बाइबल व्याख्या

2 थिस्सलुनीकियों 3:10

बाइबल
यह वचन GCF MISSION INDIA FOUNDATION द्वारा समर्पित है

यह पाठ

पौलुस कोई नई बात नहीं कह रहे। वे पुरानी बात दोहरा रहे हैं, और दोहराने में एक हल्की-सी झुँझलाहट सुनाई देती है: "जब हम तुम्हारे यहाँ थे, तब भी यह आज्ञा तुम्हें देते थे।" यानी यह विषय पहले भी उठ चुका था, आमने-सामने, गली में, कार्यशाला में, और अब चिट्ठी में फिर उठाना पड़ रहा है। आज्ञा सीधी है और उसमें कोई गद्देदार नरमी नहीं: "यदि कोई काम करना न चाहे, तो खाने भी न पाए।" इसके ठीक पहले पौलुस ने अपनी मिसाल रखी है, रात-दिन परिश्रम, किसी की रोटी मुफ़्त में न खाना; और ठीक बाद में वे बताते हैं कि कुछ लोग कुछ करते नहीं, पर "औरों के काम में हाथ डाला करते हैं।"

मूल मर्म

ध्यान दीजिए, पौलुस ने यह नहीं लिखा कि जो काम न कर सके, वह न खाए। उन्होंने लिखा, जो काम करना न चाहे। यह छोटा-सा फ़र्क़ पूरी आयत का भार उठाता है। बीमार, बूढ़े, विधवा, अपंग, वे इस वाक्य के निशाने पर नहीं हैं; कलीसिया तो शुरू से ही उनकी मेज़ सजाती आई थी। निशाने पर वह है जो जानबूझकर दूसरों के परिश्रम पर जी रहा है और उसे आत्मिकता का नाम दे रहा है। परमेश्वर का अनुग्रह मुफ़्त है, पर वह हमें परजीवी नहीं बनाता; वह हमें देने वाला बनाता है। रोटी यहाँ सिर्फ़ भोजन नहीं, वह संगति का प्रतीक है। जो भाईचारे की थाली में से लेता रहे पर उसमें डाले कुछ नहीं, वह प्रेम को धीरे-धीरे खोखला कर देता है।

बड़ी कहानी का सूत्र

काम कोई सज़ा नहीं है जो अदन के बाहर निकलने पर मनुष्य के गले पड़ी हो। आदमी को बाग़ में रखा ही इसलिए गया था कि वह उसमें काम करे और उसकी रखवाली करे; पतन ने काम को जन्म नहीं दिया, उसे काँटों और पसीने से भर दिया। इसलिए जब पौलुस परिश्रम की बात करते हैं, वे किसी सांसारिक नैतिकता की तरफ़ नहीं लौट रहे, वे सृष्टि के मूल ढाँचे की ओर लौट रहे हैं। और मसीह स्वयं? वे न आए थे कि सेवा लें, बल्कि सेवा करें। इसी अध्याय में पौलुस प्रार्थना करते हैं कि प्रभु हमारे मन की अगुआई "परमेश्वर के प्रेम और मसीह के धीरज की ओर" करे। धीरज, यानी थके बिना टिके रहना। आख़िरी दिन की प्रतीक्षा हाथ पर हाथ धरे नहीं, औज़ार हाथ में लिए की जाती है।

दर्पण

यह आयत उस पर चुभती है जो अपनी निकम्मेपन को आत्मिक भाषा पहना देता है। "मैं परमेश्वर की आवाज़ का इंतज़ार कर रहा हूँ" कहकर महीनों नौकरी न खोजना; घर में पत्नी या माँ की थकान को सामान्य मान लेना क्योंकि आपका काम "सेवकाई" है; उधार लेकर कभी न लौटाना और इसे भाईचारे का हक़ समझना। पौलुस की दूसरी चोट और भी तीखी है: जो अपना काम नहीं करते, वे "औरों के काम में हाथ डाला करते हैं।" खाली आदमी बेचैन होता है, और बेचैनी अक्सर दूसरों की ज़िंदगी पर टिप्पणी में बदल जाती है। आज, अभी: उस एक व्यक्ति को, जिसकी मेहनत पर आप चुपचाप टिके हुए हैं, एक संदेश भेजिए जिसमें केवल धन्यवाद हो और एक ठोस काम हो जो आप इस सप्ताह उसके हाथ से ले लेंगे।

