बाइबल व्याख्या

प्रेरितों के काम 21

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

पौलुस का जहाज़ कोस, रुदुस, पतरा होते हुए सोर पहुँचता है, और हर पड़ाव पर विश्वासी उससे एक ही बात कहते हैं: यरूशलेम मत जाओ। कैसरिया में भविष्यद्वक्ता अगबुस उसका कमरबन्द लेकर अपने ही हाथ-पाँव बाँधता है और कहता है कि यरूशलेम में पौलुस के साथ यही होगा। पौलुस फिर भी जाता है, याकूब और प्राचीनों की सलाह पर मन्दिर में शुद्धिकरण की रीति निभाता है, और वहीं आसिया के यहूदी भीड़ भड़का देते हैं; रोमी सैन्य-दल का सरदार उसे मरने से बचाकर दो जंजीरों में बाँध लेता है। सीढ़ी पर खड़े होकर पौलुस हाथ से संकेत करता है और इब्रानी भाषा में बोलने लगता है।

मर्म

इस अध्याय का सबसे खतरनाक वाक्य भीड़ के मुँह से नहीं, मित्रों के मुँह से निकलता है: "यरूशलेम को न जाए।" प्रेम भी बाधा बन सकता है। और इसीलिए यहाँ परमेश्वर की इच्छा का स्वरूप साफ़ दिखता है: वे अपने सेवक को सुरक्षा का रास्ता नहीं, स्पष्टता का रास्ता देते हैं। आत्मा जंजीरों के बारे में पहले से बता देते हैं, पर उन्हें टालते नहीं। यह वह परमेश्वर नहीं जो दुःख से बचाकर हमें बहकाते हैं, बल्कि वे जो दुःख के भीतर से चलकर जाने का बुलावा देते हैं और रास्ते का नक्शा खोलकर हाथ में रख देते हैं। आज्ञाकारिता का अर्थ यहाँ अनहोनी का अंधेरा नहीं, आँखें खुली रखकर चलना है।

जोड़ने वाला सूत्र

लूका यह कहानी उसी ढाँचे में लिखते हैं जिसमें उन्होंने अपना सुसमाचार लिखा था। वहाँ यीशु "यरूशलेम जाने को अपना मुँह ठान" लेते हैं, यहाँ पौलुस वहीं जाता है जहाँ हर संकेत खतरा कहता है। वहाँ गतसमनी में प्रार्थना होती है, "मेरी नहीं, परन्तु आपकी इच्छा पूरी हो"; यहाँ रोते हुए मित्र अंततः चुप होकर कहते हैं, "प्रभु की इच्छा पूरी हो।" फिर यहूदियों की भीड़, फिर रोमी अधिकारी, फिर बंधन। यह नकल नहीं है, यह अनुसरण है। मसीह की देह अपने सिर के पीछे-पीछे उसी गली से गुज़रती है। और ध्यान दीजिए, पौलुस की यात्रा बचाव में नहीं, गवाही में फलती है: जंजीरों के कारण ही वह सीढ़ी पर खड़ा होकर पूरे यरूशलेम से बोल पाता है।

दर्पण

हम में से अधिकतर लोग पौलुस नहीं, सोर के वे विश्वासी हैं जो किनारे पर घुटने टेके हुए हैं। हम प्रार्थना करते हैं, पर भीतर यह उम्मीद लिए कि परमेश्वर जोखिम हटा दें। बेटे का वह निर्णय जो हमें मूर्खता लगता है; पत्नी की वह बीमारी जिसकी रिपोर्ट अगले हफ़्ते आनी है; नौकरी छोड़कर सेवा में जाने की वह बात जो हम हँसी में टाल देते हैं। हमारा प्रेम सच्चा होता है, पर कई बार वह परमेश्वर की इच्छा के आगे दीवार बनकर खड़ा हो जाता है। और जब हम "आत्मा के सिखाए" जैसी भाषा में अपना डर लपेट देते हैं, तब वह और भी मज़बूत दीवार बन जाती है।

