2 तीमुथियुस 1
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
पौलुस यह पत्र जेल की कोठरी से लिख रहा है। वह जानता है कि उसका समय कम है, और वह तीमुथियुस को लिख रहा है, जो उसका आत्मिक बेटा और सबसे भरोसेमंद साथी है। यह चिट्ठी किसी उपदेशक की औपचारिक शिक्षा नहीं है, यह एक बूढ़े आदमी की आखिरी बातें हैं, जो उस युवा को लिख रहा है जिसे वह सबसे ज्यादा प्यार करता है।
पौलुस याद दिलाता है कि तीमुथियुस के आँसू उसे भूलते नहीं। वह उसकी नानी लोइस और माता यूनीके के विश्वास को याद करता है, जो पहले उनमें था और अब तीमुथियुस में भी है। फिर वह कुछ सीधा कहता है, उस वरदान को फिर से प्रज्वलित कर, जो हाथ रखने से तुझे मिला। यानी, विश्वास कभी अपने आप जलता नहीं रहता, उसे हवा देनी पड़ती है।
फिर आता है वह कलम जो पूरे अध्याय की धुरी है, परमेश्वर ने हमें भय की नहीं पर सामर्थ्य, प्रेम, और संयम की आत्मा दी है। पौलुस उसे शर्मिंदा न होने के लिए कहता है, न प्रभु की गवाही से, न पौलुस के कैदी होने से, बल्कि उसके साथ सुसमाचार के लिए दुःख उठाने के लिए कहता है। वह उद्धार की पूरी कहानी को समेटता है, यह हमारे कामों से नहीं बल्कि परमेश्वर की मनसा और अनुग्रह से हुआ, जो अनादिकाल से मसीह यीशु में था, और अब यीशु के प्रगट होने से खुला है, जिसने मृत्यु को नाश किया और जीवन को उजागर किया।
अंत में पौलुस दो चित्र देता है, आसिया के लोग जो उससे मुँह मोड़ गए, और उनेसिफुरूस, जो शर्मिंदा हुए बिना, ढूँढ़ कर उससे मिलने आया।
इसका क्या अर्थ है?
यह अध्याय डर के बारे में बहुत ईमानदार है। तीमुथियुस डरा हुआ था, शायद पीछे हटने की कगार पर था। पौलुस उसे यह नहीं कहता कि डरना बुरी बात है और बस हिम्मत रख। वह कहता है, यह डर परमेश्वर की तरफ से नहीं है। भय एक आत्मा है, एक शक्ति है जो तुझ पर हावी होना चाहती है, लेकिन परमेश्वर ने तुझे कुछ और दिया है, सामर्थ्य, प्रेम, और संयम।
यह बात आज उतनी ही सच है जितनी तब थी। तुम्हारे अंदर जो डर बैठा है, चाहे वह सामाजिक अस्वीकृति का हो, असफलता का हो, या अपने विश्वास के कारण मज़ाक उड़ाए जाने का हो, वह परमेश्वर की तरफ से नहीं आया। यह अध्याय यह भी मानता है कि विश्वास की राह पर लोग तुम्हें छोड़ देंगे। आसिया के सारे लोग पौलुस से फिर गए। यह अकेलापन असली है, बाइबल इसे छिपाती नहीं।
मुख्य सूत्र
इस अध्याय का केंद्र यह वाक्य है, जिसने मृत्यु का नाश किया, और जीवन और अमरता को सुसमाचार के द्वारा प्रकाशमान कर दिया। यह पूरी बाइबल की कहानी का शिखर है। परमेश्वर की योजना कोई नई बात नहीं थी जो पौलुस के समय शुरू हुई, यह अनादिकाल से मसीह यीशु में तय थी। सृष्टि से पहले ही परमेश्वर ने ठान लिया था कि वे प्रेम से, अनुग्रह से, अपने लोगों को बचाएँगे, न कि उनके कामों के आधार पर।
यीशु का जी उठना केवल एक चमत्कार नहीं, यह मृत्यु की सत्ता का टूटना है। जिस मौत से हर इंसान डरता है, चाहे वह खुलकर मानें या न मानें, उसे यीशु ने अपने भीतर से तोड़ दिया। इसीलिए पौलुस जेल में बैठकर भी शर्मिंदा नहीं है। उसकी धरोहर, उसका विश्वास, किसी इंसान के हाथ में नहीं बल्कि उस परमेश्वर के हाथ में है जो उस दिन तक उसकी रखवाली करने में सक्षम है।
आपके लिए
तुम शायद जेल में नहीं हो, पर तुम्हारे भीतर भी कहीं न कहीं शर्म बैठी है। शायद यह डर कि क्लास में कोई तुम्हारा मज़ाक उड़ाएगा अगर पता चले कि तुम प्रार्थना करते हो। शायद यह चुप्पी जब कोई विश्वास पर सवाल उठाए और तुम्हें जवाब नहीं आता। इस अध्याय की भाषा साफ है, यह भय परमेश्वर की तरफ से नहीं है। तुम्हें दिखावा करने की जरूरत नहीं कि तुम सब कुछ जानते हो, बस यह जानने की जरूरत है कि तुमने किस पर विश्वास रखा है।
