बाइबल व्याख्या

1 यूहन्ना 3

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

यह पाठ

यूहन्ना पहले हमें देखने पर मजबूर करता है: "देखो, पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है, कि हम परमेश्वर की सन्तान कहलाएँ।" उस नाम से एक भविष्य जुड़ा है जो अभी छिपा है, और एक वर्तमान जो अभी दिखना चाहिए। इसलिए पत्री का यह अध्याय दो कसौटियाँ सामने रखता है: पाप के साथ हमारा टूटा हुआ रिश्ता, और भाई-बहनों के साथ हमारा जीवित प्रेम। बीच में मसीह खड़े हैं, जो पापों को हर ले जाने आए, और जिन्होंने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए। अंत में यूहन्ना उस मन की बात करता है जो हमें दोष देता है, और कहता है कि परमेश्वर उससे भी बड़े हैं।

मर्म

इस अध्याय की धुरी एक ही क्रिया है: "प्रगट हुआ।" यीशु मसीह इसलिए प्रगट हुए कि पापों को हर ले जाएँ (पद 5), परमेश्वर का पुत्र इसलिए प्रगट हुआ कि शैतान के कामों को नाश करे (पद 8), और वही मसीह फिर प्रगट होंगे, और तब हम उन्हें वैसा ही देखेंगे जैसे वे हैं (पद 2)। यूहन्ना नैतिकता का उपदेश नहीं दे रहा; वह इतिहास में हुए एक हस्तक्षेप की घोषणा कर रहा है। पवित्रता का आधार हमारा संकल्प नहीं, बल्कि यह तथ्य है कि परमेश्वर की सन्तान में उनका "बीज" बना रहता है (पद 9)। जन्म बदल गया है, इसलिए स्वभाव बदल रहा है। यह कर्म का धर्म नहीं, नए जन्म का फल है।

जुड़ा हुआ सूत्र

पद 12 में कैन का आना अचानक नहीं है। बाइबल की पहली हत्या भाई-हत्या थी, और वहीं से मनुष्य की कहानी टूटे हुए रिश्तों की कहानी बन गई। यूहन्ना कहता है: संसार आज भी उसी वंश में चलता है, और तुम्हारे प्रति उसका बैर इसी पुराने पैटर्न का हिस्सा है (पद 13)। पूरा छुटकारे का इतिहास इस उलटे बहाव के विरुद्ध चलता है: जहाँ कैन ने अपने भाई का लहू बहाया, वहाँ मसीह ने अपने भाइयों के लिए अपना लहू बहाया। "हमने प्रेम इसी से जाना, कि उसने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए" (पद 16)। कैन का प्रश्न था, क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ; क्रूस उत्तर है, और वह उत्तर अब हमसे दोहराया जाना है।

दर्पण

पद 17 इस अध्याय का सबसे असुविधाजनक वाक्य है, क्योंकि यह प्रेम को भावना से हटाकर बटुए तक ले आता है। जिसके पास संसार की सम्पत्ति है और वह अपने भाई को जरूरत में देखकर तरस नहीं खाता, उसमें परमेश्वर का प्रेम कैसे बना रह सकता है? ध्यान दें: यूहन्ना यह नहीं कहता कि वह देख नहीं सका। उसने देखा, और मन को बंद कर लिया। यही हमारी सबसे परिष्कृत भक्ति है: प्रार्थना सभा में आँसू, और बीमार रिश्तेदार के इलाज के खर्च पर चुप्पी। "वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्य के द्वारा भी" (पद 18)। सत्य यहाँ सिद्धांत नहीं, व्यवहार है, जो पैसे, समय और दरवाज़े खोलने में मापा जाता है।

कठिन प्रश्न

पद 9 खटकता है: "वह पाप कर ही नहीं सकता।" कौन इसे अपने बारे में कह सकता है? उसी पत्री का आरंभ कहता है कि जो पापरहित होने का दावा करता है, वह अपने आप को धोखा देता है। यूहन्ना अपने आप को काटता नहीं; वह दो सचाइयाँ साथ रखता है। वह उस जीवनशैली की बात कर रहा है जो पाप में बसती है, उसमें घर बनाती है। परमेश्वर से जन्मे व्यक्ति के लिए पाप अब घर नहीं, विश्वासघात है। फिर भी दबाव बना रहता है, और यूहन्ना उसे मिटाता नहीं। इसीलिए पद 20 इतना कीमती है: जब हमारा मन हमें दोष देता है, तब निर्णय हमारे मन के हाथ में नहीं है, क्योंकि परमेश्वर हमारे मन से बड़े हैं और सब कुछ जानते हैं। वे अधिक जानते हैं, और अधिक क्षमा करते हैं।

