12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

1 यूहन्ना 4

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

यूहन्ना यहाँ एक ऐसी समस्या को छूते हैं जो उनके समय के विश्वासियों को परेशान कर रही थी: कैसे पता चले कि कौन सच बोल रहा है? कलीसिया में बहुत से लोग आ रहे थे जो दावा करते थे कि उनके पास परमेश्वर की आत्मा है, कि उनकी बात सुनी जानी चाहिए। यूहन्ना कहते हैं, हर आत्मा पर विश्वास मत करो, उन्हें परखो। और परखने का तरीका सीधा है: क्या यह व्यक्ति मानता है कि यीशु मसीह शरीर में होकर आया है? यानी, क्या वह मानता है कि परमेश्वर सचमुच इस टूटी हुई, मांस-हड्डी की दुनिया में उतरे, दुख उठाया, मरे? जो इसे नकारता है, उसकी आत्मा परमेश्वर की ओर से नहीं है।

फिर यूहन्ना विषय बदलते हैं, पर वास्तव में नहीं बदलते। वे प्रेम की बात करने लगते हैं, क्योंकि सच्चाई और प्रेम उनके लिए अलग चीज़ें नहीं हैं। वे लिखते हैं कि परमेश्वर प्रेम है, यह कोई नरम भावना नहीं बल्कि उनका स्वभाव है। यह प्रेम इस बात से प्रगट हुआ कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को भेजा, हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए। यह प्रेम हमने शुरू नहीं किया, परमेश्वर ने किया। और क्योंकि परमेश्वर ने हमसे इतना प्रेम किया, हमें भी आपस में प्रेम रखना चाहिए। यूहन्ना यहाँ तक कहते हैं कि जो अपने भाई से बैर रखता है और दावा करता है कि परमेश्वर से प्रेम रखता है, वह झूठा है। अध्याय के अंत में वे भय की बात करते हैं: सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है, क्योंकि जो प्रेम में जीता है, उसे न्याय के दिन का डर नहीं रहता।

इसका क्या मतलब है?

यह अध्याय दो चीज़ों को साथ बाँधता है जिन्हें हम अक्सर अलग कर देते हैं: सही मानना और सही जीना। आज की दुनिया में तुम पर हर तरफ से आवाज़ें आती हैं, हर कोई सच्चाई का दावा करता है। यूहन्ना कहते हैं कि सच्चाई की पहचान यीशु मसीह से जुड़ी है, कोई अस्पष्ट अनुभव या भावना नहीं, बल्कि यह ठोस दावा कि परमेश्वर वास्तव में शरीर धारण करके आए। यह विश्वास कोई हल्की जानकारी नहीं है, यह तय करता है कि तुम किस आत्मा को सुन रहे हो।

पर फिर यूहन्ना यह नहीं कहते कि सही मानना ही काफी है। वे कहते हैं कि जो प्रेम नहीं रखता, वह परमेश्वर को नहीं जानता, चाहे वह कितनी भी सही बातें कहे। यह कड़ी बात है। तुम्हारी थियोलॉजी सही हो सकती है और फिर भी तुम अपने भाई से नफरत करते हो, और यूहन्ना कहते हैं ऐसे में तुम परमेश्वर को नहीं जानते। यह मुझे और तुम्हें बेचैन कर देना चाहिए, क्योंकि सिद्धांत को सही रखना आसान है, प्रेम में जीना कठिन।

