बाइबल व्याख्या

1 कुरिन्थियों 12:31

बाइबल

पाठ

पौलुस के सवालों की झड़ी यहाँ खत्म होती है: क्या सब प्रेरित हैं? क्या सब भविष्यद्वक्ता? क्या सब अनुवाद करते हैं? हर सवाल का जवाब है "नहीं", और यह "नहीं" जानबूझकर चुभता है। फिर एकदम मोड़ आता है: "तुम बड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो!" यानी लालसा करना मना नहीं है, बल्कि आज्ञा है। पर वाक्य वहाँ रुकता नहीं। "परन्तु मैं तुम्हें और भी सबसे उत्तम मार्ग बताता हूँ।" पौलुस वरदानों की सूची के ऊपर एक और चीज़ रखता है, कोई बेहतर वरदान नहीं, बल्कि एक मार्ग, चलने का एक ढंग, जिसका नाम वह अगले अध्याय तक रोके रखता है। पद यहीं अधूरा-सा खड़ा रह जाता है, और यही उसकी ताकत है।

मूल बात

यहाँ दो बातें एक साथ कही जा रही हैं, और हम अक्सर एक को काटकर दूसरी बचा लेते हैं। पहली: परमेश्वर की ओर से मिलने वाली बड़ी चीज़ों की चाह रखना आत्मिक घमंड नहीं है। पौलुस कुरिन्थियों से यह नहीं कहता कि वे अपनी इच्छाएँ छोटी कर लें; वह कहता है कि वे उन्हें सही दिशा में मोड़ें। दूसरी, और ज़्यादा चुभने वाली: वरदान कभी भी आपकी कीमत नहीं मापते। पद 11 पहले ही कह चुका है कि आत्मा "जिसे जो चाहता है वह बाँट देता है"। इसलिए जिस चीज़ पर आपका बस नहीं, उस पर आपकी पहचान टिक नहीं सकती। "सबसे उत्तम मार्ग" वह जगह है जहाँ हर विश्वासी बराबर खड़ा है, क्योंकि प्रेम बाँटा नहीं जाता, जिया जाता है। बड़ाई की होड़ यहीं टूटती है।

सामान्य सूत्र

"मार्ग" शब्द पौलुस यूँ ही नहीं चुनता। मसीही विश्वास की सबसे पुरानी पहचान ही यही थी: लोग इसे "मार्ग" कहते थे, कोई पद नहीं, कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि चलने की एक दिशा। और वह दिशा पहले से तय हो चुकी है, क्योंकि यीशु मसीह स्वयं उस पर चले। जिसके पास सब कुछ था, वह सेवक बना; जिसके पास हर सामर्थ्य थी, उसने उसे अपनी बड़ाई के लिए नहीं, दूसरों के लाभ के लिए खर्च किया। पद 7 यही कहता है: आत्मा का प्रकाश "सब के लाभ पहुँचाने के लिये" दिया जाता है। यानी वरदान क्रूस की दिशा में बहते हैं, मंच की दिशा में नहीं। जो मार्ग पौलुस दिखाने वाला है, वह असल में मसीह का अपना चलना है, जिसमें हमें शामिल होना है।

दर्पण

ईमानदारी से पूछिए: चर्च में आप किससे तुलना करते हैं? उस व्यक्ति से जो धाराप्रवाह प्रार्थना करता है, उस युवा से जिसके गीत पर पूरी मंडली रो पड़ती है, उस भाई से जिसे सब "समझदार" कहते हैं? तुलना दफ्तर में भी वही काम करती है, और परिवार में भी, जहाँ हम अपने बच्चों की तरक्की को अपनी कीमत बना लेते हैं। पौलुस इस भूख को मारता नहीं, वह उसे मोड़ देता है: बड़े की धुन रखो, पर जान लो कि बड़ा क्या है। प्रेम वह इकलौती चीज़ है जिसमें कोई प्रतिभा का बहाना नहीं चलता। आज दस मिनट निकालिए: उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिससे आप भीतर ही भीतर जलते हैं, और उसे एक संदेश भेजकर उसके वरदान के लिए परमेश्वर को धन्यवाद दीजिए।