शास्त्र की गूँज

पद 5 के हाशिये पर यूहन्ना 1:29 दिया गया है, जहाँ बपतिस्मा देनेवाला यूहन्ना कहता है कि यह परमेश्वर का मेम्ना संसार का पाप उठा ले जाता है। यूहन्ना पाठक को याद दिला रहा है कि पवित्रता की मांग उसी व्यक्ति से आती है जिसने पहले बोझ उठाया। पद 17 के साथ व्यवस्थाविवरण 15:7,8 जुड़ा है, जहाँ इस्राएल को कहा गया कि गरीब भाई के सामने अपना हाथ बंद न करे। यानी यूहन्ना कोई नई नैतिकता नहीं गढ़ रहा; वह वाचा की पुरानी शर्त को मसीह की मृत्यु के प्रकाश में दोहरा रहा है। इस्राएल का खुला हाथ अब कलीसिया का खुला हाथ बनता है, इस अंतर के साथ कि अब हमारे पास क्रूस का नमूना है।

पृष्ठभूमि

पहली सदी का अंत, एशिया माइनर की छोटी कलीसियाएँ, और एक ताज़ा फूट। कुछ लोग समुदाय छोड़कर चले गए थे, यह दावा करते हुए कि उनके पास ऊँचा आत्मिक ज्ञान है और शरीर में जिया गया आचरण गौण है। यही वे "भरमानेवाले" हैं जिनसे पद 7 सावधान करता है। ऐसे माहौल में यूहन्ना ज्ञान की परीक्षा ज्ञान से नहीं, बल्कि प्रेम और धार्मिकता से लेता है। इन विश्वासियों की सामाजिक स्थिति कमज़ोर थी, उनका बहिष्कार होता था, इसलिए "संसार हमें नहीं जानता" कोई काव्य नहीं, रोज़ का अनुभव था। और इसी अपमान के भीतर उन्हें एक नाम दिया गया: परमेश्वर की सन्तान, अभी, और आगे उससे भी बढ़कर।

चिंतन

पिछले महीने में किस ठोस अवसर पर आपने किसी की ज़रूरत देखी और मन को बंद कर लिया, और आज उस पर क्या कदम मुमकिन है?

आपका मन आपको किस बात में दोष देता रहता है, और "परमेश्वर हमारे मन से बड़े हैं" को आप उस जगह पर सचमुच लागू करते हैं या नहीं?

