसी बहस में वही सवाल आता है, क्या तुम्हारा परमेश्वर सचमुच कुछ कर सकता है, या यह सिर्फ एक सांत्वना है जो तुमने खुद बना ली है। हिजकिय्याह का जवाब चीखना नहीं था, प्रार्थना थी। यह याद रखने लायक बात है, जब विश्वास पर हमला हो, तो पहला कदम बहस जीतना नहीं, घुटनों पर जाना है।
2 इतिहास 32 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
तुम्हारे जीवन में वे कौन सी आवाज़ें हैं जो हिजकिय्याह पर हुए हमले जैसी हैं, जो कहती हैं कि तुम्हारा विश्वास बेबुनियाद है? तुम उनका सामना कैसे करते हो?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 29

क्योंकि परमेश्वर ने उसको बहुत ही धन दिया था।" यह वाक्य हिजकिय्याह की कहानी की चाबी है। खज़ाने उसकी चतुराई से नहीं, परमेश्वर के हाथ से आए थे। फिर भी आगे लिखा है कि उसका मन फूल उठा। जो आशीष तुझे मिली है, क्या तू अब भी याद रखता है कि वह किसने दी? समृद्धि भी एक परीक्षा है, शायद सबसे चुपचाप आने वाली।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 8

हिजकिय्याह ने दीवारें भी बनाईं, हथियार भी बनवाए, पानी के सोते भी बन्द किए। फिर भी उसने कहा, "उसका सहारा तो मनुष्य ही है, परन्तु हमारा सहारा हमारा परमेश्वर यहोवा है।" काम करना अविश्वास नहीं, पर भरोसा काम पर नहीं था। तुम्हारी तैयारी कहाँ तक जाती है, और तुम्हारा सहारा कहाँ टिका है? दोनों एक ही जगह हैं, या अलग?

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