2 शमूएल 16
पाठ
दाऊद यरूशलेम छोड़कर भाग रहा है, और रास्ते में तीन मुलाकातें होती हैं। पहले सीबा गदहों पर रोटी, किशमिश और दाखमधु लादे आता है और अपने स्वामी मपीबोशेत पर राजद्रोह का आरोप लगाता है; दाऊद बिना जाँच किए मपीबोशेत की सारी सम्पत्ति उसे सौंप देता है। फिर बहूरीम में शाऊल का कुटुम्बी शिमी पत्थर और श्राप बरसाता है, और दाऊद अबीशै को रोक देता है। और यरूशलेम में अबशालोम, अहीतोपेल की सलाह पर, सबके देखते अपने पिता की रखैलियों के पास जाता है।
मर्म
यह अध्याय परमेश्वर के न्याय को नंगी आँखों से दिखाता है, पर बिना किसी उपदेश के। कहीं आकाशवाणी नहीं होती, कोई भविष्यद्वक्ता नहीं आता। जो होता है वह मनुष्यों की चालबाज़ी, लालच और बदले की भावना से होता है, और फिर भी दाऊद उसमें यहोवा का हाथ पहचानता है: "वह जो कोसता है, और यहोवा ने जो उससे कहा है, कि दाऊद को श्राप दे, तो उससे कौन पूछ सकता है?" यह भाग्यवाद नहीं, यह पश्चाताप है। जो राजा कभी उरिय्याह की मृत्यु का प्रबन्ध कर सकता था, वह अब अपनी रक्षा के लिए तलवार उठाने से इनकार करता है। परमेश्वर का अनुशासन क्षमा को रद्द नहीं करता; वह क्षमा को गहराई देता है।
सूत्र
दाऊद यहाँ राजा के रूप में नहीं, बल्कि खदेड़े गए अभिषिक्त के रूप में चलता है: जैतून के पहाड़ की चढ़ाई पार करके, थका हुआ, अपमानित, अपने ही घर के विश्वासघात से घायल। यह वही रास्ता है जिस पर एक हज़ार साल बाद दाऊद का पुत्र चलेगा, उसी पहाड़ पर, उसी शहर से बाहर, अपने ही मित्र के विश्वासघात के बाद। पर एक अन्तर है जिसे मिटाना नहीं चाहिए: दाऊद अपने ही पाप का फल भोग रहा है, यीशु मसीह हमारे पाप का। दाऊद कहता है "कदाचित् यहोवा… मुझे भला बदला दे"; मसीह जानते थे कि पिता क्या देंगे। फिर भी दोनों में एक ही चाल दिखती है: राज्य तलवार से नहीं, समर्पण से लौटता है।
दर्पण
गौर कीजिए कि दाऊद कहाँ मज़बूत है और कहाँ कमज़ोर। शिमी के पत्थरों के सामने वह ठोस है, पर सीबा की मीठी बातों और लदे हुए गदहों के सामने वह टूट जाता है। दो सौ रोटियाँ और एक कुप्पी दाखमधु, और वह एक अनुपस्थित आदमी को बिना सुने दोषी ठहरा देता है। हमारे साथ भी अक्सर यही होता है। खुली शत्रुता हमें सतर्क करती है, पर वह सहकर्मी जो ठीक समय पर मदद लेकर आता है और साथ में किसी तीसरे के बारे में एक छोटी-सी बात कह जाता है, उसे हम बिना छाने निगल लेते हैं। थकान में हमारा विवेक सबसे पहले मरता है। और जब कोई हमें बहूरीम में कोसता है, तो हमारे भीतर भी एक अबीशै खड़ा होता है जो तुरन्त सिर काटना चाहता है।
पृष्ठभूमि
पहले श्रोताओं के लिए "शाऊल का कुटुम्बी" और "बिन्यामीनी" कोई मामूली विवरण नहीं थे। यह गृहयुद्ध की पुरानी दरार थी, जो दाऊद के चालीस वर्षों के राज में कभी पूरी तरह भरी नहीं। शिमी की आवाज़ उस पूरे कबीले की आवाज़ है जो मानता था कि दाऊद ने सिंहासन खून से पाया। और छत पर लगा तम्बू? प्राचीन पूर्व में पूर्ववर्ती राजा की रखैलियों को लेना केवल अश्लीलता नहीं, बल्कि सिंहासन पर कानूनी दावा था, जिसे वापस नहीं लिया जा सकता था। सब इस्राएल के देखते यह करना अबशालोम का ऐलान था कि पीछे लौटने का कोई रास्ता नहीं। पुराने श्रोता काँप गए होंगे, क्योंकि वे जानते थे यह किस भविष्यवाणी की पूर्ति है।
अन्तर्पाठ