आज यह कीजिए: जिस एक चीज़ पर आपका कोई वश नहीं, उसका नाम लेकर, घुटने टेककर, ज़ोर से कहिए, "प्रभु, इस बारे में आपकी इच्छा पूरी हो।" ज़ोर से, ताकि आपके अपने कान सुन लें।

एक बारीकी

अगबुस बोलने से पहले कुछ करता है: वह पौलुस का कमरबन्द खींचकर लेता है और अपने ही हाथ-पाँव बाँध लेता है। कमरबन्द कोई सजावट नहीं था; वही कपड़े को समेटता था, उसी में पैसे रखे जाते थे, उसी को कसकर आदमी काम के लिए तैयार होता था। जिस चीज़ से पौलुस चलने के लिए तैयार होता था, उसी से बंधन का चित्र बनाया जाता है। यह पुराने नबियों की शैली है, यशायाह का नंगे पाँव चलना, यिर्मयाह का जुआ पहनना: संदेश देखा जाता है, सिर्फ़ सुना नहीं जाता। और इस दृश्य की सबसे मार्मिक बात यह है कि अगबुस पौलुस को रोकता नहीं; वह केवल दिखाता है कि कीमत क्या होगी। चुनाव पौलुस के हाथ में छोड़ दिया जाता है।

कठिन प्रश्न

पद 4 कहता है कि चेलों ने "आत्मा के सिखाए" पौलुस से कहा कि यरूशलेम में पाँव न रखना। तो क्या पौलुस ने पवित्र आत्मा की अवज्ञा की? यह प्रश्न टालने लायक नहीं है। सबसे ईमानदार पढ़ाई यह लगती है कि आत्मा ने जो प्रकट किया वह आनेवाला कष्ट था, और प्रेम में डूबे विश्वासियों ने उसमें अपना निष्कर्ष जोड़ दिया: मत जाओ। प्रकाशन सच्चा था, उससे निकाला गया आदेश मानवीय। पर यह भी मान लेना चाहिए कि लूका हमें पूरी सफ़ाई नहीं देते। वे तनाव को खड़ा छोड़ देते हैं, और यही शायद उद्देश्य है: आत्मा की अगुवाई हमेशा साफ़-साफ़ तीर की तरह नहीं आती। कभी-कभी दो सच्चे हृदय विपरीत दिशाएँ सुनते हैं, और तब "प्रभु की इच्छा पूरी हो" इस्तीफ़ा नहीं, विश्वास की सबसे परिपक्व भाषा है।

पहले सुननेवाले

लूका के पहले पाठक जानते थे कि यरूशलेम का मन्दिर अब खंडहर है और कलीसिया पर रोमी शक की नज़र है। उनके लिए यह अध्याय दो सवालों का जवाब था। पहला: क्या मसीही लोग राजद्रोही हैं? देखिए, सरदार पौलुस को मिस्री बलवाई समझता है और गलत निकलता है; रोम की तलवार यहाँ पौलुस को बचाती है। दूसरा: क्या पौलुस ने मूसा की व्यवस्था को ठुकराया? नहीं, वह अपने खर्चे पर चार लोगों की मन्नत पूरी कराने मन्दिर जाता है। यहूदी विश्वासियों के लिए यह राहत थी, और अन्यजाति विश्वासियों के लिए पाठ: सुसमाचार की स्वतंत्रता भाइयों की कमज़ोरी के लिए झुकना जानती है, भले उसका इनाम जंजीरें ही क्यों न हों।

चिंतन के प्रश्न

किस व्यक्ति या परिस्थिति के लिए आपकी प्रार्थना असल में यह है कि परमेश्वर जोखिम हटा दें, और क्या आप उसे "प्रभु की इच्छा पूरी हो" में बदलने को तैयार हैं?

