2 तीमुथियुस 3:16
पाठ
पौलुस तीमुथियुस से कहता है कि जो पवित्रशास्त्र उसने बालकपन से जाना है, वह कोई मामूली धार्मिक साहित्य नहीं: "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है।" पूरा, चुना हुआ हिस्सा नहीं; वंशावलियाँ भी, कठोर भविष्यद्वाणियाँ भी, वे पन्ने भी जिन्हें हम चुपचाप पलट जाते हैं। और यह प्रेरित वचन बेकार नहीं पड़ा रहता, यह "लाभदायक" है, चार कामों के लिए: उपदेश देने, समझाने, सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा देने के लिए। अगले वाक्य में इसका मकसद खुलता है, ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए। यानी शास्त्र की मंज़िल जानकारी नहीं, बल्कि एक ऐसा इंसान है जो तैयार खड़ा हो।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि यह वाक्य किस माहौल में बोला गया है। ऊपर के पद ऐसे लोगों का वर्णन करते हैं जो "भक्ति का भेष तो धरेंगे, पर उसकी शक्ति को न मानेंगे" और जो "सदा सीखती तो रहती हैं पर सत्य की पहचान तक कभी नहीं पहुँचतीं।" इसी दलदल के बीच पौलुस एक ठोस ज़मीन दिखाता है। शास्त्र इसलिए भरोसेमंद नहीं कि वह प्राचीन है या कि कलीसिया ने उसे मान लिया, बल्कि इसलिए कि उसकी साँस परमेश्वर से आई है। यहाँ जो शब्द है वह शाब्दिक रूप से "परमेश्वर-श्वासित" है, जैसे उत्पत्ति में मिट्टी के पुतले में साँस फूँकी गई थी। और यह साँस हमें सिर्फ़ सूचित नहीं करती, वह हमें गढ़ती है: सिखाती, टोकती, सीधा करती, और धार्मिकता में प्रशिक्षित करती है। शास्त्र आपके हाथ में एक किताब है, पर परमेश्वर के हाथ में एक औज़ार है, और वह औज़ार आप पर चलता है।
सूत्र
पद 15 इस वाक्य को उसकी दिशा देता है: पवित्रशास्त्र तीमुथियुस को "मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान" बना सकता है। जिस शास्त्र को उसने अपनी दादी और माँ की गोद में सीखा था, वह पुराना नियम था, और पौलुस बिना झिझक कहता है कि वही शास्त्र मसीह तक ले जाता है। यही पूरी बाइबल का सूत्र है: परमेश्वर बोलने वाले परमेश्वर हैं। वे सृष्टि में बोलते हैं, भविष्यद्वक्ताओं में बोलते हैं, और अन्त में एक देह में बोलते हैं। शास्त्र इसलिए जीवनदायी है क्योंकि उसमें वही साँस है जो देहधारी वचन में पूरी हुई। इसलिए बाइबल पढ़ना कभी सिर्फ़ किताब पढ़ना नहीं, वह एक व्यक्ति से मिलना है।
आईना
ईमानदारी से पूछिए: आप बाइबल किस उम्मीद से खोलते हैं? हममें से ज़्यादातर लोग पुष्टि खोजते हैं, सुधार नहीं। हम वे पद रेखांकित करते हैं जो हमें दिलासा देते हैं, और उन पन्नों पर तेज़ी से चलते हैं जो हमारे पैसे, हमारी ज़बान, हमारे गुस्से या हमारे बिस्तर पर उँगली रखते हैं। और हममें से कुछ वही बन जाते हैं जिनका ज़िक्र पद 7 में है, जो "सदा सीखती तो रहती हैं पर सत्य की पहचान तक कभी नहीं पहुँचतीं": अध्ययन समूह, नोट्स, उपदेशों की रिकॉर्डिंग, और घर में वही पुराना ठंडा रिश्ता। डर यही है कि अगर मैंने वचन को सचमुच सुधारने दिया, तो कुछ छोड़ना पड़ेगा। हाँ, पड़ेगा।
आज यह कीजिए: वह अध्याय दोबारा खोलिए जो आपने पिछली बार पढ़ा था, और उसमें से एक वाक्य ढूँढ़िए जो आपको सांत्वना नहीं, टोक देता है। उसे कागज़ पर लिखिए और ऊँची आवाज़ में परमेश्वर से कहिए: "यह मुझ पर लागू होता है।"
मुख्य पात्र
इस पद का असली पात्र लेखक नहीं, साँस लेने वाले परमेश्वर हैं। ध्यान दीजिए वे कितना जोखिम उठाते हैं: वे अपने आप को शब्दों से बाँध देते हैं, मानवीय लेखकों से, स्याही और चमड़े से, अनुवादों से, और उन हाथों से जो उन शब्दों को तोड़-मरोड़ भी सकते हैं, जैसे पद 8 के यन्नेस और यम्ब्रेस ने सत्य का विरोध किया। परमेश्वर चुप रह सकते थे और सुरक्षित रहते। पर वे बोले, क्योंकि वे संबंध चाहते हैं, दूरी नहीं। और उनका लक्ष्य बहस जीतना नहीं है; पद 17 कहता है, लक्ष्य एक तैयार इंसान है। यह उस पिता की तस्वीर है जो बच्चे के पीछे-पीछे चलता है, टोकता है, सीधा करता है, जब तक वह अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए।
