12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

न्यायियों 17

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

यह कहानी इस्राएल के इतिहास के सबसे उलझे हुए दौर से है, जब "इस्राएलियों का कोई राजा न था; जिसको जो ठीक जान पड़ता था वही वह करता था" (17:6)। मीका नाम का एक व्यक्ति एप्रैम के पहाड़ी क्षेत्र में रहता था। उसने अपनी माँ से चाँदी के ग्यारह सौ टुकड़े चुराए थे, जिनके लिए माँ ने श्राप भी दिया था, बिना यह जाने कि चोर उसका अपना बेटा है। जब मीका ने सच बता दिया और चाँदी लौटाई, तो माँ ने राहत की साँस लेते हुए उसे आशीष दी, और फिर वह चाँदी परमेश्वर को अर्पित करने की घोषणा करती है। पर ध्यान दें, अर्पण का तरीका क्या है, दो मूरतें बनवाना, एक खोदी हुई और एक ढाली हुई। मीका के पास पहले से एक "देवस्थान" था, वह वहाँ एपोद और गृहदेवता (घर के देवता) रखता है, और अपने ही बेटे को पुरोहित बना देता है।

फिर कहानी में एक जवान लेवीय आता है, जो बैतलहम से निकलकर कहीं ठिकाना खोज रहा था। लेवीय वे लोग थे जिन्हें परमेश्वर ने खास तौर पर मंदिर की सेवा और लोगों को उसकी व्यवस्था सिखाने के लिए अलग किया था। मीका उसे प्रस्ताव देता है, "मेरे लिये पिता और पुरोहित बन," और बदले में रुपये, कपड़े और भोजन का वायदा करता है। लेवीय मान जाता है, और मीका उसका "संस्कार" करके उसे अपना निजी पुरोहित बना लेता है। अध्याय के आखिरी वाक्य में मीका का भरोसा झलकता है, "अब मैं जानता हूँ कि यहोवा मेरा भला करेगा।"

इसका अर्थ क्या है?

यह अध्याय बड़े आराम से पढ़ा जा सकता है, कोई हिंसा नहीं, कोई युद्ध नहीं, बस एक घरेलू सी कहानी। लेकिन यही इसकी चेतावनी है। मीका परमेश्वर का नाम लेता है, उसकी आशीष माँगता है, उसे अर्पण चढ़ाता है, और अंत में यहोवा पर भरोसा भी जताता है। पर उसकी पूरी भक्ति उसी की अपनी सोच के अनुसार बनी है। वह मूरतें बनवाता है जबकि परमेश्वर ने साफ मना किया था कि उनकी कोई मूरत न बनाई जाए। वह अपने बेटे को, फिर एक अजनबी लेवीय को पुरोहित बनाता है, जबकि परमेश्वर ने सिर्फ हारून के वंश को यह जिम्मेदारी दी थी। मीका धर्म को अपनी मर्जी के हिसाब से जोड़-तोड़ कर बना लेता है, और उसे यकीन है कि यह परमेश्वर को भी पसंद आएगा।

यही है "जिसको जो ठीक जान पड़ता था वही वह करता था" का असली मतलब। यह अराजकता की बात नहीं है, बल्कि एक सभ्य, धार्मिक दिखने वाले आदमी की बात है, जो अपने भीतर के विश्वास को ही सच मान बैठा है। खतरा वहाँ नहीं होता जहाँ लोग खुलकर परमेश्वर को नकार दें, खतरा वहाँ होता है जहाँ लोग परमेश्वर का नाम लेते रहें, पर उसकी बात सुनना बंद कर दें।

समान सूत्र

यह पूरी किताब बार-बार दिखाती है कि इंसान अपने आप को नहीं बचा सकता, उसे एक ऐसे राजा की ज़रूरत है जो न्याय और सच्चाई से चले, न कि अपनी मनमानी से। मीका की कहानी उस खालीपन को उजागर करती है जो तब पैदा होता है जब हर व्यक्ति अपना खुद का नियम बनाता है। यह खालीपन आगे इस्राएल को राजाओं की माँग तक ले जाता है, और अंततः उस राजा तक जिसकी सच में ज़रूरत थी, जो अपने ही अनुसार नहीं, बल्कि पूरी तरह पिता की इच्छा के अनुसार चला। यीशु मसीह ने कहा कि वे अपनी मरजी नहीं बल्कि भेजनेवाले की मरजी पूरी करने आए हैं। मीका ने धर्म को अपने हाथों में बनाया, यीशु ने कहा कि वे मार्ग, सच्चाई और जीवन हैं, कुछ ऐसा जो इंसान बना नहीं सकता, केवल पा सकता है।

तुमसे जुड़ी बात

यह कहानी पुराने ज़माने की अंधविश्वासी बात नहीं है, यह आज की भी बात है। तुम भी कभी-कभी विश्वास को अपने हिसाब से ढाल सकते हो, वही मानो जो सुविधाजनक लगे, वही करो जो तुम्हारे दोस्तों को अच्छा लगे, और फिर भी सोचो कि परमेश्वर इससे खुश होंगे। मीका की गलती यह नहीं थी कि उसने परमेश्वर को पूरी तरह नकार दिया, गलती यह थी कि उसने परमेश्वर को अपनी शर्तों पर स्वीकार किया।

अपने आप से पूछो, क्या मेरा विश्वास वास्तव में बाइबल की सुनी हुई बात पर टिका है, या मैं भी अपनी मूरतें बना रहा हूँ, अपनी सुविधा के मुताबिक एक परमेश्वर, जो कभी टोकता नहीं, कभी असहज नहीं करता। सच्चा विश्वास वह है जो सुनने को तैयार है, तब भी जब बात कठिन लगे।

बातचीत के लिए

तुम्हारे जीवन में कौन सी बात है जिसे तुमने "परमेश्वर की मंज़ूरी" का नाम दे दिया है, जबकि असल में वह सिर्फ तुम्हारी अपनी इच्छा है?

