1 कुरिन्थियों 8:4
पाठ
मूर्तियों को चढ़ाए गए माँस के बारे में पौलुस उस बात को दोहराते हैं जिसे कुरिन्थ के "ज्ञानी" विश्वासी बड़े आत्मविश्वास से कहते थे: "हम जानते हैं, कि मूरत जगत में कोई वस्तु नहीं, और एक को छोड़ और कोई परमेश्वर नहीं।" यानी जिस देवता के सामने वह बलि चढ़ी, वह देवता है ही नहीं; पत्थर पत्थर है, लकड़ी लकड़ी। संसार में केवल एक ही परमेश्वर हैं, और इसलिए वह माँस, अपने आप में, किसी अदृश्य शक्ति से रँगा हुआ नहीं। पौलुस इस वाक्य को स्वीकार करते हैं, पर उसे हूबहू वहीं छोड़ नहीं देते; आगे की आयतें दिखाएँगी कि सही जानकारी और सही जीवन के बीच अभी एक लंबी दूरी बाकी है।
मूल मर्म
यह आयत पहले परमेश्वर के बारे में कुछ कहती है, फिर हमारे बारे में। परमेश्वर के बारे में: वे अकेले हैं। इस्राएल की सबसे पुरानी स्वीकारोक्ति यहाँ एक यूनानी शहर की गली में, माँस की दुकान के सामने खड़ी हो जाती है। यदि एक ही परमेश्वर हैं, तो दुनिया की कोई भी वस्तु किसी और की जागीर नहीं; न कोई भोजन, न कोई दिन, न कोई जगह किसी प्रतिद्वंद्वी शक्ति के अधिकार में है। यह मुक्ति देने वाला सच है, और डरे हुए मन के लिए साँस लेने की जगह।
पर हमारे बारे में यह आयत कुछ बेचैन करने वाला भी कहती है। ध्यान दीजिए, पौलुस "हम जानते हैं" कहते हैं, ठीक उसी तरह जैसे आयत 2 में उन्होंने चेताया था कि जो समझता है कि वह जानता है, वह अब तक जानता नहीं। सच्चा वाक्य बोलने और सच्चाई में जीने में अंतर है। एकेश्वरवाद यहाँ कोई ठंडी सूचना नहीं, वह एक प्रेम का दावा है: यदि केवल एक ही परमेश्वर हैं, तो मेरा पूरा जीवन एक ही दिशा में मुड़ा हुआ होना चाहिए, और मेरी जानकारी मेरे भाई के लिए हथियार नहीं बन सकती।
सूत्र
जिस वाक्य को कुरिन्थ के विश्वासी दोहरा रहे थे, वह उनका अपना आविष्कार नहीं था। वह इस्राएल की सदियों पुरानी साँस थी: व्यवस्थाविवरण 4:39 में मूसा लोगों से कहते हैं कि ऊपर स्वर्ग में और नीचे पृथ्वी पर केवल यहोवा ही परमेश्वर हैं, कोई दूसरा नहीं। यह सच्चाई बेबीलोन के देवताओं के बीच भी टिकी रही, और अब यूनानी मंदिरों की छाया में भी टिकती है। पर ध्यान दीजिए कि पौलुस इस पुरानी स्वीकारोक्ति को ज्यों का त्यों नहीं छोड़ते। दो आयत आगे वे उसके भीतर यीशु को रख देते हैं: "एक ही प्रभु है, अर्थात् यीशु मसीह जिसके द्वारा सब वस्तुएँ हुईं।" इस्राएल का एक परमेश्वर अब पिता और पुत्र के नाम से पुकारा जाता है, और सृष्टि की सारी वस्तुएँ उन्हीं के हाथ से होकर आती हैं। यही वह सूत्र है जो माँस की दुकान को भी परमेश्वर के राज्य के नक्शे पर ले आता है।
दर्पण
आप शायद मूर्तियों के सामने चढ़े माँस से नहीं जूझते। पर सोचिए: किस चीज़ को आप चुपचाप एक अदृश्य शक्ति मान बैठे हैं? वह तारीख जब बैंक का किस्त कटता है, वह रिपोर्ट जो आपके बॉस के हाथ में है, वह बीमारी जिसका नाम लेते हुए आवाज़ धीमी हो जाती है, वह रिश्तेदार जिसकी नाराज़गी पूरे घर का मौसम तय करती है। मुँह से हम कहते हैं कि एक को छोड़ और कोई परमेश्वर नहीं; पर हमारी नींद, हमारा बजट और हमारी चुप्पी किसी और को सत्ता सौंपे बैठी है। और दूसरी तरफ़ वही ज्ञान घमण्ड बन जाता है: कलीसिया में हम जानते हैं कि कौन कच्चा है, कौन अंधविश्वासी, कौन अभी "वहाँ तक नहीं पहुँचा"। आज एक काग़ज़ पर उस एक चीज़ का नाम लिखिए जिससे आप भीतर ही भीतर डरते हैं, और उसके ऊपर ज़ोर से बोलकर लिखिए: "एक को छोड़ और कोई परमेश्वर नहीं।"
कठिन प्रश्न
यदि मूरत जगत में कोई वस्तु ही नहीं, तो फिर वह किसी को नुकसान कैसे पहुँचा सकती है? पौलुस आयत 7 में मानते हैं कि कुछ लोग अब तक "मूरत को कुछ समझने के कारण" खाते हैं, और उनका विवेक अशुद्ध हो जाता है। जो शून्य है, वह फिर भी किसी की आत्मा को घायल कर देता है। यह एक बेचैन करने वाली बात है: सच्चाई अपने आप, अपने बल पर, किसी के भीतर से डर नहीं निकाल देती। शायद इसीलिए पौलुस ज्ञान से शुरू करके प्रेम पर आ जाते हैं। यहाँ कोई साफ़-सुथरा हल नहीं मिलता। यह रहस्य बना रहता है कि परमेश्वर हमें एक ही झटके में आज़ाद क्यों नहीं कर देते, और क्यों हमारी आज़ादी दूसरे की धीमी चाल से बँधी रहती है।
