बाइबल व्याख्या

2 इतिहास 13

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

अबिय्याह तीन साल ही यहूदा पर राज करता है, और उसी छोटे-से कार्यकाल में वह अपने से दुगुनी बड़ी सेना के सामने खड़ा होता है। समारैम पहाड़ पर से वह उत्तर के इस्राएलियों को पुकारकर याद दिलाता है कि राज्य दाऊद के वंश को नमक वाली वाचा से दिया गया है, कि उन्होंने यहोवा के याजकों को निकालकर सोने के बछड़े खड़े कर लिए हैं, और कि अपने पूर्वजों के परमेश्वर से लड़ना व्यर्थ है। यारोबाम जवाब में भाषण नहीं, घात लगाता है। यहूदा आगे-पीछे से घिर जाता है, यहोवा की दुहाई देता है, याजक तुरहियाँ फूँकते हैं, और युद्ध पलट जाता है। अंत में बेतेल तक अबिय्याह के हाथ में आ जाता है।

मर्म

इतिहास की यह कहानी एक वाक्य पर टिकी है: "यहूदी इस कारण प्रबल हुए कि उन्होंने अपने पितरों के परमेश्वर यहोवा पर भरोसा रखा था।" ध्यान दीजिए कि भरोसा यहाँ भावना नहीं, बल्कि एक ठोस स्थिति में की गई पुकार है, तब जब आगे भी तलवार थी और पीछे भी। इतिहास की पुस्तक लगातार यही सिखाती है कि राज्य परमेश्वर का है, दाऊद के वंश के हाथ में केवल सौंपा गया है। इसलिए अबिय्याह कहता है, "तुम सोचते हो कि हम यहोवा के राज्य का सामना करेंगे।" यारोबाम की असली भूल सैन्य नहीं, धार्मिक थी: उसने उपासना को अपनी सुविधा के अनुसार गढ़ लिया, ऐसे याजक बना लिए जो केवल शुल्क चुकाकर याजक बन जाते थे। जहाँ परमेश्वर की उपासना मनमानी हो जाती है, वहाँ संख्या-बल भी बचा नहीं सकता।

सूत्र

अबिय्याह जिस "नमक वाली वाचा" की दुहाई देता है, वह वही वादा है जो आगे चलकर दाऊद के वंश में एक अंतिम राजा तक पहुँचता है। नमक का अर्थ है: यह सौदा सड़ता नहीं, टिकता है। मज़े की बात यह है कि अबिय्याह स्वयं इस वाचा का बहुत कमज़ोर पात्र है, तीन साल, चौदह पत्नियाँ, और बस। फिर भी वाचा उसकी योग्यता पर नहीं, परमेश्वर की सच्चाई पर खड़ी है। यही पूरे पुराने नियम का तनाव है: वादा बड़ा, वारिस छोटे। जब यीशु मसीह आते हैं, तो वे पहली बार ऐसे दाऊद-पुत्र हैं जिनके मुँह का दावा और जीवन का सच एक हो जाता है। वे भी घिरे हुए थे, आगे-पीछे से, और उन्होंने भी पुकारा; पर उन्होंने शत्रु को मारकर नहीं, स्वयं मरकर जीत पाई।

दर्पण

आपने कभी ऐसा भाषण दिया है जिस पर आपका अपना जीवन खरा नहीं उतरता? अबिय्याह की तुरही बजती है, "हम तो अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञाओं को मानते रहे हैं," और दो पृष्ठ बाद चौदह पत्नियाँ गिनाई जाती हैं। यह पाठ उस गर्व को नंगा करता है जो हम सही पक्ष में होने से कमाते हैं: सही कलीसिया, सही धर्मसिद्धांत, सही राजनीतिक राय। दूसरों की मूरतें गिनना आसान है, अपने बछड़े पहचानना कठिन। और फिर वह दूसरा क्षण है, पद चौदह: जब आपको पता चलता है कि आप घिर चुके हैं, आगे नौकरी का दबाव, पीछे घर की चुप्पी, और कोई निकास नहीं दिखता। वहाँ यहूदा ने रणनीति नहीं बदली, उसने दुहाई दी।

आज दस मिनट निकालिए और कागज़ पर वह एक बात लिखिए जिसके बारे में आप दूसरों को उपदेश देते हैं पर स्वयं नहीं जीते; फिर उसे परमेश्वर के सामने ऊँची आवाज़ में पढ़कर क्षमा माँगिए और कागज़ फाड़ दीजिए।