मीका सोचता था कि उसका धर्म परमेश्वर को भला लगेगा, पर वह गलत था। तुम कैसे जान सकते हो कि तुम्हारा विश्वास सच में परमेश्वर की बात पर टिका है, न कि सिर्फ तुम्हारी अपनी समझ पर?

संयुक्त प्रार्थना

प्रभु, हमें माफ कीजिए जब हम आपको अपनी शर्तों पर ढालने की कोशिश करते हैं। हमें सच्चा दिल दीजिए, जो आपकी वाणी सुनने को तैयार हो, तब भी जब वह हमारी सोच से टकराए। हमें दिखाइए कि सच्चा मार्ग कहाँ है, और हमें उस पर चलने की हिम्मत दीजिए। आमीन।

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न्यायियों 17 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

न्यायियों 17 किस विषय में है?
यह कहानी इस्राएल के इतिहास के सबसे उलझे हुए दौर से है, जब "इस्राएलियों का कोई राजा न था; जिसको जो ठीक जान पड़ता था वही वह करता था" (17:6)। मीका नाम का एक व्यक्ति एप्रैम के पहाड़ी क्षेत्र में रहता था। उसने अपनी माँ से चाँदी के ग्यारह सौ टुकड़े चुराए थे, जिनके लिए माँ ने श्राप भी दिया था, बिना यह जाने कि चोर उसका अपना बेटा है। जब मीका ने सच बता दिया और चाँदी लौटाई, तो माँ ने राहत की साँस लेते हुए उसे आशीष दी, और फिर वह चाँदी परमेश्वर को अर्पित करने की घोषणा करती है। पर ध्यान दें, अर्पण का तरीका क्या है, दो मूरतें बनवाना, एक खोदी हुई और एक ढाली हुई। मीका के पास पहले से एक "देवस्थान" था, वह वहाँ एपोद और गृहदेवता (घर के देवता) रखता है, और अपने ही बेटे को पुरोहित बना देता है।
न्यायियों 17 क्या कहता है?
यह अध्याय बड़े आराम से पढ़ा जा सकता है, कोई हिंसा नहीं, कोई युद्ध नहीं, बस एक घरेलू सी कहानी। लेकिन यही इसकी चेतावनी है। मीका परमेश्वर का नाम लेता है, उसकी आशीष माँगता है, उसे अर्पण चढ़ाता है, और अंत में यहोवा पर भरोसा भी जताता है। पर उसकी पूरी भक्ति उसी की अपनी सोच के अनुसार बनी है। वह मूरतें बनवाता है जबकि परमेश्वर ने साफ मना किया था कि उनकी कोई मूरत न बनाई जाए। वह अपने बेटे को, फिर एक अजनबी लेवीय को पुरोहित बनाता है, जबकि परमेश्वर ने सिर्फ हारून के वंश को यह जिम्मेदारी दी थी। मीका धर्म को अपनी मर्जी के हिसाब से जोड़-तोड़ कर बना लेता है, और उसे यकीन है कि यह परमेश्वर को भी पसंद आएगा।
न्यायियों 17 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
यह पूरी किताब बार-बार दिखाती है कि इंसान अपने आप को नहीं बचा सकता, उसे एक ऐसे राजा की ज़रूरत है जो न्याय और सच्चाई से चले, न कि अपनी मनमानी से। मीका की कहानी उस खालीपन को उजागर करती है जो तब पैदा होता है जब हर व्यक्ति अपना खुद का नियम बनाता है। यह खालीपन आगे इस्राएल को राजाओं की माँग तक ले जाता है, और अंततः उस राजा तक जिसकी सच में ज़रूरत थी, जो अपने ही अनुसार नहीं, बल्कि पूरी तरह पिता की इच्छा के अनुसार चला। यीशु मसीह ने कहा कि वे अपनी मरजी नहीं बल्कि भेजनेवाले की मरजी पूरी करने आए हैं। मीका ने धर्म को अपने हाथों में बनाया, यीशु ने कहा कि वे मार्ग, सच्चाई और जीवन हैं, कुछ ऐसा जो इंसान बना नहीं सकता, केवल पा सकता है।
किशोर न्यायियों 17 से क्या सीख सकते हैं?
अपने आप से पूछो, क्या मेरा विश्वास वास्तव में बाइबल की सुनी हुई बात पर टिका है, या मैं भी अपनी मूरतें बना रहा हूँ, अपनी सुविधा के मुताबिक एक परमेश्वर, जो कभी टोकता नहीं, कभी असहज नहीं करता। सच्चा विश्वास वह है जो सुनने को तैयार है, तब भी जब बात कठिन लगे।
न्यायियों 17 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
मीका सोचता था कि उसका धर्म परमेश्वर को भला लगेगा, पर वह गलत था। तुम कैसे जान सकते हो कि तुम्हारा विश्वास सच में परमेश्वर की बात पर टिका है, न कि सिर्फ तुम्हारी अपनी समझ पर?

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