अन्य शास्त्रवचन

अगला अध्याय इस अधूरे वाक्य को पूरा करता है, और वहाँ पौलुस बेरहमी से कहता है कि भाषाएँ, भविष्यद्वाणी, ज्ञान, यहाँ तक कि शरीर जला देने वाला बलिदान भी, प्रेम के बिना शून्य है। इसलिए 12:31 को 13 अध्याय से काटकर पढ़ना उसका गला घोंटना है। दूसरी गूँज फिलिप्पियों 2 में है, जहाँ पौलुस मसीह के "अपने को रिक्त करने" को मंडली की आपसी होड़ का इलाज बताता है। दोनों जगह तर्क एक ही है: जहाँ लोग ऊँचाई के लिए लड़ते हैं, वहाँ उत्तर ऊँचा पद नहीं, नीचे उतरने का मार्ग है। कुरिन्थ की समस्या नई नहीं थी, और इलाज भी हर बार वही रहा।

पहले सुननेवाले

कुरिन्थ की मंडली में बोलने के वरदान, खासकर भाषाएँ, सामाजिक सीढ़ी बन चुके थे। जिनके पास दिखने वाला वरदान था, वे भोज में आगे बैठते थे; जिनके पास नहीं था, वे खुद को "देह का नहीं" समझने लगे थे, ठीक वैसे जैसे पद 15 का पाँव। जब पौलुस के सवाल एक के बाद एक "नहीं" की ओर ले जाते हैं, तो सुनने वालों के चेहरे उतरते हैं: तो फिर हमारे पास क्या बचा? और तभी वह दरवाज़ा खोलता है। सबसे उत्तम मार्ग उन दोनों के लिए है, जिनके पास बहुत है और जिनके पास कुछ नहीं दिखता। दास और स्वामी, यहूदी और यूनानी, एक ही स्तर पर आ जाते हैं।

संदर्भ

कुरिन्थ एक बंदरगाह शहर था, व्यापार से अमीर, और प्रतिस्पर्धा उसकी हवा में थी। वहाँ वक्ता भीड़ जुटाते थे, संरक्षक अपने नाम की पट्टिकाएँ लगवाते थे, और सम्मान सार्वजनिक रूप से मापा जाता था। यह शहरी संस्कृति चुपचाप चर्च के भीतर घुस आई थी: अब सम्मान आत्मिक सिक्कों में तौला जा रहा था। पौलुस लगभग 54 ईस्वी में इफिसुस से यह पत्र लिखता है, मंडली के भीतर गुटबाज़ी, मुकदमेबाज़ी और प्रभुभोज में अमीर-गरीब के भेद की खबरें सुनकर। इसी पृष्ठभूमि में देह का चित्र और "सबसे उत्तम मार्ग" कोई कोमल उपदेश नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार है।

चिंतन

आप जिस वरदान की चाह रखते हैं, वह किसके लाभ के लिए है: मंडली के, या आपकी पहचान के?

पिछले महीने में किस एक पल में आपने प्रेम का मार्ग इसलिए छोड़ा क्योंकि वह आपको पीछे धकेलता दिख रहा था?

1 Corinthians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of 1 Corinthians

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Paul For Everyone: 1 Corinthians

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1 Corinthians: An Introduction and Commentary