एक और बात जो यह अध्याय दिखाता है, विश्वास अक्सर पीढ़ियों से आता है, पर वह विरासत में मिलने के बाद भी तुम्हारा अपना बनना जरूरी है। लोइस और यूनीके का विश्वास तीमुथियुस का अपना बन गया। अगर तुम्हारे घर में विश्वास की परंपरा रही है, तो सवाल यह है कि क्या वह अब तुम्हारी अपनी आग है या सिर्फ किसी और से उधार ली हुई राख। और अगर तुम्हारे आसपास लोग विश्वास छोड़ रहे हैं, तो याद रखो, उनेसिफुरूस जैसे लोग भी होते हैं, जो तब भी साथ खड़े रहते हैं जब साथ खड़े रहना महँगा पड़ता है। बनो वैसे ही।
चर्चा करें
क्या तुम्हारे जीवन में ऐसा कोई डर है जो तुम्हें अपने विश्वास के बारे में खुलकर बोलने से रोकता है? वह डर कहाँ से आता है?
क्या तुम्हारा विश्वास अभी भी सिर्फ तुम्हारे माता-पिता या परिवार का विश्वास है, या वह अब सचमुच तुम्हारा अपना बन चुका है?
साथ मिलकर प्रार्थना
परमेश्वर, आपने हमें भय की आत्मा नहीं दी, बल्कि सामर्थ्य, प्रेम, और संयम की आत्मा दी है। जब हम डरते हैं और चुप रह जाते हैं, तब हमें याद दिलाइए कि आपने हमें बुलाया है। जिस पर हमने विश्वास रखा है, उसे हम जानते हैं, और हमें भरोसा है कि आप हमारी रखवाली अंत तक करते हैं। आमीन।
2 तीमुथियुस 1 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
2 तीमुथियुस 1 किस विषय में है?
2 तीमुथियुस 1 क्या कहता है?
2 तीमुथियुस 1 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर 2 तीमुथियुस 1 से क्या सीख सकते हैं?
2 तीमुथियुस 1 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
पौलुस जंजीरों में था, और तीमुथियुस डरा हुआ। ऐसे में यह वचन आता है: "क्योंकि परमेश्वर ने हमें भय की आत्मा नहीं, परन्तु सामर्थ्य, और प्रेम, और संयम की आत्मा दी है।" ध्यान दे, सामर्थ्य के साथ प्रेम और संयम भी है। डर तुझे चुप कराता है, पर जो आत्मा तुझमें है, वह तुझे बोलने, थामने और टिके रहने की ताकत देती है। आज तू किस डर के आगे झुका है?
पौलुस जेल में है, तीमुथियुस डरा हुआ है, और ठीक इसी घड़ी पौलुस उसे याद दिलाता है: "जिसने हमारा उद्धार किया, और पवित्र बुलाहट से बुलाया, और यह हमारे कामों के अनुसार नहीं।"
सोचो, तुम्हारी बुलाहट उस दिन शुरू नहीं हुई जब तुमने विश्वास किया। वह अनुग्रह "अनादि काल से" तुम्हारे लिए रखा गया था। तुम्हारे अच्छे दिनों ने उसे कमाया नहीं, तो तुम्हारे बुरे दिन उसे छीन भी नहीं सकते।
पौलुस जंजीरों में था, और बहुत से लोग उससे दूर हट गए। पर उनेसिफुरुस के बारे में वह लिखता है, "उसने बहुत बार मेरे जी को ठंडा किया, और मेरी जंजीरों से लज्जित न हुआ।" सोचो, किसी के दुख से जुड़ जाना आज भी शर्म की बात मानी जाती है। तुम्हारे आसपास कोई ऐसा है जिसकी जंजीरें देखकर लोग मुँह फेर लेते हैं? उसे ढूँढ़ो।
जेल की कोठरी से, जंजीरों में बंधा पौलुस अपने बेटे जैसे तीमुथियुस को लिखता है, "जो खरी बातें तूने मुझसे सुनी हैं उनको उस विश्वास और प्रेम के साथ जो मसीह यीशु में है, अपना आदर्श बनाकर रख।" सिर्फ सही बात पकड़े रखना काफी नहीं। उसे विश्वास और प्रेम के साथ थामना है। वरना सच्चाई हथियार बन जाती है। तेरी बातें सही हैं, पर क्या उनमें गर्माहट भी है?
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