12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

1 यूहन्ना 5

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

यह चिट्ठी का आखिरी अध्याय है, और यूहन्ना यहाँ उन तारों को एक गाँठ में बाँधते हैं जिन्हें वे पूरी चिट्ठी में बुनते आए हैं: विश्वास, प्रेम, और जीवन।

शुरुआत एक दावे से होती है: "जिसका यह विश्वास है कि यीशु ही मसीह है, वह परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है।" ध्यान दो, क्रम उल्टा नहीं है। यूहन्ना यह नहीं कहते कि तुम पहले अपने आप को सुधारो, फिर परमेश्वर तुम्हें अपनाएगा। वे कहते हैं कि जहाँ यह विश्वास जीवित है, वहाँ पहले ही एक नया जन्म हो चुका है। और जो पिता से प्रेम रखता है, वह उसके परिवार से भी प्रेम रखेगा। परमेश्वर से प्रेम और भाई-बहनों से प्रेम को यूहन्ना अलग नहीं कर सकते।

फिर एक वाक्य आता है जो बहुत लोगों को चुभता है: "उसकी आज्ञाएँ बोझदायक नहीं।" यह उस आदमी की बात है जिसने अनुभव किया है कि परमेश्वर की माँगें बाहर से लादे गए नियम नहीं, बल्कि उस नए स्वभाव के अनुरूप हैं जो उसने भीतर दिया है।

आगे युद्ध की भाषा आती है। "संसार" यहाँ पेड़-पहाड़ नहीं, बल्कि वह पूरा तंत्र है जो परमेश्वर के बिना जीना चाहता है। यूहन्ना कहते हैं कि इस संसार पर जय पाने वाला हथियार तलवार नहीं, "वह विजय जिससे संसार पर जय प्राप्त होती है हमारा विश्वास है।"

पद 6 से 12 अदालत जैसा लगता है। तीन गवाह पेश किए जाते हैं: आत्मा, पानी, और लहू। पानी शायद यीशु का बपतिस्मा है, वह क्षण जब उनकी सेवकाई शुरू हुई; लहू क्रूस है, जहाँ वह सेवकाई पूरी हुई। और पवित्र आत्मा इन दोनों की गवाही देते हैं। यूहन्ना उन लोगों को जवाब दे रहे हैं जो कहते थे कि मसीह ने सचमुच दुख नहीं उठाया, कि लहू वाला हिस्सा असली नहीं था। नहीं, वे कहते हैं, वह "पानी और लहू दोनों के द्वारा आया था।"

और गवाही का सार यह है: "परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन दिया है और यह जीवन उसके पुत्र में है।" फिर वह तेज़ धार वाला वाक्य: "जिसके पास पुत्र है, उसके पास जीवन है।"

अंत में प्रार्थना में साहस, एक कठिन हिस्सा उस पाप के बारे में "जिसका फल मृत्यु है", और तीन बार दोहराया गया "हम जानते हैं"। सबसे आखिर में एक छोटी चेतावनी: "अपने आपको मूरतों से बचाए रखो।"

इसका अर्थ क्या है?

यूहन्ना निश्चितता के बारे में लिख रहे हैं, और वे इसे भावनाओं पर नहीं टिकाते। वे कहते हैं: "मैंने तुम्हें… इसलिए लिखा है कि तुम जानो कि अनन्त जीवन तुम्हारा है।" जानो, न कि आशा करो, न कि महसूस करो।

यह ज़रूरी है, क्योंकि विश्वास की सबसे थकाने वाली चीज़ अक्सर संदेह नहीं होती, बल्कि यह लगातार अंदाज़ा लगाना होता है कि मैं परमेश्वर के साथ ठीक हूँ या नहीं। यूहन्ना इस अंदाज़े को खत्म करना चाहते हैं। वे कहते हैं: गवाही तुम्हारे मूड में नहीं, इतिहास में है। यीशु आए। उनका लहू बहा। आत्मा गवाही देते हैं।

अब उन दो मुश्किल जगहों पर ईमानदारी से बात करें। पद 18 कहता है कि परमेश्वर से उत्पन्न व्यक्ति "पाप नहीं करता", जबकि इसी चिट्ठी के पहले अध्याय में यूहन्ना ने कहा था कि जो कहता है मैंने पाप नहीं किया, वह झूठा है। विरोधाभास नहीं है। यूहन्ना कहीं इंसान के गिरने की बात करते हैं, और यहाँ जीवन की दिशा की बात करते हैं। नया जन्म पाया व्यक्ति पाप में बसता नहीं, वह वहाँ घर नहीं बनाता। वह गिरता है और उठता है, क्योंकि कोई है जो "उसे बचाए रखता है"।