कठिन सवाल
"सम्पूर्ण" शब्द चुभता है। क्या वे अध्याय भी लाभदायक हैं जिनमें नगर नष्ट किए जाते हैं, या वे भजन जिनमें शत्रुओं पर श्राप माँगा जाता है, या वे लंबी वंशावलियाँ? पौलुस कोई छूट नहीं देता। और दूसरी तरफ़ एक और असहज सच्चाई है: पद 6 के वे लोग भी शास्त्र जानते थे, और फिर भी घरों में दबे पाँव घुसते थे। रोज़ बाइबल पढ़ने वाला हर व्यक्ति कोमल नहीं होता; कुछ कठोर हो जाते हैं। इसका मतलब यह है कि "लाभदायक" जादू नहीं है। औज़ार तब काम करता है जब आप उसके नीचे लेटने को तैयार हों। कुछ पन्ने वर्षों तक अपना लाभ नहीं खोलते, और उस अंधेरे को स्वीकार करना भी विश्वास का हिस्सा है।
एक बारीकी
चार कामों की सूची में तीसरा शब्द है "सुधारने"। मूल में यह किसी टेढ़ी चीज़ को वापस सीधा खड़ा करने का चित्र है, जैसे टूटी हड्डी को दोबारा जगह पर बैठाना। यह मरम्मत का शब्द है, और मरम्मत में दर्द होता है। पहले "उपदेश" आता है, फिर "समझाने", यानी टोकना, फिर यह सीधा करना, और तब जाकर "धार्मिकता की शिक्षा", जो धीमा, रोज़ का अभ्यास है। यह क्रम बताता है कि परमेश्वर पहले हमें बताते हैं, फिर हमारा सामना करते हैं, फिर हमें ठीक करते हैं, और तब चलना सिखाते हैं। जो लोग सिर्फ़ पहले और आख़िरी हिस्से को चाहते हैं, वे बीच का दर्द छोड़कर कभी सीधे खड़े नहीं होते।
चिंतन के प्रश्न
पिछली बार कब आपने बाइबल पढ़ते हुए कुछ ऐसा पाया जिसने आपको सचमुच बदलने पर मजबूर किया, और आपने उसका क्या किया?
आपकी बाइबल का कौन-सा हिस्सा है जिसे आप जानबूझकर टालते हैं, और उस टालने के पीछे कौन-सा डर छिपा है?
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2 Timothy 3:16 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
2 तीमुथियुस 3:16 का क्या अर्थ है?
2 तीमुथियुस 3:16 किस विषय में है?
2 तीमुथियुस 3:16 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
2 तीमुथियुस 3:16 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
2 तीमुथियुस 3:16 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
2 Timothy 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, कभी लगता है कि झूठ बहुत दूर तक चला जाता है और सच चुप रह जाता है। पर तू जानता है कि हर छल की एक सीमा है। मुझे धीरज दे कि मैं घबराऊँ नहीं, और सच्चाई में टिका रहूँ, जब तक तेरी रोशनी सब कुछ साफ न कर दे।
पिता, जब मुश्किलें चारों ओर से घेर लेती हैं, मुझे याद दिला कि तूने पहले भी मुझे सँभाला है। जो दुख मैंने सहे, उनमें तू चुप नहीं बैठा रहा, बल्कि हर बार मुझे बाहर निकाल लाया। आज भी उसी भरोसे के साथ तेरे पीछे चलने की हिम्मत दे।
पौलुस कहता है, "पर तूने उपदेश, चाल चलन, मनसा, विश्वास, सहनशीलता, प्रेम और धीरज में मेरा अनुसरण किया है।" देख, सूची में चमत्कार नहीं हैं। उपदेश के ठीक बाद चाल चलन आता है, क्योंकि तीमुथियुस ने पौलुस को सिर्फ मंच पर नहीं, रास्ते की धूल में भी देखा था। तुझे कोई रोज़ देख रहा है। वह क्या सीख रहा है?
पिता, धन्यवाद कि आपकी भक्ति केवल बाहरी वेश नहीं, बल्कि जीवन बदल देने वाली सामर्थ्य है। धन्यवाद कि आपने हमें चेतावनी दी कि ऐसों से दूर रहें जो शक्ति को नहीं मानते, और आपने हमारे भीतर वह सच्चा सामर्थ्य डाला जो हमें भीतर से पवित्र करता है।
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