12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

अय्यूब 12

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

अय्यूब 12 में अय्यूब अपने तीन मित्रों को जवाब दे रहा है। उन्होंने अभी-अभी उसे समझाया है कि दुःख का कारण पाप है, और अगर वह सच में परमेश्वर के सामने खरा होता तो यह सब झेलना न पड़ता। अय्यूब का जवाब सीधा और तीखा है: “निःसन्देह मनुष्य तो तुम ही हो, और जब तुम मरोगे तब बुद्धि भी जाती रहेगी” (पद 2)। यह व्यंग्य है, सीधा-सीधा ताना। वह कह रहा है, तुम ऐसे बोल रहे हो जैसे बुद्धि सिर्फ तुम्हारे पास हो, पर मुझमें भी समझ है, मैं तुमसे कमतर नहीं हूँ।

फिर वह अपने दर्द की असली जगह पर उंगली रखता है। वह वही आदमी है जो कभी परमेश्वर से प्रार्थना करता था और सुना जाता था, पर अब वही उसका मज़ाक उड़ाने का कारण बन गया है (पद 4)। सुखी लोग दुःखी लोगों को तुच्छ समझते हैं, यह उसने खुद अनुभव किया है (पद 5)। और फिर वह एक कड़वी सच्चाई बोलता है, डाकुओं के डेरे कुशल क्षेम से रहते हैं, जो परमेश्वर को क्रोध दिलाते हैं वे निडर जीते हैं (पद 6)। यानी दुनिया का हिसाब उतना सीधा नहीं है जितना उसके मित्र दिखा रहे हैं।

इसके बाद अय्यूब प्रकृति की ओर इशारा करता है, पशु, पक्षी, पृथ्वी, समुद्र की मछलियाँ, सब जानते हैं कि यहोवा ने ही यह संसार बनाया है (पद 7-9)। यह ज्ञान कोई नई बात नहीं जो उसके मित्र उसे सिखा रहे हों। असली मुद्दा परमेश्वर की महानता और सामर्थ्य है, जिसे अय्यूब पद 13 से 25 तक विस्तार से बयान करता है। परमेश्वर ही राजाओं को गिराते हैं, याजकों को बँधुआई में ले जाते हैं, बुद्धिमानों की बुद्धि छीन लेते हैं, जातियों को बढ़ाते और नाश करते हैं। यह चित्र आराम देने वाला नहीं, बल्कि हिला देने वाला है।

इसका क्या अर्थ है?

अय्यूब यहाँ अपने मित्रों के सरल सिद्धांत को तोड़ रहा है, अच्छे लोगों को अच्छा फल मिलता है, बुरों को बुरा। यह सिद्धांत सुनने में साफ-सुथरा लगता है, पर असली दुनिया इतनी साफ-सुथरी नहीं है। डाकू चैन से सोते हैं, धर्मी हँसी का पात्र बन जाता है। अय्यूब झूठी दिलासा नहीं चाहता, वह सच्चाई चाहता है, चाहे वह कितनी भी असहज क्यों न हो।

और फिर वह जो परमेश्वर का चित्र खींचता है, वह पूरी तरह नियंत्रण में रहने वाला परमेश्वर है, पर ऐसा नियंत्रण जो हमेशा हमारी समझ में नहीं आता। वे राजाओं को उठाते और गिराते हैं, ज्ञानियों को मूर्ख बना देते हैं, अंधकार में गहरी बातें प्रगट करते हैं। यह परमेश्वर छोटा नहीं है, इतना छोटा कि हम उसे अपने तर्क के डिब्बे में बंद कर सकें। अय्यूब यह मान रहा है कि परमेश्वर सर्वसामर्थी हैं, यह वह कभी नहीं छोड़ता, पर वह इस सामर्थ्य को आसान जवाबों में बदलने से इनकार करता है।

