1 कुरिन्थियों 13:2
पाठ
पौलुस एक के बाद एक ऊँचाइयाँ गिनाते हैं और फिर हर एक को शून्य से गुणा कर देते हैं। भविष्यद्वाणी का वरदान, हर भेद और हर प्रकार के ज्ञान की समझ, और ऐसा विश्वास जो पहाड़ों को उनकी जगह से हटा दे: ये कुरिन्थ की कलीसिया में सबसे चमकदार, सबसे ईर्ष्या-योग्य चीज़ें थीं। पौलुस कहते हैं, यह सब मेरे पास हो, "परन्तु प्रेम न रखूँ, तो मैं कुछ भी नहीं।"
ध्यान दीजिए, वे यह नहीं कहते कि मेरे पास कुछ भी नहीं। पिछले पद में वे कहते थे कि मैं बजता हुआ पीतल हूँ, यानी कुछ तो हूँ, भले शोर ही सही। यहाँ वह आखिरी रियायत भी हट जाती है। प्रेम के बिना वरदान खाली नहीं होते; व्यक्ति खाली हो जाता है।
मूल बात
यह वाक्य हमारे मूल्यांकन के सारे पैमाने उलट देता है। हम मनुष्य को उसकी क्षमता से नापते हैं: वह क्या जानता है, क्या कर सकता है, उसके द्वारा क्या घटित होता है। परमेश्वर स्पष्ट रूप से किसी और चीज़ से नापते हैं, और वह चीज़ प्रदर्शन-योग्य नहीं है।
यहाँ एक गहरा धर्मशास्त्रीय दावा छिपा है। यदि प्रेम के बिना मनुष्य "कुछ भी नहीं" है, तो इसका अर्थ है कि अस्तित्व का सार ही संबंध है। परमेश्वर स्वयं ज्ञान या शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि प्रेम के रूप में अपने होने को जीते हैं, और हम उन्हीं की समानता में बने हैं। इसलिए प्रेमहीन शक्ति कोई तटस्थ चीज़ नहीं, वह एक प्रकार की अनुपस्थिति है।
और यहाँ थोड़ा ठहरना ज़रूरी है। पौलुस समझाते नहीं कि "कुछ भी नहीं" का ठीक-ठीक अर्थ क्या है। वे उसे खुला छोड़ देते हैं, जैसे कोई दरवाज़ा जिसके पीछे अँधेरा हो। शायद इसलिए कि यह तर्क से नहीं, मौन से समझ में आता है।
सूत्र
पौलुस यहाँ कोई नया विचार नहीं गढ़ रहे। वे उस परमेश्वर की ओर इशारा कर रहे हैं जिसने अपनी महिमा वरदानों में नहीं, बल्कि एक क्रूस पर खोली। मसीह के पास सब भेदों का ज्ञान था, उनके पास वह विश्वास था जो समुद्र को शांत कर दे, और फिर भी उनकी पहचान इनमें से किसी चीज़ से नहीं बनी। वे उस रास्ते पर गए जहाँ शक्ति का प्रदर्शन नहीं, आत्मदान था।
इसलिए पद 2 कोई नैतिक सलाह नहीं, वह मसीह का चित्र है जो उल्टी दिशा से खींचा गया है। जहाँ पौलुस कहते हैं "कुछ भी नहीं", वहाँ मसीह ने स्वयं को "कुछ भी नहीं" बना लिया, पर प्रेम के कारण, और इसी से वे सब कुछ हुए। पुराने नियम की भविष्यद्वाणियाँ भी यही संकेत देती थीं: परमेश्वर अपनी वाचा में इसलिए टिके रहे क्योंकि वे प्रेम करते हैं, न कि इसलिए कि उनके पास शक्ति थी।
दर्पण
यह पद उस जगह चुभता है जहाँ हम सबसे ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं: अपनी योग्यता में। आप बाइबल अच्छी जानते हैं, समूह की अगुवाई करते हैं, सही धर्मशास्त्र पहचान लेते हैं। और घर पर? जिस व्यक्ति के साथ आप रोज़ खाना खाते हैं, वह शायद जानता है कि आपकी समझ और आपकी कोमलता के बीच कितनी दूरी है।
पौलुस का "कुछ भी नहीं" उस दूरी पर उँगली रखता है। दफ़्तर में जहाँ आप सही थे और उसे साबित करके किसी को छोटा कर दिया। परिवार में जहाँ आपकी सलाह सही थी पर उसमें गर्मी नहीं थी। यह पद आपकी क्षमता छीनता नहीं, वह पूछता है कि उसके नीचे कौन रहता है।
आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसके बारे में आप अक्सर सही होते हैं, और उस नाम के सामने दो मिनट चुपचाप बैठकर परमेश्वर से कहिए कि आप उसे समझना नहीं, प्रेम करना चाहते हैं।
कठिन सवाल
अगर प्रेम के बिना मैं कुछ भी नहीं, तो क्या मेरा मूल्य मेरे प्रेम करने पर निर्भर है? यह सोच डरावनी है, क्योंकि हम में से कोई भी लगातार प्रेम नहीं करता। क्या मैं उन दिनों में, जब मेरा हृदय ठंडा और चिड़चिड़ा होता है, सचमुच शून्य हूँ?
