1 कुरिन्थियों 12
यह पाठ
पौलुस कुरिन्थ की कलीसिया को आत्मिक वरदानों पर सिखाते हैं: वरदान अनेक हैं, पर आत्मा एक ही; सेवा अनेक, पर प्रभु एक। हर एक को जो दिया गया है, वह अपने लिए नहीं, बल्कि "सब के लाभ पहुँचाने के लिये" दिया गया है। फिर वे शरीर का चित्र खींचते हैं: पाँव, कान, आँख, सिर, सब एक ही देह के अंग, और परमेश्वर ने जान-बूझकर उन्हें ऐसा गढ़ा है कि कमज़ोर दिखनेवाले अंग सबसे आवश्यक ठहरें। अंत में वे कलीसिया में नियुक्त सेवाओं की सूची देते हैं, और यह चुभनेवाला सवाल पूछते हैं: "क्या सब प्रेरित हैं?" उत्तर स्पष्ट है, नहीं। और फिर वे एक "सबसे उत्तम मार्ग" की ओर इशारा करते हैं।
मर्म
पद 23 पर रुकिए: "देह के जिन अंगों को हम कम आदरणीय समझते हैं उन्हीं को हम अधिक आदर देते हैं।" यह भावुक बात नहीं है, यह परमेश्वर के काम करने के ढंग का खुलासा है। परमेश्वर ने देह को ऐसा बनाया कि "जिस अंग को घटी थी उसी को और भी बहुत आदर हो।" यानी आदर का बँटवारा योग्यता के हिसाब से नहीं होता, बल्कि ज़रूरत के हिसाब से। दुनिया का हिसाब उल्टा है: जो चमकता है, उसे मंच मिलता है। पौलुस कहते हैं परमेश्वर ने रचना में ही यह क्रम पलट दिया है। और कारण साफ़ है, पद 25: "ताकि देह में फूट न पड़े।" एकता भावना नहीं, एकता एक ढाँचा है जिसे परमेश्वर ने कमज़ोरों को केंद्र में रखकर बनाया।
साझा सूत्र
पद 12 में एक अजीब मोड़ है। पौलुस कहते हैं देह एक है और अंग बहुत, "उसी प्रकार मसीह भी है।" वे यह नहीं कहते "उसी प्रकार कलीसिया भी है।" कलीसिया मसीह की उपमा नहीं, उनकी देह है। यही वह सूत्र है जो पुराने नियम से चलता आ रहा है: परमेश्वर एक लोग बनाते हैं, और उस लोगों में स्वयं वास करते हैं। पहले तम्बू और मन्दिर में, अब जीवित लोगों में। और जिस मसीह ने अपने आप को कमज़ोर बनाकर सबसे नीचे की जगह ली, उनकी देह उसी ढंग से काम करती है: नीचे से ऊपर, हाशिये से केंद्र की ओर। पद 13 इसे और तीखा करता है: यहूदी, यूनानी, दास, स्वतंत्र, एक ही आत्मा में बपतिस्मा। रोमी समाज की सबसे कठोर दीवारें एक ही जल में गिरा दी गईं।
दर्पण
अब घर की बात। आप जिस छोटे समूह की अगुआई करते हैं, वहाँ कौन बोलता है और कौन चुप बैठा रहता है? जिस दफ़्तर में आप काम करते हैं, वहाँ आप किसका नाम याद रखते हैं, बॉस का या सफ़ाई करनेवाले का? पद 21 आँख से कहलवाता है, "मुझे तेरा प्रयोजन नहीं," और यह वाक्य हम शब्दों में कभी नहीं कहते; हम इसे कैलेंडर से कहते हैं। जिसके पास से हमें कुछ नहीं मिलता, उसके लिए समय नहीं बचता। पद 26 और भी असुविधाजनक है: "यदि एक अंग की बड़ाई होती है, तो उसके साथ सब अंग आनन्द मनाते हैं।" किसी और की तरक्की पर सच्चा आनन्द, बिना उस खटास के जो हमें भीतर ही भीतर तौलती रहती है, यह ईर्ष्या की मृत्यु माँगता है। दुःख में साथ देना आसान है; किसी की चढ़ती पर दिल से खुश होना कठिन।
कठिन प्रश्न
पद 31 अटपटा लगता है: "तुम बड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो!" अभी तो पौलुस समानता समझा रहे थे, और अब वे महत्वाकांक्षा को हवा दे रहे हैं? यहाँ आसान सुलह मत कीजिए। पौलुस दो बातें साथ रख रहे हैं: वरदान परमेश्वर बाँटते हैं, "जिसे जो चाहता है" (पद 11), इसलिए हमारे पास चुनाव नहीं; और फिर भी हमें बड़े वरदानों की चाह रखनी है। फ़र्क़ मक़सद में है। "बड़ा" वह है जो देह को अधिक बनाता है, न कि वह जो मुझे अधिक दिखाता है। और तेरहवाँ अध्याय बताएगा कि सबसे बड़ा मार्ग प्रेम है, यानी वह मार्ग जिस पर सब चल सकते हैं। महत्वाकांक्षा ख़त्म नहीं होती; उसकी दिशा बदल जाती है।