1 John में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of John's Letters

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Letters of John

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1 John 3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 यूहन्ना 3 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना पहले हमें देखने पर मजबूर करता है: "देखो, पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है, कि हम परमेश्वर की सन्तान कहलाएँ।" उस नाम से एक भविष्य जुड़ा है जो अभी छिपा है, और एक वर्तमान जो अभी दिखना चाहिए। इसलिए पत्री का यह अध्याय दो कसौटियाँ सामने रखता है: पाप के साथ हमारा टूटा हुआ रिश्ता, और भाई-बहनों के साथ हमारा जीवित प्रेम। बीच में मसीह खड़े हैं, जो पापों को हर ले जाने आए, और जिन्होंने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए। अंत में यूहन्ना उस मन की बात करता है जो हमें दोष देता है, और कहता है कि परमेश्वर उससे भी बड़े हैं।
1 यूहन्ना 3 किस विषय में है?
पद 12 में कैन का आना अचानक नहीं है। बाइबल की पहली हत्या भाई-हत्या थी, और वहीं से मनुष्य की कहानी टूटे हुए रिश्तों की कहानी बन गई। यूहन्ना कहता है: संसार आज भी उसी वंश में चलता है, और तुम्हारे प्रति उसका बैर इसी पुराने पैटर्न का हिस्सा है (पद 13)। पूरा छुटकारे का इतिहास इस उलटे बहाव के विरुद्ध चलता है: जहाँ कैन ने अपने भाई का लहू बहाया, वहाँ मसीह ने अपने भाइयों के लिए अपना लहू बहाया। "हमने प्रेम इसी से जाना, कि उसने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए" (पद 16)। कैन का प्रश्न था, क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ; क्रूस उत्तर है, और वह उत्तर अब हमसे दोहराया जाना है।
1 यूहन्ना 3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 9 खटकता है: "वह पाप कर ही नहीं सकता।" कौन इसे अपने बारे में कह सकता है? उसी पत्री का आरंभ कहता है कि जो पापरहित होने का दावा करता है, वह अपने आप को धोखा देता है। यूहन्ना अपने आप को काटता नहीं; वह दो सचाइयाँ साथ रखता है। वह उस जीवनशैली की बात कर रहा है जो पाप में बसती है, उसमें घर बनाती है। परमेश्वर से जन्मे व्यक्ति के लिए पाप अब घर नहीं, विश्वासघात है। फिर भी दबाव बना रहता है, और यूहन्ना उसे मिटाता नहीं। इसीलिए पद 20 इतना कीमती है: जब हमारा मन हमें दोष देता है, तब निर्णय हमारे मन के हाथ में नहीं है, क्योंकि परमेश्वर हमारे मन से बड़े हैं और सब कुछ जानते हैं। वे अधिक जानते हैं, और अधिक क्षमा करते हैं।
1 यूहन्ना 3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पहली सदी का अंत, एशिया माइनर की छोटी कलीसियाएँ, और एक ताज़ा फूट। कुछ लोग समुदाय छोड़कर चले गए थे, यह दावा करते हुए कि उनके पास ऊँचा आत्मिक ज्ञान है और शरीर में जिया गया आचरण गौण है। यही वे "भरमानेवाले" हैं जिनसे पद 7 सावधान करता है। ऐसे माहौल में यूहन्ना ज्ञान की परीक्षा ज्ञान से नहीं, बल्कि प्रेम और धार्मिकता से लेता है। इन विश्वासियों की सामाजिक स्थिति कमज़ोर थी, उनका बहिष्कार होता था, इसलिए "संसार हमें नहीं जानता" कोई काव्य नहीं, रोज़ का अनुभव था। और इसी अपमान के भीतर उन्हें एक नाम दिया गया: परमेश्वर की सन्तान, अभी, और आगे उससे भी बढ़कर।
1 यूहन्ना 3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपका मन आपको किस बात में दोष देता रहता है, और "परमेश्वर हमारे मन से बड़े हैं" को आप उस जगह पर सचमुच लागू करते हैं या नहीं?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

1 John 3 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 18

पिता, मेरा प्रेम अक्सर बातों तक ही रह जाता है। मुझे ऐसा दिल दीजिए जो सिर्फ कहे नहीं, बल्कि करे। जहाँ किसी को मदद चाहिए, वहाँ मेरे हाथ बढ़ें, और मेरी सच्चाई मेरे कामों में दिखे, सिर्फ मेरी जुबान पर नहीं।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 7

पिता, मुझे धोखे से बचा, खासकर उस धोखे से जो मैं खुद को देता हूँ। सिर्फ अच्छी बातें कहना काफी नहीं, मेरे काम भी सच्चे हों। जैसा मसीह है, वैसा जीवन मुझमें गढ़ दे, थोड़ा थोड़ा करके, हर दिन।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

हे भाइयो, यदि संसार तुम से बैर रखता है, तो अचम्भा न करो।" यूहन्ना ने अभी कैन की बात की थी, जिसने अपने भाई को इसलिए मारा क्योंकि हाबिल के काम धर्म के थे। नफरत की जड़ यही है। जब तेरी ईमानदारी किसी को चुभती है, तो शायद तूने कुछ गलत नहीं किया। शायद तू सही जगह पर खड़ा है। हैरान मत हो, डगमगा भी मत।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

हे प्रियों, अब हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और अब तक यह प्रगट नहीं हुआ, कि हम क्या कुछ होंगे!" ध्यान दे, यूहन्ना यह नहीं कहता कि तू एक दिन संतान बनेगा। तू अभी है। जो अधूरा दिखता है, वह तेरी पहचान नहीं, बस तेरी अधूरी तस्वीर है। और बदलाव तपस्या से नहीं, उसे देखने से आएगा। आज तू किसे देख रहा है?

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