12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

2 कुरिन्थियों 5

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस यहाँ एक तस्वीर से शुरुआत करता है जो हम सब समझ सकते हैं। हमारा शरीर एक तंबू है। तंबू ठोस घर नहीं होता। वह हिलता है, फटता है, बूढ़ा होता है, और एक दिन गिर जाता है। यह असुविधाजनक सच्चाई है, पर पौलुस इसे छिपाता नहीं। वह कहता है कि हम इस तंबू में "कराहते" हैं। बीमारी में, थकान में, टूटन में, इस दुनिया के बोझ के नीचे।

पर उसी साँस में वह कहता है कि परमेश्वर के पास स्वर्ग में हमारे लिए एक "भवन" तैयार है। हाथों से बना नहीं, चिरस्थाई। और इसकी गारंटी क्या है? पवित्र आत्मा, जो परमेश्वर ने हमें "बयाने में" यानी अग्रिम राशि के रूप में दिया है। जैसे कोई बड़ी खरीदारी का पहला हिस्सा चुका देता है यह दिखाने के लिए कि बाकी भी आएगा।

फिर पौलुस एक तीखी बात कहता है: "हम रूप को देखकर नहीं, पर विश्वास से चलते हैं।" यानी हम जो आँखों से देख सकते हैं उस पर नहीं टिकते। हमारी नज़र आगे की ओर है।

आगे वह मसीह के न्याय आसन का ज़िक्र करता है। हर एक का हाल खुलेगा। हर एक अपने कामों का बदला पाएगा। यह डराने के लिए नहीं कहा गया, पर यह सच्चाई है जिसे पौलुस दबाता नहीं।

फिर वह अपने जीवन की धुरी बताता है: "मसीह का प्रेम हमें विवश कर देता है।" मसीह सब के लिए मरा, ताकि जो जीवित हैं वे अपने लिए नहीं, बल्कि उसके लिए जिएँ। और जो कोई मसीह में है, वह "नई सृष्टि" है। पुरानी बातें बीत गईं।

अंत में सबसे गहरी बात, आयत 21: जो पाप से पूरी तरह अनजान था, उसी को परमेश्वर ने हमारे लिए पाप ठहराया, ताकि हम उसमें परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ। एक अदला-बदली। उसका शुद्ध जीवन हमारे नाम, हमारा गंदा रिकॉर्ड उसके नाम।

इसका क्या अर्थ है?

पौलुस दो सच्चाइयों को एक साथ पकड़ता है, और यह असामान्य है। एक तरफ वह ईमानदार है: यह ज़िंदगी बोझिल है, यह शरीर टूटता है, हम कराहते हैं। दूसरी तरफ वह निराश नहीं है: कुछ आ रहा है जो इस सब को हल्का कर देगा।

आजकल दो झूठ चलते हैं। पहला: "सब ठीक है, बस पॉजिटिव सोचो।" दूसरा: "कुछ भी सार्थक नहीं, सब बेकार है।" पौलुस इन दोनों को नकारता है। हाँ, दर्द असली है। हाँ, आशा भी असली है। दोनों साथ रह सकती हैं।

और यह आशा भावुक कल्पना नहीं है। इसका आधार है: मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान, और पवित्र आत्मा जो अभी हमारे भीतर है, एक अग्रिम भुगतान की तरह।

मूल धागा

अध्याय 21वीं आयत तक पहुँचकर पूरी बात खुलती है। यह पूरा पत्र, यह पूरी सुसमाचार, एक अदला-बदली पर टिका है। यीशु ने कोई पाप नहीं किया था। एक भी नहीं। फिर भी क्रूस पर परमेश्वर ने उसे उस स्थान पर रखा जहाँ हमें होना चाहिए था। उसने हमारा दोष लिया, हमने उसकी धार्मिकता पाई।