कठिन सवाल

इस वाक्य का दुरुपयोग इतिहास में भयानक रहा है। इसे ग़रीबों के मुँह से रोटी छीनने के लिए उद्धृत किया गया, बेरोज़गारों को आलसी ठहराने के लिए, और राज्य-व्यवस्थाओं ने इसे अपने नारों में गढ़ लिया। क्या पौलुस इसके लिए ज़िम्मेदार हैं? नहीं, पर उन्होंने वाक्य नरम भी नहीं किया। यह आज्ञा कलीसिया के भीतर, भाइयों के बीच, जानी-पहचानी स्थिति में दी गई है, जहाँ सब जानते थे कि कौन सचमुच बीमार है और कौन बहाना बना रहा है। उसे अनजान ग़रीब पर क़ानून की तरह चलाना उसका गला घोंटना है। फिर भी ईमानदारी से मानिए: पौलुस करुणा की सीमा खींच रहे हैं, और यह सीमा असहज करती है। प्रेम हमेशा और अनिश्चित काल तक चुप नहीं रहता।

संदर्भ

थिस्सलुनीके रोमी मकिदुनिया की राजधानी थी, एक बंदरगाह शहर जहाँ से विया एग्नेशिया नाम की बड़ी सड़क गुज़रती थी। मछली, नमक, तारकोल और भीड़ की गंध; गोदी पर माल ढोते मज़दूर, बाज़ार में संरक्षक-आश्रित का जाल, जहाँ ग़रीब आदमी किसी धनी के दरवाज़े पर सुबह हाज़िरी लगाता और बदले में भोजन, थोड़े सिक्के और सुरक्षा पाता। मुफ़्त रोटी पाना वहाँ शर्म की बात नहीं, व्यवस्था का हिस्सा थी। पौलुस लगभग सन् 50 के आसपास वहाँ आए, कुछ ही हफ़्ते रुके, और विरोध के कारण रात में निकाले गए। यह दूसरी चिट्ठी उस छोटी, डरी हुई, पर जीवंत मंडली को लिखी गई है, जिसमें कुछ लोग यह मान बैठे थे कि प्रभु का दिन आ चुका है।

पहले सुनने वाले

उन लोगों ने यह आयत सुनी होगी और उनके सामने पौलुस के हाथ तैर गए होंगे: चमड़ा सीते, तंबू का कपड़ा काटते, सुई से छिदे, खुरदरे हाथ। यूनानी शहर में हाथ का काम नीच माना जाता था; भाषण देने वाला गुरु काम नहीं करता था, वह संरक्षक से पलता था। पौलुस ने वह अधिकार जानबूझकर छोड़ा, "यह नहीं, कि हमें अधिकार नहीं," ताकि उनकी मिसाल बोले। और जब उन्होंने कहा कि ऐसे भाई से "अलग रहो," तो उस छोटे समुदाय में, जहाँ सब एक ही मेज़ पर खाते थे, इसका अर्थ सबको तुरंत समझ आ गया होगा। पर साथ ही यह भी: "उसे बैरी मत समझो।" अनुशासन निकाल फेंकना नहीं, वापस बुलाना था।

चिंतन के प्रश्न

मेरे जीवन में कौन-सी निष्क्रियता है जिसे मैंने आत्मिक भाषा पहनाकर उचित ठहरा रखा है?

जिस मंडली या परिवार की मेज़ पर मैं खाता हूँ, उसमें मैं ठोस रूप से क्या डाल रहा हूँ?

2 Thessalonians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Thessalonians

John Stott

Hope, holiness and the return of Christ for a young church.

1 and 2 Thessalonians: An Introduction and Commentary

Leon Morris

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

1 and 2 Thessalonians

Michael Holmes

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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2 Thessalonians 3:10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