पौलुस इसका उत्तर यहाँ नहीं देते, और मुझे लगता है जानबूझकर नहीं देते। वे माप नहीं दे रहे, वे आईना दिखा रहे हैं। पद 12 में वे कबूल करते हैं, "इस समय मेरा ज्ञान अधूरा है"; शायद हमारा प्रेम भी उतना ही अधूरा है। पर अधूरापन और अनुपस्थिति एक चीज़ नहीं। जो प्रेम करना चाहता है, वह पहले ही प्रेम के भीतर खड़ा है, भले ही काँपते हुए। बाकी को मौन में छोड़ देना ही ईमानदारी है।
पृष्ठभूमि
कुरिन्थ एक बंदरगाह शहर था, नया पैसा, नई प्रतिष्ठा, और प्रतिस्पर्धा की हवा। वहाँ की कलीसिया ग़रीब था नहीं, आत्मिक वरदानों से भरी हुई थी, और ठीक इसी से टूट रही थी। अध्याय 12 और 14 के बीच पौलुस वरदानों पर लंबी बहस करते हैं, क्योंकि लोग पूछ रहे थे कि कौन-सा वरदान बड़ा है, यानी असल में, कौन बड़ा है।
भविष्यद्वाणी और ज्ञान वहाँ प्रतिष्ठा की मुद्रा थे। "सब भेदों" की समझ उस संस्कृति में विशेष दीक्षा का दावा थी, एक भीतरी घेरे की सदस्यता। पौलुस इस पूरी सीढ़ी को बीच से काट देते हैं, और वह भी अपने ही नाम से: "यदि मैं", न कि "यदि तुम"।
पहले श्रोता
कल्पना कीजिए कि यह पत्र किसी घर की सभा में ऊँचे स्वर में पढ़ा जा रहा है। कमरे में वह भाई बैठा है जिसकी भविष्यद्वाणी से लोग प्रभावित होते हैं, और वह बहन भी जिसके पास कोई चमकदार वरदान नहीं। दोनों यह वाक्य सुनते हैं।
पहले के लिए यह ज़मीन खिसकने जैसा था: उसकी पूरी पहचान एक वाक्य में तौली और हल्की पाई गई। दूसरी के लिए यह अजीब राहत थी: जिस दौड़ में वह कभी नहीं जीत सकती थी, वह दौड़ असली दौड़ थी ही नहीं। और शायद कमरे में एक असहज चुप्पी छाई होगी, क्योंकि सब जानते थे कि आपस के झगड़े, मुक़दमे और भोज की बेइज़्ज़ती किन लोगों की वजह से हुई थी। पौलुस ने किसी का नाम नहीं लिया; उन्होंने बस एक दर्पण रख दिया।
चिंतन
आप जिस चीज़ में सबसे ज़्यादा सक्षम हैं, क्या वही चीज़ आपको लोगों के पास ले जाती है या उनसे ऊपर बिठाती है?
"कुछ भी नहीं" शब्द सुनकर आपके भीतर पहली प्रतिक्रिया क्या उठती है: बचाव, डर, या राहत, और वह प्रतिक्रिया आपके बारे में क्या कहती है?
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1 Corinthians 13:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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1 कुरिन्थियों 13:2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 13:2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 13 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस यह नहीं कहता कि प्रेम के बिना वरदान बेकार हो जाते हैं। वह कहता है, "परन्तु प्रेम न रखूँ, तो मैं कुछ भी नहीं।" गिनती वरदानों की नहीं, मेरी होती है। पहाड़ हिल सकते हैं और फिर भी मेरे भीतर कुछ खाली रह सकता है। आज अपनी सेवा नहीं, अपने मन को देख। जो तू करता है, उसमें कितना है जो सचमुच किसी से प्रेम करता है?
वह सब बातें सह लेता है, सब बातों पर विश्वास करता है, सब बातों की आशा रखता है, सब बातों में धीरज धरता है।" पौलुस यह उस कलीसिया को लिख रहा था जो आपस में बँटी हुई थी, जहाँ हर कोई अपनी वरदान गिना रहा था। प्रेम का काम ढक लेना है, उघाड़ना नहीं। सोचो, जिस इंसान की कमज़ोरी तुम सबसे अच्छी तरह जानते हो, क्या तुम उसे ढकते हो या दूसरों को बताते हो?
पिता, धन्यवाद कि आपने मुझे सिखाया कि प्रेम के बिना मेरी सबसे सुंदर बातें भी केवल ठनठनाता हुआ पीतल और झंझनाती हुई झाँझ हैं। धन्यवाद कि आप मेरे शब्दों से पहले मेरे मन को देखते हैं, और अपने प्रेम से मेरी बोली को अर्थ देते हैं।
परन्तु जब सिद्ध आएगा, तब अधूरा मिट जाएगा।"
तेरी अधूरी समझ, अधूरी प्रार्थनाएँ, अधूरे जवाब, ये मिटेंगे इसलिए नहीं कि वे बेकार थे, बल्कि इसलिए कि पूरा आ जाएगा। जैसे दीया सूरज उगने पर बुझा दिया जाता है, वह नाकाम नहीं हुआ, उसका काम पूरा हुआ। आज जो धुँधला दिखता है, उसे कसकर मत पकड़। जो आने वाला है, उसका इंतज़ार कर।
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