2 यूहन्ना 1:3
यह पाठ
एक बूढ़े आदमी का पत्र, कुछ ही पंक्तियों का, एक पपाइरस के टुकड़े पर जो एक हाथ में समा जाए। तीसरी पंक्ति में वह अभिवादन आता है जिसे पढ़नेवाला ऊँची आवाज़ में उस कमरे में बोलता है जहाँ लोग बैठे हैं: परमेश्वर पिता और पिता के पुत्र यीशु मसीह की ओर से अनुग्रह, दया और शान्ति हमारे साथ रहेंगे, और वे अकेले नहीं आते, वे सत्य और प्रेम के साथ आते हैं। यह प्रार्थना जैसी लगती है, पर वाक्य की बनावट प्रार्थना की नहीं है। यह घोषणा है। प्राचीन यह नहीं कह रहा कि काश ऐसा हो; वह कह रहा है कि ऐसा होगा। और ध्यान दीजिए, "तुम्हारे साथ" नहीं, "हमारे साथ"। लिखनेवाला खुद उसी वरदान के नीचे खड़ा है जो वह दूसरों पर उँडेल रहा है।
मर्म
पहली सदी में हर साधारण पत्र एक ही शब्द से शुरू होता था: "आनन्द हो"। बाज़ार का हिसाब, सैनिक की चिट्ठी, माँ का संदेश, सब में वही खोखला शिष्टाचार। यहाँ वह ढाँचा टूटता है। अनुग्रह वह है जो कमाया नहीं जाता, दया वह है जो टूटे हुए पर झुकती है, और शान्ति वह इब्रानी शालोम है, केवल लड़ाई का न होना नहीं बल्कि जीवन का सही जगह पर बैठ जाना। तीनों का स्रोत एक ही बताया गया है: पिता और पुत्र, एक ही "की ओर से" के नीचे। यह व्याकरण की छोटी-सी बात धर्मशास्त्र की बड़ी बात है। जो लोग कह रहे थे कि यीशु सचमुच शरीर में नहीं आया, उनके सामने यूहन्ना पुत्र को पिता के बराबर उसी देनेवाले आसन पर बिठा देता है, बिना बहस किए, बस अभिवादन में।
सूत्र
सदियों तक इस्राएल में एक ही आशीष सबसे ज़्यादा सुनी गई थी: मन्दिर के आँगन में याजक हाथ उठाकर लोगों पर परमेश्वर का नाम रखता था, और उस आशीष का अन्तिम शब्द शान्ति था। अब वही आशीष एक घर के कमरे में, एक बूढ़े के काँपते हाथ से लिखे कागज़ से आती है, और उसका स्रोत बदल गया है: पिता और पुत्र। इससे भी गहरा सूत्र "दया और सत्य" में छिपा है। ये दोनों शब्द पुराने नियम में परमेश्वर के अपने वर्णन से आते हैं, वह वाचा की करुणा और अटल वफ़ादारी जिसके सहारे इस्राएल जीवित रहा। यूहन्ना कहता है कि वही करुणा अब देह लेकर आई है, और जो इसे नकारते हैं वे परमेश्वर के अपने चरित्र से कट जाते हैं।
दर्पण
हम आशीषों के आदी हो चुके हैं। "प्रभु आशीष दे" फ़ोन के संदेश के अंत में वैसे ही टँगा रहता है जैसे पहली सदी में "आनन्द हो" टँगा रहता था, अर्थ से खाली। इस पद की चुभन यह है कि यह शिष्टाचार नहीं, दावा है। और दावा वहाँ चुभता है जहाँ आप हिसाब लगाते हैं: नौकरी में जहाँ आपकी कीमत आपके प्रदर्शन से तय होती है, घर में जहाँ प्रेम अच्छे व्यवहार के बदले मिलता है, चर्च में जहाँ आपको लगता है कि आपकी जगह आपकी सेवा से बनी है। अनुग्रह का मतलब है कि इनमें से कोई भी तराज़ू परमेश्वर के हाथ में नहीं है। आज एक काम कीजिए: अपने घर या समूह के एक व्यक्ति का नाम लीजिए, उसके सामने खड़े होकर या फ़ोन पर, यह पूरा पद उसका नाम जोड़कर ऊँची आवाज़ में बोलिए।
पृष्ठभूमि
पहली सदी का अन्त, सम्भवतः इफिसुस के आसपास का इलाका। कोई गिरजाघर नहीं है; विश्वासी किसी सम्पन्न स्त्री के घर के आँगन में जमा होते हैं, तीस-चालीस लोग, तेल के दीये की गंध, गली से आती आवाज़ें, दरवाज़ा आधा खुला। पत्र आया है और कोई उसे ज़ोर से पढ़ रहा है, क्योंकि अधिकांश लोग पढ़ नहीं सकते। उस समय सराय गन्दी और खतरनाक थीं, इसलिए यात्रा करनेवाले शिक्षक विश्वासियों के घरों में ठहरते थे। यही व्यवस्था अब खतरा बन गई है: कुछ शिक्षक आ रहे हैं जो कहते हैं कि मसीह सचमुच माँस-मज्जा में नहीं आया। घर के दरवाज़े का मतलब है समुदाय का दरवाज़ा। इसीलिए यह छोटा-सा अभिवादन असल में एक सीमा-रेखा है।