2 थिस्सलुनीकियों 3:10 का क्या अर्थ है?
पौलुस कोई नई बात नहीं कह रहे। वे पुरानी बात दोहरा रहे हैं, और दोहराने में एक हल्की-सी झुँझलाहट सुनाई देती है: "जब हम तुम्हारे यहाँ थे, तब भी यह आज्ञा तुम्हें देते थे।" यानी यह विषय पहले भी उठ चुका था, आमने-सामने, गली में, कार्यशाला में, और अब चिट्ठी में फिर उठाना पड़ रहा है। आज्ञा सीधी है और उसमें कोई गद्देदार नरमी नहीं: "यदि कोई काम करना न चाहे, तो खाने भी न पाए।" इसके ठीक पहले पौलुस ने अपनी मिसाल रखी है, रात-दिन परिश्रम, किसी की रोटी मुफ़्त में न खाना; और ठीक बाद में वे बताते हैं कि कुछ लोग कुछ करते नहीं, पर "औरों के काम में हाथ डाला करते हैं।"
2 थिस्सलुनीकियों 3:10 किस विषय में है?
काम कोई सज़ा नहीं है जो अदन के बाहर निकलने पर मनुष्य के गले पड़ी हो। आदमी को बाग़ में रखा ही इसलिए गया था कि वह उसमें काम करे और उसकी रखवाली करे; पतन ने काम को जन्म नहीं दिया, उसे काँटों और पसीने से भर दिया। इसलिए जब पौलुस परिश्रम की बात करते हैं, वे किसी सांसारिक नैतिकता की तरफ़ नहीं लौट रहे, वे सृष्टि के मूल ढाँचे की ओर लौट रहे हैं। और मसीह स्वयं?
2 थिस्सलुनीकियों 3:10 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इस वाक्य का दुरुपयोग इतिहास में भयानक रहा है। इसे ग़रीबों के मुँह से रोटी छीनने के लिए उद्धृत किया गया, बेरोज़गारों को आलसी ठहराने के लिए, और राज्य-व्यवस्थाओं ने इसे अपने नारों में गढ़ लिया। क्या पौलुस इसके लिए ज़िम्मेदार हैं? नहीं, पर उन्होंने वाक्य नरम भी नहीं किया। यह आज्ञा कलीसिया के भीतर, भाइयों के बीच, जानी-पहचानी स्थिति में दी गई है, जहाँ सब जानते थे कि कौन सचमुच बीमार है और कौन बहाना बना रहा है। उसे अनजान ग़रीब पर क़ानून की तरह चलाना उसका गला घोंटना है। फिर भी ईमानदारी से मानिए: पौलुस करुणा की सीमा खींच रहे हैं, और यह सीमा असहज करती है। प्रेम हमेशा और अनिश्चित काल तक चुप नहीं रहता।
2 थिस्सलुनीकियों 3:10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
उन लोगों ने यह आयत सुनी होगी और उनके सामने पौलुस के हाथ तैर गए होंगे: चमड़ा सीते, तंबू का कपड़ा काटते, सुई से छिदे, खुरदरे हाथ। यूनानी शहर में हाथ का काम नीच माना जाता था; भाषण देने वाला गुरु काम नहीं करता था, वह संरक्षक से पलता था। पौलुस ने वह अधिकार जानबूझकर छोड़ा, "यह नहीं, कि हमें अधिकार नहीं," ताकि उनकी मिसाल बोले। और जब उन्होंने कहा कि ऐसे भाई से "अलग रहो," तो उस छोटे समुदाय में, जहाँ सब एक ही मेज़ पर खाते थे, इसका अर्थ सबको तुरंत समझ आ गया होगा। पर साथ ही यह भी: "उसे बैरी मत समझो।" अनुशासन निकाल फेंकना नहीं, वापस बुलाना था।
2 थिस्सलुनीकियों 3:10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
जिस मंडली या परिवार की मेज़ पर मैं खाता हूँ, उसमें मैं ठोस रूप से क्या डाल रहा हूँ?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

2 Thessalonians 3 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 2

पिता, ऐसे लोगों के बीच चलना आसान नहीं जो भलाई को ठुकरा देते हैं। मुझे उनके वार से बचाए रख, और मेरे मन को कड़वा होने से भी। जहाँ विश्वास नहीं, वहाँ मैं घृणा नहीं, तेरी शांति लेकर जाऊँ। तू ही मेरी ढाल है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 9

पिता, मुझे ऐसा जीवन जीने में मदद कर जो दूसरों के लिए सही उदाहरण बने। कई बार मैं अपने हक की बात करने लगता हूँ, जबकि तू चाहता है कि मैं सेवा करूँ। मेरे काम, मेरी मेहनत और मेरे शब्दों से तेरा प्रेम दिखे, ताकि लोग मुझे नहीं, तुझे देखें।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 11

पिता, मुझे बेकार की बातों और दूसरों के मामलों में उलझने से बचा। मेरे हाथों को अपना काम दे, और मेरे मन को शांति, ताकि मैं चुपचाप मेहनत करूँ और जहाँ तू ने मुझे रखा है, वहीं वफादार रहूँ।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 3

प्रभु, मेरा मन डगमगाता है, पर तू अपने वचन पर कायम रहता है। जब बुराई चारों ओर से खींचती है, तू मुझे थामे रख। मुझे भीतर से मजबूत कर, ताकि डर नहीं, बल्कि तेरा भरोसा मेरे दिन को चलाए। मैं तेरी छाया में सुरक्षित हूँ।

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