समान सूत्र

यह पूरा अध्याय एक ही जगह से बहता है: क्रूस। परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा ताकि हम उसके द्वारा जीवन पाएँ, और उसके पापों के प्रायश्चित के लिए। यह वही कहानी है जो पूरी बाइबल में चलती है, परमेश्वर मनुष्य से दूर नहीं बैठे, वे उतरे, उन्होंने हमारी हालत को अपने ऊपर लिया। यूहन्ना कहते हैं परमेश्वर को कभी किसी ने नहीं देखा, फिर भी हम उन्हें जान सकते हैं, कैसे? आपस के प्रेम के द्वारा, और उस आत्मा के द्वारा जो उन्होंने हमें दिया है। यही वह वादा है जो पूरी बाइबल में गूंजता है: परमेश्वर दूर के देवता नहीं, वे पास आते हैं, वे भीतर रहते हैं, वे अपना जीवन हमारे भीतर बहाते हैं। यही कारण है कि भय दूर हो जाता है, क्योंकि जिस परमेश्वर से हमें डरना चाहिए था, उन्होंने ही अपने पुत्र को हमारे लिए भेज दिया।

तुम्हारे लिए

तुम्हारी उम्र में सच्चाई ढूँढना कठिन है, क्योंकि हर कोई अपनी सच्चाई बेच रहा है। यह अध्याय तुम्हें एक ठोस जगह देता है खड़े होने के लिए, यीशु मसीह कौन हैं, यह सवाल हल्का नहीं है। जो कोई इस सवाल को उड़ा देता है, उससे सावधान रहो, चाहे वह कितना भी आकर्षक या आधुनिक लगे।

पर उससे भी ज़्यादा, यह अध्याय तुम्हें पूछता है, तुम्हारा प्रेम किसके लिए है? तुम्हारी उम्र में रिश्ते बनते और टूटते हैं, अकेलापन असली होता है, और भाई-बहन या दोस्त से बैर रखना आसान होता है। यूहन्ना नहीं कहते कि यह हल्की बात है। वे कहते हैं कि यह तय करता है कि तुम परमेश्वर को जानते हो या नहीं। यह डराने के लिए नहीं कहा गया, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर ने पहले प्रेम किया, और वह प्रेम तुम्हारे भीतर बहने के लिए है, दबाने के लिए नहीं। इस हफ्ते किसी एक ऐसे इंसान के बारे में सोचो जिससे तुम दूर हो गए हो, और खुद से पूछो, क्या मेरा विश्वास सिर्फ शब्दों में है, या वह असली प्रेम बन रहा है?

बात करो इस पर

अगर सही मानना काफी नहीं, बल्कि प्रेम में जीना भी ज़रूरी है, तो तुम्हारी ज़िंदगी में कहाँ यह अंतर सबसे साफ दिखता है?

भय और प्रेम को यूहन्ना विरोधी बताते हैं। तुम्हारे मन में परमेश्वर के बारे में या न्याय के दिन के बारे में जो डर है, वह कहाँ से आता है, और क्या वह उस प्रेम से मेल खाता है जो इस अध्याय में दिखाया गया है?

साथ में प्रार्थना

प्रभु, आपने पहले हमसे प्रेम किया, जब हम इसके लायक नहीं थे। हमें सिखाइए कि सच्चाई को कस के पकड़ें और साथ ही अपने भाई-बहनों से सच्चा प्रेम रखें। जहाँ हमारे भीतर भय है, वहाँ अपना सिद्ध प्रेम भर दीजिए। आमीन।

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1 यूहन्ना 4 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