अंतर्पाठ

पद नौ के साथ इतिहास की पुस्तक ने स्वयं यिर्मयाह 2:11 की ओर इशारा किया है, जहाँ परमेश्वर शिकायत करते हैं कि कोई जाति अपने देवता नहीं बदलती, पर उनकी प्रजा ने अपनी महिमा बदल डाली। यही अबिय्याह का आरोप है: तुमने बदला नहीं, घटाया है। दूसरी ओर, नमक वाली वाचा का यह भरोसा आगे चलकर चुनौती में पड़ता है, जब यही दाऊद-वंश बाबुल ले जाया जाता है और सिंहासन खाली हो जाता है। तब पता चलता है कि वाचा का टिकाऊपन किसी राजमहल में नहीं, परमेश्वर के वचन में है। इसलिए इस अध्याय को "हमारा पक्ष जीतता है" के रूप में नहीं, बल्कि "परमेश्वर अपना वचन निभाते हैं" के रूप में पढ़ना ही ईमानदारी है।

प्रश्न

पाँच लाख मारे गए। यह आँकड़ा किसी भी संवेदनशील पाठक के गले में अटकता है, और उससे भी ज़्यादा यह वाक्य कि "परमेश्वर ने उन्हें उनके हाथ में कर दिया।" ये मरनेवाले भी अब्राहम की संतान थे, वही भाई जिन्हें अबिय्याह पुकारकर समझा रहा था। मैं इसे मीठा नहीं कर सकता। इतना ज़रूर कहूँगा कि पाठ इस जीत का जश्न नहीं मनाता; वह तुरंत अबिय्याह की हरम-सूची पर उतर आता है, मानो विजेता की चमक जल्दी ही फीकी पड़ जाती हो। और यह भी सच है कि यहाँ परमेश्वर का न्याय दिखता है, पर उनका अंतिम शब्द नहीं। अंतिम शब्द क्रूस है, जहाँ भाइयों का खून बहाने के बजाय परमेश्वर का पुत्र अपना खून बहाता है।

बारीकी

"साँस बाँधकर फूँकने को तुरहियां।" यह अजीब-सा वाक्यांश पूरे अध्याय की कुंजी है। युद्ध में तुरही बजाना केवल संकेत नहीं था; गिनती की पुस्तक में यह परमेश्वर के सामने स्मरण-पुकार थी, मानो सेना कह रही हो, हे परमेश्वर, हमें याद कीजिए। इसलिए पद चौदह में क्रम ध्यान दीजिए: पहले यहूदा घिरता है, फिर दुहाई देता है, फिर याजक फूँकते हैं, और तब जयजयकार होता है। जीत का पहला औज़ार हथियार नहीं, श्वास है। जिन याजकों को यारोबाम ने निकाल दिया था, वही अब रणभूमि में खड़े हैं। उपासना यहाँ युद्ध से अलग कोई धार्मिक सजावट नहीं, वह युद्ध का मोर्चा है।

चिंतन

आपके जीवन में वह कौन-सी "सुविधा की उपासना" है, जिसे आपने यारोबाम की तरह अपने हाथ से गढ़ा है क्योंकि असली आज्ञाकारिता महँगी पड़ती थी?

जब आप आगे-पीछे से घिरे थे, आपकी पहली प्रतिक्रिया रणनीति थी या दुहाई? और उससे आपके भरोसे के बारे में क्या खुलता है?

2 Chronicles में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Chronicles

Michael Wilcock

Shows why the retold history of Chronicles is a book of hope.

