लूका 9
किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी
व्याख्या
लूका 9 एक लंबा अध्याय है, और यह जानबूझकर ऐसा है। यहाँ यीशु अपने बारह शिष्यों को भेजते हैं, पाँच हजार लोगों को खिलाते हैं, रूप बदलते हैं, एक लड़के में से दुष्टात्मा निकालते हैं, और यरूशलेम की ओर अपना मुँह दृढ़ता से फेर लेते हैं। यह अध्याय एक मोड़ है। शुरुआत में यीशु की सामर्थ्य दिखती है, अंत में उनका रास्ता साफ हो जाता है, वे सीधे क्रूस की ओर जा रहे हैं।
शुरुआत में यीशु अपने बारह शिष्यों को अधिकार देते हैं और उन्हें भेजते हैं, बिना थैली, बिना रोटी, बिना रुपये के। यह कोई योजना सुचारू रूप से बनाने वाला मिशन नहीं है, यह भरोसे का पाठ है। इसके बाद हेरोदेस घबरा जाता है क्योंकि उसने सुना है कि कोई पुराना भविष्यद्वक्ता जी उठा है, और उसे यीशु से मिलने की इच्छा होती है, पर डर भी। फिर आता है पाँच हजार लोगों को खिलाने का चमत्कार, जहाँ पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ इतनी बढ़ जाती हैं कि सबका पेट भर जाता है और बारह टोकरियाँ बच जाती हैं।
फिर एक निर्णायक पल आता है। यीशु पूछते हैं, "लोग मुझे क्या कहते हैं?" और फिर सीधे पतरस से, "परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?" पतरस जवाब देता है, "परमेश्वर का मसीह।" यह सही उत्तर है, पर तुरंत यीशु बताते हैं कि इस मसीह को बहुत दुःख उठाना है, अस्वीकार किया जाना है, मार डाला जाना है, और तीसरे दिन जी उठना है। यह कोई सम्मान की उपाधि नहीं, यह एक रास्ता है जो दुःख से होकर जाता है। और यीशु तुरंत जोड़ते हैं कि जो उनके पीछे चलना चाहे, उसे भी अपना क्रूस उठाना होगा।
आठ दिन बाद यीशु पहाड़ पर जाते हैं और उनका रूप बदल जाता है, मूसा और एलिय्याह उनसे बात करते हैं, और एक आवाज़ आसमान से कहती है, "यह मेरा पुत्र और मेरा चुना हुआ है, इसकी सुनो।" पहाड़ से नीचे उतरते ही एक पिता अपने बेटे के लिए विनती करता है जिसे दुष्टात्मा ने जकड़ रखा है, और शिष्य असफल हो चुके हैं। यीशु उसे चंगा करते हैं। इसके बाद शिष्य आपस में बहस करने लगते हैं कि उनमें बड़ा कौन है, और यीशु एक बालक को लेकर खड़ा करते हैं और सिखाते हैं कि सबसे छोटा ही बड़ा है। अध्याय के अंत में यीशु यरूशलेम की ओर दृढ़ता से चल पड़ते हैं, और रास्ते में जो भी उनके पीछे आना चाहता है, उससे यीशु पूरी गंभीरता से बात करते हैं।
इसका क्या अर्थ है?
