बाइबल व्याख्या

1 शमूएल 17

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

पलिश्ती और इस्राएल एला की तराई के दो पहाड़ों पर आमने-सामने खड़े हैं, और बीच की खाली घाटी में गत का एक दानव चालीस दिन तक सुबह-शाम एक ही चुनौती दोहराता है: एक आदमी भेजो, फैसला हो जाए। सारी सेना का "मन कच्चा" हो जाता है, जब तक बैतलहम से रोटी और पनीर पहुँचाने आया एक चरवाहा लड़का यह सवाल नहीं उठाता कि यह खतनारहित आदमी किस अधिकार से जीवित परमेश्वर की सेना को ललकार रहा है। पाँच चिकने पत्थर, एक गोफन, और लड़ाई खत्म।

मर्म

ध्यान दें कि दाऊद जो सुनता है, वह किसी और ने नहीं सुना। शाऊल के लिए यह सैन्य समस्या है, इस्राएलियों के लिए इनाम और शादी का अवसर, एलीआब के लिए छोटे भाई का अभिमान। दाऊद अकेला है जो पूछता है, "वह खतनारहित पलिश्ती क्या है कि जीवित परमेश्वर की सेना को ललकारे?" यह धर्मशास्त्रीय सुनाई है, सैन्य नहीं। गोलियत का असली अपराध इस्राएल का अपमान नहीं, परमेश्वर की पवित्रता पर हाथ डालना है। और इसीलिए उत्तर भी परमेश्वर की ओर से आता है, इस्राएल की क्षमता से नहीं। दाऊद खुद यह कह देता है: "यहोवा तलवार या भाले के द्वारा जयवन्त नहीं करता।" यह अध्याय अनुग्रह का व्याकरण है। उद्धार वहीं से आता है जहाँ मनुष्य के पास गिनने लायक कुछ नहीं बचा; पाँच हजार शेकेल के झिलम के सामने एक झोला और एक लाठी।

सूत्र

बाइबल की पूरी कहानी में परमेश्वर बार-बार एक प्रतिनिधि के हाथ में अपने लोगों का भविष्य रखते हैं। यहाँ दो सेनाएँ लड़ती नहीं; दो व्यक्ति लड़ते हैं, और जो एक के साथ होता है वह सबका हिस्सा बन जाता है। गोलियत गिरता है, तो पलिश्ती भागते हैं; इस्राएल ने कुछ नहीं किया, फिर भी इस्राएल जीत की लूट बटोरता है। यही वह ढाँचा है जिसमें मसीह का काम बैठता है: बैतलहम का बेटा, जिसे भाइयों ने तुच्छ जाना, अकेला घाटी में उतरता है और शत्रु को उसके अपने हथियार से मारता है। दाऊद गोलियत की ही तलवार खींचकर उसका सिर काटता है, जैसे क्रूस पर मृत्यु मृत्यु के हथियार से हारी। कुलुस्सियों 2:15 में पौलुस इसी चित्र में बोलता है: शक्तियाँ निःशस्त्र कर दी गईं, और उनका खुला तमाशा बनाया गया।

दर्पण

चालीस दिन। यही सबसे कड़वा विवरण है। कोई शत्रु जब रोज़ सुबह और साँझ वही एक बात दोहराता है, तो डर आदत बन जाता है और आदत धर्मशास्त्र बन जाती है। हम जीना सीख लेते हैं उस घाटी के किनारे: वह बॉस जिसकी आवाज़ आपको बच्चा बना देती है, वह मेडिकल रिपोर्ट, वह कर्ज़, वह लत जिसका नाम आप घर में नहीं लेते, वह रिश्ता जो हर रविवार को ठंडा लगता है। हम बहादुरी की कमी से नहीं, थकान से हार मानते हैं। और फिर हम शाऊल का कवच पहनने की कोशिश करते हैं, दूसरों की तरकीबें, दूसरों की भाषा, दूसरों की आध्यात्मिकता, जिसके बारे में दाऊद ईमानदारी से कहता है, "मैंने इन्हें नहीं परखा है।" परमेश्वर आपको दूसरे की पहचान में नहीं भेजते। आज एक कागज़ पर उस एक बात का नाम लिखिए जो चालीस दिन से आपको सुबह-शाम ललकारती है, और उसके नीचे लिखकर ऊँची आवाज़ में पढ़िए: "संग्राम तो यहोवा का है।"