यह "मेल मिलाप" शब्द जो पौलुस बार-बार इस्तेमाल करता है, वह इसी की बात है। दो पक्ष जो अलग हो गए थे, फिर से जुड़ गए। परमेश्वर ने पहल की। हमने नहीं। और अब वह हमें "राजदूत" कहता है, यानी उसके प्रतिनिधि, जो दूसरों से कहते हैं: तुम भी परमेश्वर के साथ मेल मिलाप कर लो।

पूरी बाइबल की कहानी यही है, अदन से लेकर प्रकाशितवाक्य तक। परमेश्वर टूटे हुए रिश्ते को जोड़ रहा है। और यीशु वह पुल है।

तुम्हारे लिए

तेरह-चौदह साल की उम्र से लेकर आगे तक, एक सवाल लगातार पीछा करता है: "मैं कौन हूँ?" स्कूल में एक पहचान, दोस्तों में दूसरी, इंस्टाग्राम पर तीसरी, घर में चौथी। ऐसा लगता है जैसे तुम्हें अपनी पहचान खुद गढ़नी है, और अगर सही नहीं गढ़ी तो कोई तुम्हें स्वीकार नहीं करेगा।

पौलुस यहाँ एक अलग बात कहता है। "यदि कोई मसीह में है, तो वह नई सृष्टि है।" तुम्हारी पहचान तुम्हें गढ़नी नहीं है। मसीह में वह पहले से दी गई है। तुम परमेश्वर की धार्मिकता में खड़े हो, इसलिए नहीं कि तुमने कमाई है, पर इसलिए कि यीशु ने तुम्हें दी है।

यह बात दो चीज़ें बदल देती है। पहला, तुम्हें साबित करने की ज़रूरत नहीं कि तुम काफ़ी हो। तुम काफ़ी हो, क्योंकि मसीह काफ़ी है। दूसरा, तुम अपने लिए नहीं जीते। "जो जीवित हैं, वे आगे को अपने लिये न जीएँ।" यह बंधन नहीं, यह मुक्ति है। क्योंकि अपने लिए जीना थका देता है। हर पल खुद को केंद्र में रखना बोझ है।

और जब जीवन कठिन हो, जब कराहना असली हो, याद रख: यह तंबू है। स्थायी घर आ रहा है। पवित्र आत्मा उसकी गारंटी है, अभी, तुम्हारे भीतर।

इस पर बात करो

यदि तुम मसीह में "नई सृष्टि" हो, तो तुम्हारे रोज़मर्रा के जीवन में, तुम्हारे फ़ोन पर, तुम्हारे दोस्तों के साथ, तुम्हारी सोच में, क्या ऐसा कुछ है जो अब पुराना लगता है और बदलने की ज़रूरत है?

पौलुस कहता है कि हम "विश्वास से चलते हैं, रूप से नहीं।" तुम्हारे जीवन का कौन-सा हिस्सा तुम्हें विश्वास करना कठिन बनाता है, क्योंकि जो तुम देखते हो वह विपरीत लगता है?

एक साथ प्रार्थना

परमेश्वर, आप जानते हैं कि यह शरीर, यह जीवन, कई बार बोझिल लगता है। धन्यवाद कि आपने हमें एक स्थायी घर का वादा दिया है, और आत्मा को उसकी गारंटी के रूप में हमारे भीतर रखा है। धन्यवाद कि यीशु ने वह जगह ली जो हमारी थी। हमें सिखाइए कि हम अपने लिए नहीं, उसके लिए जिएँ जो हमारे लिए मरा और जी उठा। आमीन।

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2 कुरिन्थियों 5 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