1 यूहन्ना 4 किस विषय में है?
यूहन्ना यहाँ एक ऐसी समस्या को छूते हैं जो उनके समय के विश्वासियों को परेशान कर रही थी: कैसे पता चले कि कौन सच बोल रहा है? कलीसिया में बहुत से लोग आ रहे थे जो दावा करते थे कि उनके पास परमेश्वर की आत्मा है, कि उनकी बात सुनी जानी चाहिए। यूहन्ना कहते हैं, हर आत्मा पर विश्वास मत करो, उन्हें परखो। और परखने का तरीका सीधा है: क्या यह व्यक्ति मानता है कि यीशु मसीह शरीर में होकर आया है?
1 यूहन्ना 4 क्या कहता है?
यह अध्याय दो चीज़ों को साथ बाँधता है जिन्हें हम अक्सर अलग कर देते हैं: सही मानना और सही जीना। आज की दुनिया में तुम पर हर तरफ से आवाज़ें आती हैं, हर कोई सच्चाई का दावा करता है। यूहन्ना कहते हैं कि सच्चाई की पहचान यीशु मसीह से जुड़ी है, कोई अस्पष्ट अनुभव या भावना नहीं, बल्कि यह ठोस दावा कि परमेश्वर वास्तव में शरीर धारण करके आए। यह विश्वास कोई हल्की जानकारी नहीं है, यह तय करता है कि तुम किस आत्मा को सुन रहे हो।
1 यूहन्ना 4 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह पूरा अध्याय एक ही जगह से बहता है: क्रूस। परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा ताकि हम उसके द्वारा जीवन पाएँ, और उसके पापों के प्रायश्चित के लिए। यह वही कहानी है जो पूरी बाइबल में चलती है, परमेश्वर मनुष्य से दूर नहीं बैठे, वे उतरे, उन्होंने हमारी हालत को अपने ऊपर लिया। यूहन्ना कहते हैं परमेश्वर को कभी किसी ने नहीं देखा, फिर भी हम उन्हें जान सकते हैं, कैसे?
किशोर 1 यूहन्ना 4 से क्या सीख सकते हैं?
पर उससे भी ज़्यादा, यह अध्याय तुम्हें पूछता है, तुम्हारा प्रेम किसके लिए है?
1 यूहन्ना 4 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
भय और प्रेम को यूहन्ना विरोधी बताते हैं। तुम्हारे मन में परमेश्वर के बारे में या न्याय के दिन के बारे में जो डर है, वह कहाँ से आता है, और क्या वह उस प्रेम से मेल खाता है जो इस अध्याय में दिखाया गया है?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

हे बालकों, तुम परमेश्वर के हो और तुमने उन पर जय पाई है, क्योंकि जो तुममें है, वह उससे जो संसार में है, बड़ा है।"

ध्यान दे, यूहन्ना कहता है "जय पाई है", भविष्य में नहीं, बीत चुके काम की तरह। और यह बात उसने उन्हें बालक कहकर कही, मजबूत योद्धा कहकर नहीं। तेरी जीत तेरी ताकत पर नहीं, तुझमें बसे हुए उस एक पर टिकी है। आज डर किस बात का है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

इसी से प्रेम हम में सिद्ध हुआ, कि हमें न्याय के दिन साहस हो।" सोचो, न्याय के दिन की बात हो रही है, और यूहन्ना डर की नहीं, साहस की बात करता है। जिस परमेश्वर से तुम छिपना चाहते हो, उसी का प्रेम तुम्हें उसके सामने सिर उठाकर खड़ा करता है। और वह प्रेम कहाँ सिद्ध होता है? वहीं, जहाँ तुम आज किसी मुश्किल इंसान से प्रेम करना चुनते हो। "जैसा वह है वैसे ही संसार में हम भी हैं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

जो कोई यह मान लेता है कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है, परमेश्वर उसमें बना रहता है, और वह परमेश्वर में।" ध्यान दे, यह रिश्ता दोनों तरफ़ से खुलता है। सिर्फ़ तू उसमें नहीं बसता, वह भी तुझमें बसता है। जिन लोगों को यूहन्ना लिख रहा था, उनके लिए यह अंगीकार करना महँगा पड़ता था। आज तू किन जगहों पर चुप रह जाता है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

प्रेम में भय नहीं होता, वरन् सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है, क्योंकि भय का सम्बन्ध दण्ड से होता है।" गौर कीजिए, यूहन्ना कहता है कि डर हमेशा सज़ा की आशा रखता है। अगर आप आज भी परमेश्वर के सामने आते हुए सिकुड़ जाते हैं, मानो कोई वार होने वाला है, तो सवाल यह नहीं कि उसका प्रेम कम है। सवाल यह है कि आपने उसे अपने भीतर कितनी गहराई तक उतरने दिया है।

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