पृष्ठभूमि

समय ऐसा है जब इस्राएल के पास पहला राजा है और वह डर के मारे तंबू में बैठा है। यह विडंबना है: लोगों ने राजा माँगा था ताकि कोई उनके आगे चलकर उनकी लड़ाइयाँ लड़े, और अब वही राजा सबसे लंबा आदमी होकर भी सबसे पहले काँपता है। पलिश्ती तटीय मैदान की लोहा-जानने वाली, सैन्य रूप से बेहतर सभ्यता थे; एला की तराई यहूदा के पहाड़ों में घुसने का रास्ता थी, यानी दाऊद के अपने घर तक का रास्ता। द्वंद्वयुद्ध की यह प्रथा असल में सौदेबाज़ी थी: एक की मृत्यु, पूरे राष्ट्र की अधीनता। और सम्मान-अपमान की उस दुनिया में गोलियत का देवताओं के नाम पर कोसना खोखली गाली नहीं, आत्मिक युद्ध की घोषणा थी।

कठिन प्रश्न

तो क्या परमेश्वर हमेशा गोलियत गिराते हैं? हमारा अनुभव कहता है: नहीं। बहुत विश्वासी लोग गोफन लेकर उतरे और वापस नहीं आए। अगर हम इस अध्याय को सफलता का फॉर्मूला बना दें, तो अगली बार हार हमें परमेश्वर पर नहीं, अपने विश्वास की मात्रा पर शक कराएगी। ध्यान दीजिए दाऊद क्या नहीं कहता। वह नहीं कहता कि मैं जीतूँगा क्योंकि मैं योग्य हूँ, न यह कि परमेश्वर हमेशा ऐसा ही करते हैं। वह कहता है कि यह लड़ाई परमेश्वर की है और परमेश्वर अपने नाम की रक्षा करेंगे, "तब समस्त पृथ्वी के लोग जान लेंगे कि इस्राएल में एक परमेश्वर है।" परमेश्वर का लक्ष्य उनका नाम है, और वह नाम कभी घाटी में जीत से, कभी घाटी में मृत्यु से महिमा पाता है। यह रहस्य आराम नहीं देता, पर यह झूठ भी नहीं बोलता।

शास्त्र की गूँज

एक अध्याय पहले शमूएल से कहा गया था कि मनुष्य बाहरी रूप देखता है पर यहोवा मन को देखते हैं (1 शमूएल 16:7); अध्याय 17 उसी वाक्य का नाट्य-रूप है, जिसमें छः हाथ एक बित्ता की लंबाई और पाँच हजार शेकेल का कवच पूरी तरह बेकार साबित होते हैं। और अंत में शाऊल का सवाल गूँजता है, "तू किसका पुत्र है?" राजा अपने भावी उत्तराधिकारी को पहचान नहीं पाता; वही अंधापन बाद में उस बड़े दाऊद के साथ दोहराया जाएगा, जिसे उसके अपने लोगों ने नहीं पहचाना। इसी अध्याय के हाशिये पर भजन 27:3 का उल्लेख यूँ ही नहीं है: सेना छावनी डाले तो भी मेरा मन न डरेगा।

चिंतन के प्रश्न

आपकी घाटी में जो आवाज़ चालीस दिन से गूँज रही है, उसे आप सैन्य समस्या मानकर हल करने की कोशिश कर रहे हैं या दाऊद की तरह पूछ पाते हैं कि यहाँ वास्तव में किसका नाम दाँव पर है?

किसका कवच आप पहनकर चलने की कोशिश कर रहे हैं, और उसे उतारने पर आपके हाथ में जो थोड़ा-सा बचता है, क्या आप उसे परमेश्वर के हाथ में देने को तैयार हैं?

1 Samuel में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

1 Samuel: Looking on the Heart

Dale Ralph Davis

Storytelling commentary at its best, from Hannah's prayer to David's rise.

The Message of Samuel

Mary Evans

One clear guide through both books of Samuel and their flawed kings.

1 Samuel For You

Tim Chester

Accessible walk through Samuel, Saul and David with constant application.

1 and 2 Samuel: An Introduction and Commentary

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1 and 2 Samuel

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1 Samuel 17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

