12 वर्ष और उससे अधिक आयु के किशोर के लिए

रोमियों 13

किशोर (12 वर्ष और अधिक) के लिए व्याख्या और बाइबल कहानी

बाइबल

व्याख्या

पौलुस रोम के मसीहियों को लिख रहा है। रोम, यानी साम्राज्य की राजधानी, जहाँ सम्राट के दरबार से आदेश निकलते थे और जहाँ मसीही एक छोटा, शक की नज़र से देखा जाने वाला समूह थे। इन्हीं लोगों से वह कहता है: "हर एक व्यक्ति प्रधान अधिकारियों के अधीन रहे; क्योंकि कोई अधिकार ऐसा नहीं, जो परमेश्वर की ओर से न हो।"

पौलुस का तर्क तीन कदमों में चलता है। पहला: अधिकार का अस्तित्व अपने आप नहीं है, वह परमेश्वर के ठहराए क्रम का हिस्सा है। दूसरा: अधिकारी का काम बुराई पर लगाम लगाना है। इसलिए वह "तलवार व्यर्थ लिए हुए नहीं" है। यह कोमल भाषा नहीं है; पौलुस जानता है कि राज्य के हाथ में असली ताकत होती है। तीसरा: इसलिए कर चुकाओ, हक़ चुकाओ, आदर करो। और ध्यान दो, वह केवल दंड के डर की बात नहीं करता, बल्कि कहता है "विवेक भी यही गवाही देता है।" यानी यह डर का मामला नहीं, अंदर की ईमानदारी का मामला है।

फिर पौलुस अचानक मुड़ता है। वह कहता है कि प्रेम को छोड़ किसी का कर्ज़दार न रहो, क्योंकि प्रेम ही पूरी व्यवस्था को पूरा करता है। और अंत में एक जगाने वाली आवाज़: रात बीत चुकी है, दिन निकलने पर है, अंधकार के काम उतार दो और "प्रभु यीशु मसीह को पहन लो।"

इसका अर्थ क्या है?

यहाँ एक असहज सच्चाई है, और उसे छिपाना बेईमानी होगी। पौलुस यह उस समय लिखता है जब रोम का सिंहासन किसी भी तरह से धर्मी नहीं था, और अंततः उसी साम्राज्य ने मसीहियों का खून बहाया। तो क्या पौलुस हर सत्ता को पवित्र घोषित कर रहा है? नहीं। ध्यान से पढ़ो: अधिकारी "तेरी भलाई के लिये परमेश्वर का सेवक है।" यह अधिकार की परिभाषा भी है और उसकी सीमा भी। जो सत्ता बुराई को इनाम देती है और भलाई को दंड, वह अपने ही बुलावे के खिलाफ खड़ी होती है। पौलुस मसीही को गुलाम नहीं बना रहा; वह उसे अराजकता से बचा रहा है। शुरुआती मसीहियों के बीच यह विचार आसानी से पनप सकता था कि "मसीह मेरा राजा है, तो मुझे किसी नियम की ज़रूरत नहीं।" पौलुस कहता है: तुम्हारी आज़ादी अराजकता नहीं है।

और फिर वह दिखाता है कि यह सब कहाँ से आता है। कर देना, आदर करना, नियम मानना, ये अपने आप में लक्ष्य नहीं हैं। लक्ष्य प्रेम है। "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।" पौलुस आज्ञाओं को गिनता है, व्यभिचार न करना, हत्या न करना, चोरी न करना, लालच न करना, और कहता है कि इन सबका सारांश एक ही वाक्य में है। क्यों? क्योंकि "प्रेम पड़ोसी की कुछ बुराई नहीं करता।" यह भावुक प्रेम नहीं है। यह वह प्रेम है जो किसी की चीज़ नहीं चुराता, किसी के शरीर को इस्तेमाल नहीं करता, किसी की इज़्ज़त को चैट में नहीं उछालता।

जोड़ने वाला सूत्र

अध्याय का अंत हमें बताता है कि यह सब किस बड़ी कहानी में खड़ा है। पौलुस समय की बात करता है: "रात बहुत बीत गई है, और दिन निकलने पर है।" मसीही जीवन दो युगों के बीच में जीया जाता है। यीशु मसीह आ चुके हैं, और वे लौट आएँगे। हम सुबह से पहले के उस धुँधले घंटे में हैं जब आकाश किनारे से हल्का होने लगता है। इसलिए पौलुस कहता है: नींद से जाग उठो।