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1 Corinthians 12:31 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 कुरिन्थियों 12:31 का क्या अर्थ है?
पौलुस के सवालों की झड़ी यहाँ खत्म होती है: क्या सब प्रेरित हैं? क्या सब भविष्यद्वक्ता? क्या सब अनुवाद करते हैं? हर सवाल का जवाब है "नहीं", और यह "नहीं" जानबूझकर चुभता है। फिर एकदम मोड़ आता है: "तुम बड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो!" यानी लालसा करना मना नहीं है, बल्कि आज्ञा है। पर वाक्य वहाँ रुकता नहीं। "परन्तु मैं तुम्हें और भी सबसे उत्तम मार्ग बताता हूँ।" पौलुस वरदानों की सूची के ऊपर एक और चीज़ रखता है, कोई बेहतर वरदान नहीं, बल्कि एक मार्ग, चलने का एक ढंग, जिसका नाम वह अगले अध्याय तक रोके रखता है। पद यहीं अधूरा-सा खड़ा रह जाता है, और यही उसकी ताकत है।
1 कुरिन्थियों 12:31 किस विषय में है?
"मार्ग" शब्द पौलुस यूँ ही नहीं चुनता। मसीही विश्वास की सबसे पुरानी पहचान ही यही थी: लोग इसे "मार्ग" कहते थे, कोई पद नहीं, कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि चलने की एक दिशा। और वह दिशा पहले से तय हो चुकी है, क्योंकि यीशु मसीह स्वयं उस पर चले। जिसके पास सब कुछ था, वह सेवक बना; जिसके पास हर सामर्थ्य थी, उसने उसे अपनी बड़ाई के लिए नहीं, दूसरों के लाभ के लिए खर्च किया। पद 7 यही कहता है: आत्मा का प्रकाश "सब के लाभ पहुँचाने के लिये" दिया जाता है। यानी वरदान क्रूस की दिशा में बहते हैं, मंच की दिशा में नहीं। जो मार्ग पौलुस दिखाने वाला है, वह असल में मसीह का अपना चलना है, जिसमें हमें शामिल होना है।
1 कुरिन्थियों 12:31 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
अगला अध्याय इस अधूरे वाक्य को पूरा करता है, और वहाँ पौलुस बेरहमी से कहता है कि भाषाएँ, भविष्यद्वाणी, ज्ञान, यहाँ तक कि शरीर जला देने वाला बलिदान भी, प्रेम के बिना शून्य है। इसलिए 12:31 को 13 अध्याय से काटकर पढ़ना उसका गला घोंटना है। दूसरी गूँज फिलिप्पियों 2 में है, जहाँ पौलुस मसीह के "अपने को रिक्त करने" को मंडली की आपसी होड़ का इलाज बताता है। दोनों जगह तर्क एक ही है: जहाँ लोग ऊँचाई के लिए लड़ते हैं, वहाँ उत्तर ऊँचा पद नहीं, नीचे उतरने का मार्ग है। कुरिन्थ की समस्या नई नहीं थी, और इलाज भी हर बार वही रहा।
1 कुरिन्थियों 12:31 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
कुरिन्थ एक बंदरगाह शहर था, व्यापार से अमीर, और प्रतिस्पर्धा उसकी हवा में थी। वहाँ वक्ता भीड़ जुटाते थे, संरक्षक अपने नाम की पट्टिकाएँ लगवाते थे, और सम्मान सार्वजनिक रूप से मापा जाता था। यह शहरी संस्कृति चुपचाप चर्च के भीतर घुस आई थी: अब सम्मान आत्मिक सिक्कों में तौला जा रहा था। पौलुस लगभग 54 ईस्वी में इफिसुस से यह पत्र लिखता है, मंडली के भीतर गुटबाज़ी, मुकदमेबाज़ी और प्रभुभोज में अमीर-गरीब के भेद की खबरें सुनकर। इसी पृष्ठभूमि में देह का चित्र और "सबसे उत्तम मार्ग" कोई कोमल उपदेश नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार है।
1 कुरिन्थियों 12:31 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछले महीने में किस एक पल में आपने प्रेम का मार्ग इसलिए छोड़ा क्योंकि वह आपको पीछे धकेलता दिख रहा था?
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1 Corinthians 12 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 24

परमेश्वर की गिनती हमारी गिनती से उलटी है। जिस अंग के पास पहले से शोभा है, उसे और सजाने की ज़रूरत नहीं। "परन्तु परमेश्वर ने देह को ऐसा बनाया है कि जिस अंग को घटी थी, उसी को और भी बहुत आदर दिया।" कलीसिया का जो कोना किसी को दिखता ही नहीं, वहीं उसकी नज़र टिकी रहती है। तुम्हें अपनी जगह छोटी लगती है? वहीं वह आदर रखता है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 8

पिता, मुझे पता नहीं मेरे पास क्या है और क्या नहीं। कभी लगता है दूसरों की समझ और ज्ञान मुझसे बहुत आगे है। पर आपका आत्मा ही सब बाँटता है, और जो आपने मुझे दिया वह भी आपसे ही आया है। मुझे उसे पहचानने और बाँटने का मन दीजिए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 19

यदि वे सब एक ही अंग होते, तो देह कहाँ होती?" पौलुस का यह सवाल चुभता है। हम चाहते हैं कि कलीसिया में सब हमारे जैसे सोचें, हमारे जैसे सेवा करें, हमारे जैसे प्रार्थना करें। पर जिस दिन सब एक जैसे हो जाएँ, उस दिन देह खत्म हो जाएगी। जो भाई तुमसे बहुत अलग है, वह गलत नहीं है। वह वही अंग है जिसके बिना तुम अधूरे हो।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 31

तुम बड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो। परन्तु मैं तुम्हें और भी सबसे उत्तम मार्ग बताता हूँ।" पौलुस वरदानों की चाह को गलत नहीं कहता, पर बीच वाक्य में ही रुककर कहता है, एक और रास्ता है। और वह रास्ता प्रेम है। सोच, तेरी सारी सेवा, सारी काबिलियत जिस गली से गुज़रती है, वह गली प्रेम की है या नहीं?

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