पृष्ठभूमि
कुरिन्थ एक बंदरगाह शहर था, नया धन, तेज़ प्रतिस्पर्धा, और सामाजिक दर्जे का जुनून। वहाँ आदर एक सिक्का था जिसे लोग जमा करते थे: कौन किसके भोज में बैठा, कौन किसका संरक्षक है। इस माहौल में कलीसिया में दास और मालिक एक ही मेज़ पर बैठे, और इससे तनाव पैदा हुआ। वरदानों की होड़ इसी दर्जेबाज़ी का धार्मिक रूप थी: अन्य भाषाओं में बोलना दिखावटी था, इसलिए उसे ऊँचा माना गया। पद 2 में पौलुस उनके अतीत की याद दिलाते हैं, "गूँगी मूरतों के पीछे जैसे चलाए जाते थे," क्योंकि मूर्तिपूजा में आत्मिक उत्तेजना का पैमाना ही अनुभव की तीव्रता था। पौलुस पैमाना बदल देते हैं: पहचान यह है कि कौन कहता है, "यीशु प्रभु है।"
एक बारीकी
पद 22 में शब्द है "निर्बल देख पड़ते हैं।" पौलुस यह नहीं कहते कि कुछ अंग कमज़ोर हैं; वे कहते हैं कुछ कमज़ोर दिखते हैं। यह दिखने और होने के बीच का फ़ासला पूरे अध्याय की चाबी है। हृदय शरीर के भीतर छिपा है, हाथ बाहर दिखता है, पर कौन ज़्यादा आवश्यक है? कलीसिया में भी सबसे ज़रूरी काम अक्सर अदृश्य होते हैं: वह बहन जो रोज़ प्रार्थना करती है, वह भाई जो कुर्सियाँ लगाता है, वह बुज़ुर्ग जो बिस्तर पर पड़ा है और किसी सूची में नहीं आता। पौलुस हमें आँख का इलाज करवा रहे हैं, अंगों का नहीं। समस्या कमज़ोरी नहीं, हमारी देखने की आदत है।
चिंतन
आपकी कलीसिया या समूह में वह कौन है जिसे आप मन ही मन "कम आदरणीय" मानते हैं, और इस हफ़्ते आप उसे ठोस रूप से अधिक आदर कैसे दे सकते हैं?
पिछली बार जब किसी और की सराहना हुई और आपकी नहीं, तब आपके भीतर क्या हुआ? पद 26 के अनुसार वहाँ क्या होना चाहिए था?
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1 Corinthians 12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 कुरिन्थियों 12 का क्या अर्थ है?
1 कुरिन्थियों 12 किस विषय में है?
1 कुरिन्थियों 12 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 कुरिन्थियों 12 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 12 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मुझे पता नहीं मेरे पास क्या है और क्या नहीं। कभी लगता है दूसरों की समझ और ज्ञान मुझसे बहुत आगे है। पर आपका आत्मा ही सब बाँटता है, और जो आपने मुझे दिया वह भी आपसे ही आया है। मुझे उसे पहचानने और बाँटने का मन दीजिए।
यदि वे सब एक ही अंग होते, तो देह कहाँ होती?" पौलुस का यह सवाल चुभता है। हम चाहते हैं कि कलीसिया में सब हमारे जैसे सोचें, हमारे जैसे सेवा करें, हमारे जैसे प्रार्थना करें। पर जिस दिन सब एक जैसे हो जाएँ, उस दिन देह खत्म हो जाएगी। जो भाई तुमसे बहुत अलग है, वह गलत नहीं है। वह वही अंग है जिसके बिना तुम अधूरे हो।
तुम बड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो। परन्तु मैं तुम्हें और भी सबसे उत्तम मार्ग बताता हूँ।" पौलुस वरदानों की चाह को गलत नहीं कहता, पर बीच वाक्य में ही रुककर कहता है, एक और रास्ता है। और वह रास्ता प्रेम है। सोच, तेरी सारी सेवा, सारी काबिलियत जिस गली से गुज़रती है, वह गली प्रेम की है या नहीं?
पिता, तेरा एक ही आत्मा हर एक को अलग अलग तरह से छूता है। मुझमें विश्वास जगा, जब भरोसा कमज़ोर पड़ने लगे। और जो चंगाई तू देना चाहता है, उसे मेरे हाथों और शब्दों से किसी थके हुए दिल तक पहुँचने दे।
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