समान सूत्र

यह अध्याय पूरी बाइबल की एक गहरी लकीर को छूता है, यह विचार कि परमेश्वर का काम करने का तरीका हमेशा हमारी गणित की किताब जैसा साफ नहीं होता। यीशु मसीह ने खुद इसी सवाल का सामना किया, क्रूस पर लटके हुए, निर्दोष होते हुए भी सबसे बड़ा दुःख उठाते हुए। अय्यूब का दर्द, धर्मी होकर भी तिरस्कृत होना, क्रूस की छाया में और गहरा अर्थ पाता है। परमेश्वर ने वहाँ भी अपनी सामर्थ्य को हमारी अपेक्षा के अनुसार नहीं दिखाया, बल्कि क्रूस की कमज़ोरी के ज़रिए दिखाया। जो परमेश्वर राजाओं को गिराता और उठाता है, वही परमेश्वर एक दिन क्रूस पर मरने के लिए नीचे आया। अय्यूब 12 का परमेश्वर और गोलगोथा का परमेश्वर एक ही हैं, रहस्यमय, पर विश्वासयोग्य।

तुम्हारे लिए

तुम्हारी उम्र में यह सवाल बार-बार आता है, अगर परमेश्वर अच्छे हैं तो दुनिया इतनी उलझी हुई क्यों है? क्यों ईमानदार लोग नुकसान उठाते हैं और बेईमान आगे बढ़ते हैं? अय्यूब तुम्हें झूठी दिलासा नहीं देता, वह तुम्हें ईमानदार रहने की इजाज़त देता है। तुम्हें यह मानने की ज़रूरत नहीं कि हर दुःख का कोई साफ कारण होता है, या कि परमेश्वर हमेशा तुरंत समझाएँगे कि क्यों। अय्यूब की हिम्मत यह है कि वह गुस्सा और सवाल परमेश्वर के सामने ही रखता है, पीठ पीछे नहीं, बल्कि सीधे उनके सामने। यह विश्वास की कमज़ोरी नहीं, बल्कि गहराई है। अगली बार जब कोई तुम्हें आसान जवाब देने की कोशिश करे, तुम भी अय्यूब की तरह कह सकते हो, यह इतना सरल नहीं है। और साथ ही यह भी मान सकते हो कि परमेश्वर सामर्थी हैं, भले ही उनका तरीका तुम्हारी समझ से परे हो।

बात करें

अय्यूब कहता है कि दुःखी लोगों को अक्सर सुखी लोग तुच्छ समझते हैं। क्या तुमने अपने आस-पास या खुद में ऐसा कुछ देखा है?

अय्यूब परमेश्वर की सामर्थ्य को स्वीकार करता है, पर उनके तरीकों पर सवाल भी उठाता है। क्या तुम्हारे लिए यह मुमकिन है कि तुम परमेश्वर पर भरोसा भी करो और उनसे सवाल भी पूछो?

साथ में प्रार्थना

हे परमेश्वर, हमारी दुनिया उलझी हुई है, और कभी-कभी हमें आपके काम समझ नहीं आते। हमें झूठी दिलासा मत दीजिए, बल्कि हमें सच्चाई के साथ जीने की हिम्मत दीजिए। हमें विश्वास दीजिए कि आप सामर्थी हैं, भले ही हम आपके तरीकों को पूरी तरह न समझें। आमीन।

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अय्यूब 12 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