और वह पाप "जिसका फल मृत्यु है"? यूहन्ना इसे समझाते नहीं, और हमें उसकी जगह नहीं भरनी चाहिए। सबसे संभावित अर्थ यह है: वह जानबूझकर, अंत तक टिका रहने वाला इंकार, जो उस गवाही को ठुकरा देता है और मुड़ना ही नहीं चाहता। जो व्यक्ति डरता है कि उसने वह पाप कर दिया, उसका डर ही सबूत है कि उसने नहीं किया। जो सचमुच मुड़ चुका होता, वह परवाह ही नहीं करता।

मुख्य सूत्र

पूरा अध्याय एक व्यक्ति के आसपास घूमता है। ध्यान दो कि यूहन्ना कहीं यह नहीं कहते कि परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन का एक वादा या एक प्रमाणपत्र दिया है। वे कहते हैं: "यह जीवन उसके पुत्र में है।" जीवन एक चीज़ नहीं जो हाथ में पकड़ी जाती है, वह एक रिश्ता है जिसमें रहा जाता है।

पूरे पुराने नियम में परमेश्वर बार-बार कहते थे: मैं तुम्हारा परमेश्वर, तुम मेरी प्रजा। मूरतों से दूर रहो, क्योंकि वे झूठ बोलती हैं और कुछ नहीं देतीं। यूहन्ना उस पूरी कहानी के अंत में खड़े होकर कहते हैं: "परमेश्वर का पुत्र आ गया है और उसने हमें समझ दी है, कि हम उस सच्चे को पहचानें।" जिस परमेश्वर को इस्राएल दूर से जानता था, वह अब देह में हमारे बीच चला, बपतिस्मा लिया, और लहू बहाया। यही अंतिम गवाही है।

तुम्हारे लिए

पद 21 पहली नज़र में पुराना लगता है। हम मूर्तियों की पूजा तो नहीं करते। लेकिन मूरत का असली मतलब है: कोई चीज़ जिससे तुम अपनी कीमत निकालते हो। नंबर, चाहे वे अंक हों या फॉलोअर्स। किसी एक व्यक्ति की मंज़ूरी जिसके बिना तुम अपने आप को कुछ नहीं समझते। तुम्हारी वह छवि जो तुम ऑनलाइन बनाते और बचाते हो। ये सब झूठ नहीं बोलतीं, वे केवल एक शर्त रखती हैं: बने रहो, वरना तुम्हारा मूल्य खत्म। यही मूरत की पहचान है, वह हमेशा माँगती है और कभी सुरक्षा नहीं देती।

एक ठोस चुनौती। इस हफ्ते एक बार वह चीज़ जान-बूझकर छोड़ दो जिसके ज़रिए तुम अपनी कीमत नापते हो। कोई पोस्ट जो तुमने सोच-समझकर तैयार कर रखी है, उसे मत डालो। किसी की तारीफ़ जिसे तुम खींचकर निकालते हो, उसे मत खींचो। और उस खाली, असहज जगह में परमेश्वर से यह कहो: मैं जानना चाहता हूँ कि आप में मेरी कीमत क्या है। यूहन्ना कहते हैं कि प्रार्थना में हमें "साहस" है, तो साहस से माँगो।

और दूसरी बात: पद 16 के हिसाब से जब तुम किसी को गिरते देखो, तो पहला कदम गपशप नहीं, प्रार्थना है। किसी एक व्यक्ति का नाम चुनो जिसके बारे में तुम्हें चिंता है, और उसे कुछ भी कहने से पहले उसके लिए प्रार्थना करो।

इस पर बात करें

जो चीज़ तुम्हारी अपनी नज़र में तुम्हारी कीमत तय करती है, उसका नाम ईमानदारी से क्या है? और उसके छूट जाने की कल्पना करने पर भीतर क्या होता है?

यूहन्ना कहते हैं "उसकी आज्ञाएँ बोझदायक नहीं।" तुम्हारे अनुभव में यह सच लगता है या नहीं, और क्यों?

मिलकर प्रार्थना

परमेश्वर, आपने अपने पुत्र के विषय में गवाही दी है, और वह गवाही मेरे मन के मूड से बड़ी है। जहाँ मेरा विश्वास डोलता है, वहाँ आप मुझे थामे रखिए। मेरी उन मूरतों को दिखाइए जिन्हें मैं मूरत कहना भी नहीं चाहता, और मुझे उनसे बचाए रखिए। यीशु मसीह में जो जीवन है, उसी में मुझे रहना सिखाइए। आमीन।

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1 यूहन्ना 5 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