और सबसे सुंदर बात अंत में है। पौलुस यह नहीं कहता कि "अपनी कोशिश बढ़ाओ।" वह कहता है: "प्रभु यीशु मसीह को पहन लो।" कपड़े की तरह। यही मसीही जीवन का केंद्र है। पहले वह हमें पहनाए जाते हैं, उनकी धार्मिकता हमें ढाँपती है, और तब हम वैसे चलना सीखते हैं जैसा उनके कपड़े पहनने वाले को चलना चाहिए। जिस प्रेम की माँग यहाँ की गई है, वह वही प्रेम है जो मसीह ने क्रूस पर हमें दिखाया। वे किसी की बुराई नहीं की, और हमारे लिए अपना जीवन दे दिया। व्यवस्था का पूरा होना पहले उनमें हुआ, तब हममें।

तुम्हारे लिए

तुम्हारी दुनिया में "अधिकार" शब्द से जल्दी खीझ होती है, और अकसर बिना कारण नहीं। तुमने पाखंड देखा है, स्कूल में, राजनीति में, कभी घर में, कभी कलीसिया में। पौलुस तुमसे यह नहीं कहता कि आँख बंद कर लो। वह कहता है: तुम्हारा विरोध या तुम्हारी आज्ञाकारिता, दोनों परमेश्वर के सामने जीयी जाती हैं, न कि तुम्हारे मूड के सामने।

बहुत ठोस बात। "हर एक का हक़ चुकाया करो।" इसका मतलब आज तुम्हारे लिए यह है: जिस काम का पैसा लिया, वह पूरा करो। जिस टिकट का दाम है, वह चुकाओ। जिस शिक्षक से असहमत हो, उसे भी आदर से जवाब दो। परीक्षा में नकल एक धार्मिक मुद्दा है, कर की चोरी भी।

और एक चुनौती जो असल में चुभती है। पौलुस "अंधकार के कामों" की सूची में जिन चीज़ों को गिनता है, उनमें पियक्कड़पन और व्यभिचार के साथ-साथ "झगड़े और ईर्ष्या" भी हैं। वही ईर्ष्या जो तुम स्क्रॉल करते हुए महसूस करते हो जब किसी और की ज़िंदगी बेहतर दिखती है। इस हफ़्ते एक काम करो: पहचानो कि किसकी सफलता तुम्हें अंदर से जलाती है, और फिर जान-बूझकर उस व्यक्ति के लिए भला करो। उसकी तारीफ़ करो, उसकी मदद करो, उसके लिए प्रार्थना करो। यह प्रेम भावना नहीं, निर्णय है। और यही अंधकार का कपड़ा उतारना है।

इस पर बात करें

जब किसी अधिकारी की माँग स्पष्ट रूप से गलत हो, तो पद 1 और पद 4 को साथ रखकर तुम कैसे तय करोगे कि कहाँ अधीन रहना है और कहाँ नहीं?

पौलुस कहता है कि प्रेम को छोड़ किसी बात में किसी का कर्ज़दार न हो। तुम्हारे जीवन में कौन है जिसका यह कर्ज़ तुम चुकाना टाल रहे हो, और क्यों?

मिलकर प्रार्थना

प्रभु यीशु मसीह, आप हमें ढाँपते हैं, इसलिए हम जाग सकते हैं। हमें विवेक दीजिए कि हम ईमानदारी से जीएँ, साहस दीजिए कि जहाँ बुराई है उसे बुराई कहें, और प्रेम दीजिए जो किसी की हानि न करे। रात बीत रही है। हमें दिन के उजाले में चलना सिखाइए। आमीन।

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रोमियों 13 के बारे में प्रश्न