नातान ने दाऊद से कहा था कि उसी के घर से विपत्ति उठेगी, कि उसकी पत्नियाँ उसके पड़ोसी को दी जाएँगी, और जो उसने छिपकर किया वह सूर्य के सामने किया जाएगा। अध्याय सोलह की छत उसी वचन की पूर्ति है, और यह वही छत है जहाँ से दाऊद ने बतशेबा को देखा था। कहानी अपने ही अपराध के स्थान पर लौट आती है। और अहीतोपेल? वह बतशेबा का दादा था। जो सलाह "मानो कोई परमेश्वर का वचन पूछ लेता हो" जैसी थी, वह शायद एक बूढ़े आदमी का ठण्डा बदला भी थी। परमेश्वर टेढ़े इरादों से भी अपना न्याय पूरा करते हैं, बिना उन इरादों को शुद्ध कहे। दूसरी ओर एक असहज तनाव भी है: यहाँ दाऊद शिमी को जीने देता है, पर मरते समय वह सुलैमान को शिमी का हिसाब चुकाने का आदेश देता है। बहूरीम का संयम स्थायी क्षमा नहीं था। यही अन्तर मसीह को अलग करता है, जो गाली सुनकर बदले में गाली नहीं देते थे, और जिनका "क्षमा कर" अन्तिम शब्द था, वसीयत नहीं।
विवरण
"कदाचित्" शब्द पर रुकिए। दाऊद यह नहीं कहता कि परमेश्वर ज़रूर मुझे लौटा लाएँगे। वह कहता है: कदाचित् यहोवा दृष्टि करके भला बदला दें। यह वह विश्वास है जिसके पास कोई गारंटी नहीं बची, केवल परमेश्वर का चरित्र बचा है। सन्दूक भी वह वापस भेज चुका है, सिंहासन गया, बेटा शत्रु बन गया। जो बचा है वह एक "शायद" है, और उसी शायद पर वह अपना पूरा भार डाल देता है। बहुत से विश्वासी सोचते हैं कि सच्चा भरोसा निश्चितता जैसा दिखता है। दाऊद दिखाता है कि कभी-कभी वह थके हुए आदमी के मुँह से निकले एक कदाचित् जैसा दिखता है, जो फिर भी चलता रहता है।
चिन्तन
आपके जीवन में सीबा कौन है: वह आवाज़ जो सही समय पर मदद लेकर आती है और जिसकी बात आप बिना जाँचे मान लेते हैं?
क्या आप ऐसे परमेश्वर पर भरोसा कर सकते हैं जिनका उत्तर आज केवल "कदाचित्" है, या आपका विश्वास केवल निश्चितता पर टिका है?
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2 Samuel 16 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
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2 शमूएल 16 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Samuel 16 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
दाऊद भागते हुए थका था, भूखा था, और सीबा रोटी और गदहे लेकर आया। ऐसे पल में एक बात कान में डाल दी गई: "वह तो यरूशलेम में रह गया।" मपीबोशेत वहाँ था ही नहीं अपनी सफाई देने को। लँगड़ा आदमी, जिस पर दाऊद ने दया की थी, उसकी अनुपस्थिति में बदनाम हो गया।
जिसके बारे में तुझसे कुछ कहा जा रहा है, क्या वह जवाब देने के लिए वहाँ मौजूद है? थकान में सुनी गई बात अक्सर सबसे गहरा घाव करती है।
भागते हुए दाऊद के लिए आपने रास्ते में ही रोटी, किशमिश, अंजीर और दाखमधु भेज दिया, वह भी गदहों पर लदवाकर। धन्यवाद, पिता, कि जब हम थके और टूटे होते हैं, आप हमारी भूख को भूल नहीं जाते। आप जंगल जैसे रास्तों पर भी हमारी मेज़ सजा देते हैं।
हूशै अबशालोम से कहता है, "फिर मैं किस की सेवा करूँ? क्या उसके पुत्र के सामने नहीं?" शब्द वफादारी के हैं, पर दिल दाऊद के पास ही है। और अबशालोम मान लेता है, क्योंकि जो सुनना चाहता था वही सुनाई दिया। यही ख़तरा है: चापलूसी हमें अंधा कर देती है। तेरे आसपास जो तुझे सबसे अच्छा लगता है बोलने वाला है, क्या वह सच भी बोलता है?
अबीशै का सवाल कितना अपना सा लगता है, "यह मरा हुआ कुत्ता मेरे प्रभु राजा को क्यों शाप देने पाए?" हमारे भीतर भी कोई है जो हर आलोचक का मुँह बंद करना चाहता है। पर दाऊद चुप रहा, भागते हुए, अपमान सहते हुए। कभी कभी परमेश्वर उस आवाज़ को भी काम में लेता है जिसे हम काट देना चाहते हैं। आज तेरे कानों में जो कड़वी बात पड़ी, क्या तू उसे सुनने का साहस रखेगा?
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