अय्यूब 12 किस विषय में है?
अय्यूब 12 में अय्यूब अपने तीन मित्रों को जवाब दे रहा है। उन्होंने अभी-अभी उसे समझाया है कि दुःख का कारण पाप है, और अगर वह सच में परमेश्वर के सामने खरा होता तो यह सब झेलना न पड़ता। अय्यूब का जवाब सीधा और तीखा है: “निःसन्देह मनुष्य तो तुम ही हो, और जब तुम मरोगे तब बुद्धि भी जाती रहेगी” (पद 2)। यह व्यंग्य है, सीधा-सीधा ताना। वह कह रहा है, तुम ऐसे बोल रहे हो जैसे बुद्धि सिर्फ तुम्हारे पास हो, पर मुझमें भी समझ है, मैं तुमसे कमतर नहीं हूँ।
अय्यूब 12 क्या कहता है?
इसके बाद अय्यूब प्रकृति की ओर इशारा करता है, पशु, पक्षी, पृथ्वी, समुद्र की मछलियाँ, सब जानते हैं कि यहोवा ने ही यह संसार बनाया है (पद 7-9)। यह ज्ञान कोई नई बात नहीं जो उसके मित्र उसे सिखा रहे हों। असली मुद्दा परमेश्वर की महानता और सामर्थ्य है, जिसे अय्यूब पद 13 से 25 तक विस्तार से बयान करता है। परमेश्वर ही राजाओं को गिराते हैं, याजकों को बँधुआई में ले जाते हैं, बुद्धिमानों की बुद्धि छीन लेते हैं, जातियों को बढ़ाते और नाश करते हैं। यह चित्र आराम देने वाला नहीं, बल्कि हिला देने वाला है।
अय्यूब 12 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
और फिर वह जो परमेश्वर का चित्र खींचता है, वह पूरी तरह नियंत्रण में रहने वाला परमेश्वर है, पर ऐसा नियंत्रण जो हमेशा हमारी समझ में नहीं आता। वे राजाओं को उठाते और गिराते हैं, ज्ञानियों को मूर्ख बना देते हैं, अंधकार में गहरी बातें प्रगट करते हैं। यह परमेश्वर छोटा नहीं है, इतना छोटा कि हम उसे अपने तर्क के डिब्बे में बंद कर सकें। अय्यूब यह मान रहा है कि परमेश्वर सर्वसामर्थी हैं, यह वह कभी नहीं छोड़ता, पर वह इस सामर्थ्य को आसान जवाबों में बदलने से इनकार करता है।
किशोर अय्यूब 12 से क्या सीख सकते हैं?
तुम्हारी उम्र में यह सवाल बार-बार आता है, अगर परमेश्वर अच्छे हैं तो दुनिया इतनी उलझी हुई क्यों है? क्यों ईमानदार लोग नुकसान उठाते हैं और बेईमान आगे बढ़ते हैं? अय्यूब तुम्हें झूठी दिलासा नहीं देता, वह तुम्हें ईमानदार रहने की इजाज़त देता है। तुम्हें यह मानने की ज़रूरत नहीं कि हर दुःख का कोई साफ कारण होता है, या कि परमेश्वर हमेशा तुरंत समझाएँगे कि क्यों। अय्यूब की हिम्मत यह है कि वह गुस्सा और सवाल परमेश्वर के सामने ही रखता है, पीठ पीछे नहीं, बल्कि सीधे उनके सामने। यह विश्वास की कमज़ोरी नहीं, बल्कि गहराई है। अगली बार जब कोई तुम्हें आसान जवाब देने की कोशिश करे, तुम भी अय्यूब की तरह कह सकते हो, यह इतना सरल नहीं है। और साथ ही यह भी मान सकते हो कि परमेश्वर सामर्थी हैं, भले ही उनका तरीका तुम्हारी समझ से परे हो।
अय्यूब 12 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
अय्यूब परमेश्वर की सामर्थ्य को स्वीकार करता है, पर उनके तरीकों पर सवाल भी उठाता है। क्या तुम्हारे लिए यह मुमकिन है कि तुम परमेश्वर पर भरोसा भी करो और उनसे सवाल भी पूछो?

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

अय्यूब अपने मित्रों के बीच बैठा है, जो उसे समझे बिना उसका न्याय कर रहे थे, और वह कहता है, "बल और खरी बुद्धि उसी के हैं; धोखा देनेवाला और धोखा खानेवाला दोनों उसी के वश में हैं।" जिसने तुझे ठगा, वह भी परमेश्वर के हाथ से बाहर नहीं। यह बात डराती भी है और चैन भी देती है। तुझे बदला लेने की ज़रूरत नहीं, हिसाब उसके पास सुरक्षित है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

अय्यूब अपने दोस्तों को याद दिला रहा है कि परमेश्वर की सामर्थ्य उसके लिए कोई नई खबर नहीं है: "जब वह जल को रोक रखता है, तब सब कुछ सूख जाता है; फिर जब उसे छोड़ देता है, तब उससे पृथ्वी उलट जाती है।"

सोच, वही हाथ सूखा भी देता है और बाढ़ भी। तेरे जीवन का सूखा मौसम किसी और के वश में नहीं है। जो रोक रखता है, वही सही समय पर खोल भी सकता है।

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