1 शमूएल 17 का क्या अर्थ है?
पलिश्ती और इस्राएल एला की तराई के दो पहाड़ों पर आमने-सामने खड़े हैं, और बीच की खाली घाटी में गत का एक दानव चालीस दिन तक सुबह-शाम एक ही चुनौती दोहराता है: एक आदमी भेजो, फैसला हो जाए। सारी सेना का "मन कच्चा" हो जाता है, जब तक बैतलहम से रोटी और पनीर पहुँचाने आया एक चरवाहा लड़का यह सवाल नहीं उठाता कि यह खतनारहित आदमी किस अधिकार से जीवित परमेश्वर की सेना को ललकार रहा है। पाँच चिकने पत्थर, एक गोफन, और लड़ाई खत्म।
1 शमूएल 17 किस विषय में है?
बाइबल की पूरी कहानी में परमेश्वर बार-बार एक प्रतिनिधि के हाथ में अपने लोगों का भविष्य रखते हैं। यहाँ दो सेनाएँ लड़ती नहीं; दो व्यक्ति लड़ते हैं, और जो एक के साथ होता है वह सबका हिस्सा बन जाता है। गोलियत गिरता है, तो पलिश्ती भागते हैं; इस्राएल ने कुछ नहीं किया, फिर भी इस्राएल जीत की लूट बटोरता है। यही वह ढाँचा है जिसमें मसीह का काम बैठता है: बैतलहम का बेटा, जिसे भाइयों ने तुच्छ जाना, अकेला घाटी में उतरता है और शत्रु को उसके अपने हथियार से मारता है। दाऊद गोलियत की ही तलवार खींचकर उसका सिर काटता है, जैसे क्रूस पर मृत्यु मृत्यु के हथियार से हारी। कुलुस्सियों 2:15 में पौलुस इसी चित्र में बोलता है: शक्तियाँ निःशस्त्र कर दी गईं, और उनका खुला तमाशा बनाया गया।
1 शमूएल 17 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
समय ऐसा है जब इस्राएल के पास पहला राजा है और वह डर के मारे तंबू में बैठा है। यह विडंबना है: लोगों ने राजा माँगा था ताकि कोई उनके आगे चलकर उनकी लड़ाइयाँ लड़े, और अब वही राजा सबसे लंबा आदमी होकर भी सबसे पहले काँपता है। पलिश्ती तटीय मैदान की लोहा-जानने वाली, सैन्य रूप से बेहतर सभ्यता थे; एला की तराई यहूदा के पहाड़ों में घुसने का रास्ता थी, यानी दाऊद के अपने घर तक का रास्ता। द्वंद्वयुद्ध की यह प्रथा असल में सौदेबाज़ी थी: एक की मृत्यु, पूरे राष्ट्र की अधीनता। और सम्मान-अपमान की उस दुनिया में गोलियत का देवताओं के नाम पर कोसना खोखली गाली नहीं, आत्मिक युद्ध की घोषणा थी।
1 शमूएल 17 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
एक अध्याय पहले शमूएल से कहा गया था कि मनुष्य बाहरी रूप देखता है पर यहोवा मन को देखते हैं (1 शमूएल 16:7); अध्याय 17 उसी वाक्य का नाट्य-रूप है, जिसमें छः हाथ एक बित्ता की लंबाई और पाँच हजार शेकेल का कवच पूरी तरह बेकार साबित होते हैं। और अंत में शाऊल का सवाल गूँजता है, "तू किसका पुत्र है?
1 शमूएल 17 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
किसका कवच आप पहनकर चलने की कोशिश कर रहे हैं, और उसे उतारने पर आपके हाथ में जो थोड़ा-सा बचता है, क्या आप उसे परमेश्वर के हाथ में देने को तैयार हैं?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

1 Samuel 17 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 32

पिता, मेरे सामने खड़ी मुश्किलें मुझसे कहीं बड़ी दिखती हैं और मन डर से भर जाता है। मुझे वह साहस दे जो तुझ पर भरोसा करने से आता है। मैं पीछे न हटूँ, बल्कि तेरे साथ चलकर आगे बढ़ूँ, क्योंकि लड़ाई मेरी नहीं, तेरी है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 6

पिता, कभी कभी मेरे सामने खड़ी मुश्किलें पीतल के कवच जैसी चमकती हैं, मजबूत और अजेय। मेरा दिल डर से छोटा हो जाता है। मुझे याद दिला कि बाहर का रौब तेरे सामने कुछ भी नहीं। मेरी आँखें उस कद से हटाकर अपनी सामर्थ्य पर टिका दे।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 22

पिता, दाऊद ने अपना सामान किसी और के हाथ में सौंपा और आगे बढ़ गया। मुझे भी सिखा कि जो बोझ मैं ढो रहा हूँ, उसे तेरे हाथों में छोड़ दूँ। जहाँ तू मुझे भेज रहा है, वहाँ डरते हुए नहीं, भरोसे के साथ दौड़कर जाऊँ।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 1

पलिश्तियों ने अपनी सेनाओं को युद्ध के लिये इकट्ठा किया... और सोको और अजेका के बीच एपेसदम्मीम में डेरे डाले।"

गोलियत का नाम अभी आया भी नहीं, सिर्फ जगहों के नाम हैं। पर ध्यान दे, शत्रु यहूदा की ही ज़मीन पर डेरा डाल रहा है, वादे के देश के भीतर।

तेरी लड़ाई भी शायद ऐसे ही शुरू हुई थी, बिना शोर के। परमेश्वर उस नक्शे को पहले से जानता है।

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