मुख्य पात्र
इस पद का असली कर्ता कोई मनुष्य नहीं है। अनुग्रह, दया और शान्ति के पीछे क्रिया का विषय परमेश्वर है, और वे देनेवाले के रूप में सामने आते हैं, माँगनेवाले के रूप में नहीं। ध्यान दीजिए कि दया शब्द यूहन्ना के लेखन में लगभग कहीं और नहीं मिलता; वह इसे यहाँ जोड़ता है क्योंकि यह मण्डली डरी हुई और थकी हुई है, और दया वह गुण है जो झुककर उठाती है। पर यही परमेश्वर सत्य और प्रेम के साथ आते हैं, दोनों एक साथ। यह वही पत्र है जो आगे कहता है कि झूठे शिक्षक को घर में मत आने दो। जो परमेश्वर गले लगाते हैं, वही सीमा भी खींचते हैं, और यह विरोधाभास नहीं, एक ही चरित्र के दो चेहरे हैं।
पहले सुननेवाले
"चुनी हुई महिला और उसके बच्चे" सम्भवतः कोई अकेली स्त्री नहीं, बल्कि एक पूरी मण्डली है, प्यार से दिया गया छिपा हुआ नाम। साम्राज्य की नज़र में ये लोग कुछ भी नहीं थे: कारीगर, दास, कुछ व्यापारी, बिना मन्दिर, बिना पुजारी, बिना कानूनी पहचान। और उन्हें "चुनी हुई" कहकर सम्बोधित किया जाता है। उन्होंने इस पद में जो सुना वह हमसे छूट जाता है: क्रिया भविष्य काल में है। रहेंगे। जिनका कल अनिश्चित था, जिनके बीच से कुछ लोग अभी-अभी निकल गए थे, उनके कानों में यह वचन एक वादे की तरह पड़ा। और "हमारे साथ" शब्द ने उन्हें उस बूढ़े प्राचीन के साथ एक ही पाँत में खड़ा कर दिया।
चिंतन
आप अपने जीवन में किस चीज़ को अब भी परमेश्वर की स्वीकृति की कीमत मानकर चुका रहे हैं, जबकि यह पद कहता है कि वह मुफ़्त दी जा चुकी है?
यूहन्ना अनुग्रह और सत्य को अलग नहीं करता। आपके रिश्तों में इन दोनों में से कौन-सा कमज़ोर पड़ रहा है, और उसका असर किस पर हो रहा है?
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2 John 1:3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 यूहन्ना 1:3 का क्या अर्थ है?
2 यूहन्ना 1:3 किस विषय में है?
2 यूहन्ना 1:3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 यूहन्ना 1:3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 यूहन्ना 1:3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 John 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
अपने विषय में चौकस रहो, कि जो परिश्रम हमने किया है, उसे तुम न खोओ, वरन् उसका पूरा प्रतिफल पाओ।" यूहन्ना यहाँ किसी बाहर के दुश्मन से नहीं डरा रहा, वह कहता है अपने आप को सम्भालो। सालों की मेहनत एक दिन की लापरवाही से बिखर सकती है। जो विश्वास तुम्हें मिला है, वह किसी के आँसुओं और प्रार्थनाओं की कमाई है। आज तुम उसे सँभाल रहे हो या हल्के में ले रहे हो?
पिता, मुझे समझ दे कि मैं किसे अपना साथ दूँ और किस बात से दूर रहूँ। मेरा मन सबके लिए खुला रहे, पर ऐसा न हो कि किसी के गलत काम में मैं भी हिस्सेदार बन जाऊँ। सच्चाई से प्रेम करना सिखा, और प्रेम में सच्चा बने रहना भी।
यूहन्ना कुछ नया नहीं लिखता। वह कहता है, "मैं तुझे कोई नई आज्ञा नहीं, परन्तु वही जो आरम्भ से हमारे पास है, लिखता हूँ।" और ध्यान दे, वह आज्ञा नहीं देता, विनती करता है। बूढ़ा प्रेरित हाथ जोड़कर कह रहा है, एक दूसरे से प्रेम रखो। हम नई बातें ढूँढ़ते रहते हैं, जबकि पहली बात अब तक अधूरी पड़ी है।
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें एक दूसरे को दिया है। जैसे यूहन्ना ने काग़ज़ और स्याही से बढ़कर सम्मुख बातचीत को चाहा, वैसे ही आपने हमारे लिए आमने सामने की संगति रखी, जहाँ हमारा आनन्द पूरा होता है। हर उस मुलाकात के लिए धन्यवाद जिसमें आपकी उपस्थिति महसूस हुई।
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