पहली बार इसके बारे में पढ़ने वाले हर किसी के लिए छोटे उत्तर।

रोमियों 13 किस विषय में है?
पौलुस रोम के मसीहियों को लिख रहा है। रोम, यानी साम्राज्य की राजधानी, जहाँ सम्राट के दरबार से आदेश निकलते थे और जहाँ मसीही एक छोटा, शक की नज़र से देखा जाने वाला समूह थे। इन्हीं लोगों से वह कहता है: "हर एक व्यक्ति प्रधान अधिकारियों के अधीन रहे; क्योंकि कोई अधिकार ऐसा नहीं, जो परमेश्वर की ओर से न हो।"
रोमियों 13 क्या कहता है?
यहाँ एक असहज सच्चाई है, और उसे छिपाना बेईमानी होगी। पौलुस यह उस समय लिखता है जब रोम का सिंहासन किसी भी तरह से धर्मी नहीं था, और अंततः उसी साम्राज्य ने मसीहियों का खून बहाया। तो क्या पौलुस हर सत्ता को पवित्र घोषित कर रहा है? नहीं। ध्यान से पढ़ो: अधिकारी "तेरी भलाई के लिये परमेश्वर का सेवक है।" यह अधिकार की परिभाषा भी है और उसकी सीमा भी। जो सत्ता बुराई को इनाम देती है और भलाई को दंड, वह अपने ही बुलावे के खिलाफ खड़ी होती है। पौलुस मसीही को गुलाम नहीं बना रहा; वह उसे अराजकता से बचा रहा है। शुरुआती मसीहियों के बीच यह विचार आसानी से पनप सकता था कि "मसीह मेरा राजा है, तो मुझे किसी नियम की ज़रूरत नहीं।" पौलुस कहता है: तुम्हारी आज़ादी अराजकता नहीं है।
रोमियों 13 हमें परमेश्वर के बारे में क्या सिखाता है?
और सबसे सुंदर बात अंत में है। पौलुस यह नहीं कहता कि "अपनी कोशिश बढ़ाओ।" वह कहता है: "प्रभु यीशु मसीह को पहन लो।" कपड़े की तरह। यही मसीही जीवन का केंद्र है। पहले वह हमें पहनाए जाते हैं, उनकी धार्मिकता हमें ढाँपती है, और तब हम वैसे चलना सीखते हैं जैसा उनके कपड़े पहनने वाले को चलना चाहिए। जिस प्रेम की माँग यहाँ की गई है, वह वही प्रेम है जो मसीह ने क्रूस पर हमें दिखाया। वे किसी की बुराई नहीं की, और हमारे लिए अपना जीवन दे दिया। व्यवस्था का पूरा होना पहले उनमें हुआ, तब हममें।
किशोर रोमियों 13 से क्या सीख सकते हैं?
और एक चुनौती जो असल में चुभती है। पौलुस "अंधकार के कामों" की सूची में जिन चीज़ों को गिनता है, उनमें पियक्कड़पन और व्यभिचार के साथ-साथ "झगड़े और ईर्ष्या" भी हैं। वही ईर्ष्या जो तुम स्क्रॉल करते हुए महसूस करते हो जब किसी और की ज़िंदगी बेहतर दिखती है। इस हफ़्ते एक काम करो: पहचानो कि किसकी सफलता तुम्हें अंदर से जलाती है, और फिर जान-बूझकर उस व्यक्ति के लिए भला करो। उसकी तारीफ़ करो, उसकी मदद करो, उसके लिए प्रार्थना करो। यह प्रेम भावना नहीं, निर्णय है। और यही अंधकार का कपड़ा उतारना है।
रोमियों 13 एक महत्वपूर्ण बाइबल कहानी क्यों है?
प्रभु यीशु मसीह, आप हमें ढाँपते हैं, इसलिए हम जाग सकते हैं। हमें विवेक दीजिए कि हम ईमानदारी से जीएँ, साहस दीजिए कि जहाँ बुराई है उसे बुराई कहें, और प्रेम दीजिए जो किसी की हानि न करे। रात बीत रही है। हमें दिन के उजाले में चलना सिखाइए। आमीन।

दूसरों ने क्या पाया

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 10

प्रेम पड़ोसी की कुछ बुराई नहीं करता, इसलिए प्रेम व्यवस्था का पूरा करना है।" ध्यान दे, पौलुस यह नहीं कहता कि प्रेम बड़े बड़े काम करता है। वह कहता है, प्रेम नुकसान नहीं पहुँचाता। कभी कभी प्रेम की पहली परीक्षा यही होती है कि मैंने क्या नहीं किया। वह कड़वा जवाब जो मैंने रोक लिया, वह बात जो मैंने आगे नहीं फैलाई। आज तेरे पास किसका हिसाब चुकाने का मौका है, जिसे तू प्रेम के कारण छोड़ देगा?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 14

वरन् प्रभु यीशु मसीह को पहन लो, और शरीर की अभिलाषाओं को पूरा करने का उपाय न करो।"

ध्यान दो, पौलुस ने यह नहीं कहा कि पाप मत करो। उसने कहा, उसका उपाय मत करो। क्योंकि गिरावट अचानक नहीं आती, वह पहले से की गई छोटी तैयारी से आती है। वह नंबर जो तुमने सेव रखा है, वह ऐप जो डिलीट नहीं हुई, वह रास्ता जो थोड़ा लंबा है पर उस दुकान से होकर जाता है।

मसीह को पहनना सुबह का पहला निर्णय है। उपाय न करना दिन भर का।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 6

कर देना कोई बड़ी आत्मिक बात नहीं लगती, फिर भी पौलुस कहता है, "इसी कारण तुम कर भी देते हो, क्योंकि शासन करनेवाले परमेश्वर के सेवक हैं।" जिन अधिकारियों से तुम असहमत हो, उन्हें भी वह अपना सेवक कहता है। तुम्हारी ईमानदारी बिल भरने में, कागज़ भरने में भी दिखती है। वहाँ भी परमेश्वर देख रहा है।

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