श्रोता
कुरिन्थ की कलीसिया में अधिकांश लोग कुछ साल पहले तक उन्हीं मंदिरों में जाते थे। उनके लिए यह वाक्य कोई दार्शनिक सिद्धांत नहीं था, बल्कि एक ऐसी घोषणा थी जो उनके बचपन, उनके परिवार के त्योहारों और उनके व्यापारी संघ के भोज को काट देती थी। जो आर्थिक रूप से सक्षम थे, उन्हें निमंत्रण आते रहते थे; मना करने का मतलब ग्राहक खोना, रिश्ते खोना, समाज में छोटा हो जाना। पर कलीसिया के गरीब और दास सदस्यों के लिए माँस लगभग केवल मंदिर के उत्सव में ही मिलता था, इसलिए माँस की गंध और मूरत की गंध उनके मन में एक ही थी। एक ही वाक्य, दो बहुत अलग कानों में।
संदर्भ
यह पत्र लगभग सन् 54 के आसपास लिखा गया, जब पौलुस इफिसुस में थे और कुरिन्थ की कलीसिया ने उन्हें लिखकर कई सवाल भेजे थे; "अब … के विषय में" कहकर वे एक-एक करके उनका उत्तर देते हैं। कुरिन्थ एक बंदरगाह शहर था, दो समुद्रों के बीच, पैसे और प्रतिष्ठा से भरा, मंदिरों से भरा। वहाँ धर्म और सामाजिक जीवन अलग-अलग डिब्बे नहीं थे: शादी, जन्मदिन, व्यापारिक समझौता, सब किसी देवता के आँगन में ही होता था। इसीलिए यह सवाल सैद्धांतिक नहीं, रोज़मर्रा का था, और इसमें अमीर और गरीब, पुराने और नए विश्वासियों के बीच की दरार साफ़ दिखाई देती है।
चिंतन
जिस सच्चाई को आप सही-सही बोल सकते हैं, उसमें से कौन-सी अभी आपके जीने तक नहीं पहुँची है?
यदि कल कोई आपसे कमज़ोर विश्वास वाला व्यक्ति आपकी आज़ादी देखे, तो वह परमेश्वर के बारे में क्या सीखेगा?
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1 Corinthians 8:4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 कुरिन्थियों 8:4 का क्या अर्थ है?
1 कुरिन्थियों 8:4 किस विषय में है?
1 कुरिन्थियों 8:4 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 कुरिन्थियों 8:4 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 8:4 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 8 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
भोजन हमें परमेश्वर के निकट नहीं पहुँचाता, क्योंकि न तो खाने से हमें कुछ लाभ है और न खाने से कुछ हानि।"
पौलुस उन लोगों से बात कर रहा है जो अपने सही होने पर गर्व करते थे। वह कहता है, तुम्हारी थाली तुम्हें परमेश्वर के पास नहीं ले जाती। जो चीज़ें तुम्हें आत्मिक महसूस कराती हैं, वे शायद परमेश्वर की नज़र में बिल्कुल खाली हों। असली सवाल यह है, क्या तुम्हारी आज़ादी किसी कमज़ोर भाई को ठेस पहुँचा रही है?
परन्तु सावधान रहो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी यह स्वतंत्रता निर्बलों के लिये ठोकर का कारण हो जाए।" पौलुस यह नहीं कहता कि तुम गलत हो। तुम सही हो सकते हो, और फिर भी किसी के गिरने की वजह बन सकते हो। सोचो, तुम्हारी कौन सी आज़ादी किसी कमज़ोर विश्वासी को चुपचाप चोट पहुँचा रही है? प्रेम अपने अधिकार से बड़ा है।
कुरिन्थ के विश्वासी गलत नहीं थे। मूरत तो कुछ भी नहीं, फिर उसके सामने चढ़ाया मांस खाने में हर्ज क्या? पर पौलुस लिखता है, "ज्ञान घमण्ड उत्पन्न करता है, परन्तु प्रेम से उन्नति होती है।" सही होना और प्रेम करना, ये दो अलग बातें हैं। तुम बहस जीत सकते हो और उसी पल किसी कमज़ोर भाई को गिरा भी सकते हो। आज तुम्हें क्या ज़्यादा प्यारा है?
यद्यपि आकाश में और पृथ्वी पर बहुत से तथाकथित ईश्वर हैं, (जैसे बहुत से ईश्वर और बहुत से प्रभु हैं)।" पौलुस इनकार नहीं करता कि ये नाम मौजूद हैं। वह बस उन्हें "तथाकथित" कहता है। आज भी बहुत से प्रभु तुझ पर हक जताते हैं, पैसा, लोगों की राय, डर। सवाल यह नहीं कि वे हैं या नहीं। सवाल यह है कि सुबह उठकर तू किसकी आवाज़ मानता है।
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