यह अध्याय एक बात बार-बार कहता है, यीशु के पीछे चलना आसान सौदा नहीं है। शिष्य बिना सामान के भेजे जाते हैं, भरोसे पर जीने के लिए। पतरस सही पहचान बताता है, पर तुरंत उसे सिखाया जाता है कि यह पहचान दुःख के रास्ते की ओर ले जाती है। जो व्यक्ति यीशु के पीछे आना चाहता है, उसे साफ बता दिया जाता है, "लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं, पर मनुष्य के पुत्र को सिर रखने की भी जगह नहीं।" यह कोई आरामदायक बुलावा नहीं है।
फिर भी इसी अध्याय में करुणा भी भरपूर है। यीशु भूखी भीड़ को देखकर उन्हें भेजते नहीं, खिलाते हैं। बीमार बालक को देखकर नाराज़ नहीं होते, चंगा करते हैं। जो शिष्य नहीं समझते, उन्हें छोड़ते नहीं, धीरज से समझाते रहते हैं। सच्चाई और करुणा साथ-साथ चलते हैं, एक को दूसरे की कीमत पर नहीं रखा जाता।
समान सूत्र
पूरा अध्याय एक सवाल के इर्द-गिर्द घूमता है, यह मनुष्य कौन है? हेरोदेस पूछता है, भीड़ अटकलें लगाती है, और अंत में यीशु खुद अपने शिष्यों से पूछते हैं। यह वही सवाल है जो पुराने नियम से चला आ रहा है, वह कौन है जो परमेश्वर के राज्य को लाएगा? पतरस का उत्तर, "परमेश्वर का मसीह," पुरानी प्रतिज्ञाओं का जवाब है। पर तुरंत यह स्पष्ट हो जाता है कि यह मसीह राजा बनकर नहीं, दुःख उठाकर आएगा। यशायाह की भविष्यवाणी, "यह मेरा पुत्र और मेरा चुना हुआ है," पहाड़ पर गूँजती है, और वहाँ मूसा और एलिय्याह, व्यवस्था और भविष्यवक्ता, यीशु के साथ खड़े होकर उनके आने वाले मरने की चर्चा करते हैं। पूरा पुराना नियम इस एक क्षण की ओर इशारा करता है, क्रूस पहले से तय था, यह कोई अचानक हुई दुर्घटना नहीं थी।
आपके लिए
शायद तुम भी कभी सोचते हो कि यीशु के पीछे चलना सुविधाजनक रास्ता होगा, कि विश्वास तुम्हारी ज़िंदगी को आसान बनाएगा। यह अध्याय उस धारणा को तोड़ता है। यीशु साफ कहते हैं कि अपने आप से इनकार करना होगा, हर दिन क्रूस उठाना होगा। यह कोई भावुक बात नहीं, यह असली कीमत की बात है। शायद इसका मतलब होगा कि तुम्हें कुछ छोड़ना पड़े जो तुम्हें सुरक्षित लगता था, या किसी भीड़ से अलग खड़ा होना पड़े जब सब कुछ कहते हों।
पर ध्यान दो, वही यीशु जो यह कठोर रास्ता दिखाते हैं, वही भूखी भीड़ को अपने हाथों से खिलाते हैं, वही बीमार बालक को अपने पिता को लौटा देते हैं। यह रास्ता कठोर है, पर यह उजाड़ नहीं है। जब तुम्हारे पास अपनी पहचान का सवाल आएगा, जैसे पतरस के सामने आया, याद रखना कि यीशु सिर्फ जानना नहीं चाहते कि लोग उन्हें क्या कहते हैं, वे जानना चाहते हैं कि तुम उन्हें क्या कहते हो। यह सवाल आज भी उतना ही ज़िंदा है।
बात करें
जब यीशु कहते हैं कि "हर दिन अपना क्रूस उठाए," इसका तुम्हारी असली ज़िंदगी में क्या मतलब हो सकता है, किसी काल्पनिक जवाब के बिना?
शिष्यों ने उस व्यक्ति को रोका जो यीशु के नाम से दुष्टात्मा निकाल रहा था, क्योंकि वह "हमारे साथ" नहीं था। तुम्हारी ज़िंदगी में कब तुमने किसी को इसलिए आँका क्योंकि वह तुम्हारे जैसा समूह का नहीं था?
साथ में प्रार्थना
प्रभु, आप साफ-साफ कहते हैं कि आपके पीछे चलना आसान नहीं है। हमें डर लगता है जब आप हमसे कीमत चुकाने की बात करते हैं। फिर भी हम जानते हैं कि आप ही हैं जो हमें रोटी से भी भरते हैं और हमारे डर से भी बचाते हैं। हमें सच्चाई को सहने की हिम्मत दीजिए, और अपनी करुणा को पहचानने की आँखें दीजिए। हमें दिखाइए कि आप कौन हैं, ताकि हम भी सच्चाई से कह सकें कि आप परमेश्वर के मसीह हैं। आमीन।
लूका 9 के बारे में प्रश्न
पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।
लूका 9 किस विषय में है?
लूका 9 क्या कहता है?
लूका 9 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
किशोर लूका 9 से क्या सीख सकते हैं?
लूका 9 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
दूसरों ने क्या पाया
पहाड़ पर महिमा प्रगट हो रही थी, और चेले नींद से भरे थे। "जब पूरी तरह से जागे, तो उसकी महिमा" देखी। कितना करीब थे वे सब कुछ चूक जाने के। यही तीनों बाद में गतसमनी में भी सो गए। सोचो, तुम्हारे जीवन में यीशु कब से खड़े हैं, और तुम आधी नींद में हो? पूरी तरह जागो। उसकी महिमा देखने के लिए आँखें खोलनी पड़ती हैं।
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