2 Chronicles: An Introduction and Commentary

Martin Selman

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

1 and 2 Chronicles

Andrew Hill

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2 Chronicles 13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 इतिहास 13 का क्या अर्थ है?
अबिय्याह तीन साल ही यहूदा पर राज करता है, और उसी छोटे-से कार्यकाल में वह अपने से दुगुनी बड़ी सेना के सामने खड़ा होता है। समारैम पहाड़ पर से वह उत्तर के इस्राएलियों को पुकारकर याद दिलाता है कि राज्य दाऊद के वंश को नमक वाली वाचा से दिया गया है, कि उन्होंने यहोवा के याजकों को निकालकर सोने के बछड़े खड़े कर लिए हैं, और कि अपने पूर्वजों के परमेश्वर से लड़ना व्यर्थ है। यारोबाम जवाब में भाषण नहीं, घात लगाता है। यहूदा आगे-पीछे से घिर जाता है, यहोवा की दुहाई देता है, याजक तुरहियाँ फूँकते हैं, और युद्ध पलट जाता है। अंत में बेतेल तक अबिय्याह के हाथ में आ जाता है।
2 इतिहास 13 किस विषय में है?
अबिय्याह जिस "नमक वाली वाचा" की दुहाई देता है, वह वही वादा है जो आगे चलकर दाऊद के वंश में एक अंतिम राजा तक पहुँचता है। नमक का अर्थ है: यह सौदा सड़ता नहीं, टिकता है। मज़े की बात यह है कि अबिय्याह स्वयं इस वाचा का बहुत कमज़ोर पात्र है, तीन साल, चौदह पत्नियाँ, और बस। फिर भी वाचा उसकी योग्यता पर नहीं, परमेश्वर की सच्चाई पर खड़ी है। यही पूरे पुराने नियम का तनाव है: वादा बड़ा, वारिस छोटे। जब यीशु मसीह आते हैं, तो वे पहली बार ऐसे दाऊद-पुत्र हैं जिनके मुँह का दावा और जीवन का सच एक हो जाता है। वे भी घिरे हुए थे, आगे-पीछे से, और उन्होंने भी पुकारा; पर उन्होंने शत्रु को मारकर नहीं, स्वयं मरकर जीत पाई।
2 इतिहास 13 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज दस मिनट निकालिए और कागज़ पर वह एक बात लिखिए जिसके बारे में आप दूसरों को उपदेश देते हैं पर स्वयं नहीं जीते; फिर उसे परमेश्वर के सामने ऊँची आवाज़ में पढ़कर क्षमा माँगिए और कागज़ फाड़ दीजिए।
2 इतिहास 13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पाँच लाख मारे गए। यह आँकड़ा किसी भी संवेदनशील पाठक के गले में अटकता है, और उससे भी ज़्यादा यह वाक्य कि "परमेश्वर ने उन्हें उनके हाथ में कर दिया।" ये मरनेवाले भी अब्राहम की संतान थे, वही भाई जिन्हें अबिय्याह पुकारकर समझा रहा था। मैं इसे मीठा नहीं कर सकता। इतना ज़रूर कहूँगा कि पाठ इस जीत का जश्न नहीं मनाता; वह तुरंत अबिय्याह की हरम-सूची पर उतर आता है, मानो विजेता की चमक जल्दी ही फीकी पड़ जाती हो। और यह भी सच है कि यहाँ परमेश्वर का न्याय दिखता है, पर उनका अंतिम शब्द नहीं। अंतिम शब्द क्रूस है, जहाँ भाइयों का खून बहाने के बजाय परमेश्वर का पुत्र अपना खून बहाता है।
2 इतिहास 13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन में वह कौन-सी "सुविधा की उपासना" है, जिसे आपने यारोबाम की तरह अपने हाथ से गढ़ा है क्योंकि असली आज्ञाकारिता महँगी पड़ती थी?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

2 Chronicles 13 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 2

पिता, धन्यवाद कि आप हर जीवन के वर्ष गिनते हैं। अबिय्याह ने यरूशलेम में केवल तीन वर्ष राज्य किया, फिर भी आपने उसका और उसकी माता मीकायाह का नाम याद रखा। धन्यवाद कि हमारा छोटा सा समय और हमारा परिवार आपकी दृष्टि में अनमोल है, और लड़ाई के दिनों में भी आप हमें नहीं भूलते।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 16

पिता, जब हालात मुझसे बड़े लगते हैं, तो याद दिला कि लड़ाई तेरे हाथ में है। मैं अपनी ताकत पर नहीं, तुझ पर भरोसा रखना सीखूँ। जहाँ मैं हार मान बैठता हूँ, वहाँ तू आगे बढ़कर मेरे लिए खड़ा हो जा।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 3

पिता, धन्यवाद कि जब अबिय्याह के चार लाख के सामने यारोबाम के आठ लाख खड़े थे, तब भी गिनती ने नहीं, आपने ही फैसला किया। धन्यवाद कि मेरी लड़ाइयों में भी दुश्मन की संख्या नहीं, आपकी उपस्थिति निर्णय करती है। आप पर भरोसा रखना मुझे सिखाने के लिए धन्यवाद।

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