1 यूहन्ना 5 किस विषय में है?
यह चिट्ठी का आखिरी अध्याय है, और यूहन्ना यहाँ उन तारों को एक गाँठ में बाँधते हैं जिन्हें वे पूरी चिट्ठी में बुनते आए हैं: विश्वास, प्रेम, और जीवन।
1 यूहन्ना 5 क्या कहता है?
पद 6 से 12 अदालत जैसा लगता है। तीन गवाह पेश किए जाते हैं: आत्मा, पानी, और लहू। पानी शायद यीशु का बपतिस्मा है, वह क्षण जब उनकी सेवकाई शुरू हुई; लहू क्रूस है, जहाँ वह सेवकाई पूरी हुई। और पवित्र आत्मा इन दोनों की गवाही देते हैं। यूहन्ना उन लोगों को जवाब दे रहे हैं जो कहते थे कि मसीह ने सचमुच दुख नहीं उठाया, कि लहू वाला हिस्सा असली नहीं था। नहीं, वे कहते हैं, वह "पानी और लहू दोनों के द्वारा आया था।"
1 यूहन्ना 5 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह ज़रूरी है, क्योंकि विश्वास की सबसे थकाने वाली चीज़ अक्सर संदेह नहीं होती, बल्कि यह लगातार अंदाज़ा लगाना होता है कि मैं परमेश्वर के साथ ठीक हूँ या नहीं। यूहन्ना इस अंदाज़े को खत्म करना चाहते हैं। वे कहते हैं: गवाही तुम्हारे मूड में नहीं, इतिहास में है। यीशु आए। उनका लहू बहा। आत्मा गवाही देते हैं।
किशोर 1 यूहन्ना 5 से क्या सीख सकते हैं?
पूरे पुराने नियम में परमेश्वर बार-बार कहते थे: मैं तुम्हारा परमेश्वर, तुम मेरी प्रजा। मूरतों से दूर रहो, क्योंकि वे झूठ बोलती हैं और कुछ नहीं देतीं। यूहन्ना उस पूरी कहानी के अंत में खड़े होकर कहते हैं: "परमेश्वर का पुत्र आ गया है और उसने हमें समझ दी है, कि हम उस सच्चे को पहचानें।" जिस परमेश्वर को इस्राएल दूर से जानता था, वह अब देह में हमारे बीच चला, बपतिस्मा लिया, और लहू बहाया। यही अंतिम गवाही है।
1 यूहन्ना 5 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
जो चीज़ तुम्हारी अपनी नज़र में तुम्हारी कीमत तय करती है, उसका नाम ईमानदारी से क्या है? और उसके छूट जाने की कल्पना करने पर भीतर क्या होता है?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

तो यह भी जानते हैं, कि जो कुछ हमने उससे माँगा है, वह पाया है।" ध्यान दो, यूहन्ना यह नहीं कहता कि मिलेगा। वह कहता है, मिल चुका है। तुम्हारी प्रार्थना अभी हवा में लटकी नहीं है। जिस पल परमेश्वर ने सुना, उसी पल उत्तर तय हो गया, भले तुम्हारी आँखें उसे अभी न देख पाएँ। शायद आज तुम्हें धीरज ही माँगना है, जवाब नहीं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

जो परमेश्वर के पुत्र पर विश्वास करता है, वह अपने ही में गवाही रखता है।" यह गवाही कहीं दूर मंदिर या किताब में नहीं, तेरे भीतर रखी है। जब मन डगमगाए, तो बाहर प्रमाण ढूँढ़ने से पहले भीतर झाँक। जिस क्षण यीशु ने तुझे बदला, वही परमेश्वर की सच्चाई का हस्ताक्षर है। उस पर अविश्वास करना सिर्फ़ कमज़ोरी नहीं, परमेश्वर को झूठा कहना है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 3

और उसकी आज्ञाएँ कठिन नहीं," यूहन्ना यह उस समय लिख रहा है जब विश्वासी सताए जा रहे थे। फिर भी वह कहता है कि बोझ आज्ञा में नहीं, हमारे मन में होता है। जिससे हम प्रेम करते हैं, उसकी बात मानना कभी भारी नहीं लगता। सोचो, परमेश्वर की कौन सी बात तुम्हें आज भारी लग रही है? शायद सवाल आज्ञा का नहीं, प्रेम के ठंडे पड़ जाने का है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

जिसके पास पुत्र है, उसके पास जीवन है; और जिसके पास परमेश्वर का पुत्र नहीं, उसके पास जीवन भी नहीं है।" यूहन्ना यह नहीं कहता कि जिसके पास ज्ञान है, या जिसके पास अच्छे काम हैं। वह कहता है, जिसके पास पुत्र है। जीवन कोई चीज़ नहीं, एक व्यक्ति है। तो आज खुद से पूछ लो, मेरे पास मसीह के बारे में जानकारी है, या मसीह खुद?

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