2 कुरिन्थियों 5 किस विषय में है?
पौलुस यहाँ एक तस्वीर से शुरुआत करता है जो हम सब समझ सकते हैं। हमारा शरीर एक तंबू है। तंबू ठोस घर नहीं होता। वह हिलता है, फटता है, बूढ़ा होता है, और एक दिन गिर जाता है। यह असुविधाजनक सच्चाई है, पर पौलुस इसे छिपाता नहीं। वह कहता है कि हम इस तंबू में "कराहते" हैं। बीमारी में, थकान में, टूटन में, इस दुनिया के बोझ के नीचे।
2 कुरिन्थियों 5 क्या कहता है?
फिर वह अपने जीवन की धुरी बताता है: "मसीह का प्रेम हमें विवश कर देता है।" मसीह सब के लिए मरा, ताकि जो जीवित हैं वे अपने लिए नहीं, बल्कि उसके लिए जिएँ। और जो कोई मसीह में है, वह "नई सृष्टि" है। पुरानी बातें बीत गईं।
2 कुरिन्थियों 5 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
और यह आशा भावुक कल्पना नहीं है। इसका आधार है: मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान, और पवित्र आत्मा जो अभी हमारे भीतर है, एक अग्रिम भुगतान की तरह।
किशोर 2 कुरिन्थियों 5 से क्या सीख सकते हैं?
तेरह-चौदह साल की उम्र से लेकर आगे तक, एक सवाल लगातार पीछा करता है: "मैं कौन हूँ?" स्कूल में एक पहचान, दोस्तों में दूसरी, इंस्टाग्राम पर तीसरी, घर में चौथी। ऐसा लगता है जैसे तुम्हें अपनी पहचान खुद गढ़नी है, और अगर सही नहीं गढ़ी तो कोई तुम्हें स्वीकार नहीं करेगा।
2 कुरिन्थियों 5 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
यदि तुम मसीह में "नई सृष्टि" हो, तो तुम्हारे रोज़मर्रा के जीवन में, तुम्हारे फ़ोन पर, तुम्हारे दोस्तों के साथ, तुम्हारी सोच में, क्या ऐसा कुछ है जो अब पुराना लगता है और बदलने की ज़रूरत है?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

पौलुस यह बात वहाँ कहता है जहाँ वह समझा रहा है कि अब वह किसी को शरीर के अनुसार नहीं पहचानता। "इसलिए यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, सब बातें नई हो गई हैं।" ध्यान दे, यह कल की आशा नहीं, बीता हुआ काम है। तो जिस इंसान को तू आज तक उसके पुराने रूप में देखता आया है, क्या तू उसे नई सृष्टि मान पाएगा?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

पौलुस कहता है, "यदि हम बेसुध हैं, तो परमेश्वर के लिये; और यदि चैतन्य हैं, तो तुम्हारे लिये हैं।" कुरिन्थ के लोग उस पर हँसते थे कि वह जुनूनी है, पागल है। पौलुस बचाव नहीं करता, बस इतना कहता है कि उसकी दीवानगी परमेश्वर के सामने है, और उसकी समझदारी उनकी भलाई के लिए।

सोचो, क्या तुम्हारा प्रेम भी ऐसा है? जो आँसू, जो प्रार्थनाएँ दुनिया को बेतुकी लगें, वे परमेश्वर के लिए हों; और जो शब्द तुम बोलते हो, वे दूसरे की भलाई के लिए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

पौलुस ने अभी अभी लिखा है कि हम शरीर में हों या शरीर से अलग, हमारी असली चाहत क्या है? यही, "हम यही लक्ष्य रखते हैं, कि चाहे साथ रहें, चाहे अलग रहें, हम उसे भाते रहें।"

सोचो, न स्वर्ग पाना लक्ष्य है, न दुख से बचना। बस उसे भाना। जैसे एक बच्चा दिनभर की छोटी छोटी बातों में पिता की मुस्कान ढूँढता है। आज तुम्हारा लक्ष्य क्या है?

छोटे बच्चों के लिए कुछ ढूँढ रहे हैं?

हमारे पास छोटे बच्चों (3-6 वर्ष) और प्राथमिक आयु (7-12) के लिए विशेष संस्करण भी हैं।

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For parents and teachers: किशोरों और युवाओं के लिए लिखा गया। युवा समूह, कन्फर्मेशन कक्षा, या व्यक्तिगत बाइबल अध्ययन के लिए उत्तम। This explanation is generated automatically by language models. While we strive for theological soundness, the software can make mistakes.

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