पौलुस ने अपनी स्वतंत्रता का उपयोग दूसरों के लिए झुकने में किया। आपकी किस स्वतंत्रता को किसी कमज़ोर भाई या बहन के लिए इस हफ़्ते सीमित करना पड़ सकता है?

Acts में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Acts

John Stott

Stott's classic on how the gospel crossed every boundary on earth.

Acts For Everyone, Part 1

N.T. Wright

The church's explosive beginnings, explained with energy and care.

Acts: An Introduction and Commentary

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Acts

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Acts 21 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

प्रेरितों के काम 21 का क्या अर्थ है?
पौलुस का जहाज़ कोस, रुदुस, पतरा होते हुए सोर पहुँचता है, और हर पड़ाव पर विश्वासी उससे एक ही बात कहते हैं: यरूशलेम मत जाओ। कैसरिया में भविष्यद्वक्ता अगबुस उसका कमरबन्द लेकर अपने ही हाथ-पाँव बाँधता है और कहता है कि यरूशलेम में पौलुस के साथ यही होगा। पौलुस फिर भी जाता है, याकूब और प्राचीनों की सलाह पर मन्दिर में शुद्धिकरण की रीति निभाता है, और वहीं आसिया के यहूदी भीड़ भड़का देते हैं; रोमी सैन्य-दल का सरदार उसे मरने से बचाकर दो जंजीरों में बाँध लेता है। सीढ़ी पर खड़े होकर पौलुस हाथ से संकेत करता है और इब्रानी भाषा में बोलने लगता है।
प्रेरितों के काम 21 किस विषय में है?
लूका यह कहानी उसी ढाँचे में लिखते हैं जिसमें उन्होंने अपना सुसमाचार लिखा था। वहाँ यीशु "यरूशलेम जाने को अपना मुँह ठान" लेते हैं, यहाँ पौलुस वहीं जाता है जहाँ हर संकेत खतरा कहता है। वहाँ गतसमनी में प्रार्थना होती है, "मेरी नहीं, परन्तु आपकी इच्छा पूरी हो"; यहाँ रोते हुए मित्र अंततः चुप होकर कहते हैं, "प्रभु की इच्छा पूरी हो।" फिर यहूदियों की भीड़, फिर रोमी अधिकारी, फिर बंधन। यह नकल नहीं है, यह अनुसरण है। मसीह की देह अपने सिर के पीछे-पीछे उसी गली से गुज़रती है। और ध्यान दीजिए, पौलुस की यात्रा बचाव में नहीं, गवाही में फलती है: जंजीरों के कारण ही वह सीढ़ी पर खड़ा होकर पूरे यरूशलेम से बोल पाता है।
प्रेरितों के काम 21 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज यह कीजिए: जिस एक चीज़ पर आपका कोई वश नहीं, उसका नाम लेकर, घुटने टेककर, ज़ोर से कहिए, "प्रभु, इस बारे में आपकी इच्छा पूरी हो।" ज़ोर से, ताकि आपके अपने कान सुन लें।
प्रेरितों के काम 21 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पद 4 कहता है कि चेलों ने "आत्मा के सिखाए" पौलुस से कहा कि यरूशलेम में पाँव न रखना। तो क्या पौलुस ने पवित्र आत्मा की अवज्ञा की? यह प्रश्न टालने लायक नहीं है। सबसे ईमानदार पढ़ाई यह लगती है कि आत्मा ने जो प्रकट किया वह आनेवाला कष्ट था, और प्रेम में डूबे विश्वासियों ने उसमें अपना निष्कर्ष जोड़ दिया: मत जाओ। प्रकाशन सच्चा था, उससे निकाला गया आदेश मानवीय। पर यह भी मान लेना चाहिए कि लूका हमें पूरी सफ़ाई नहीं देते। वे तनाव को खड़ा छोड़ देते हैं, और यही शायद उद्देश्य है: आत्मा की अगुवाई हमेशा साफ़-साफ़ तीर की तरह नहीं आती। कभी-कभी दो सच्चे हृदय विपरीत दिशाएँ सुनते हैं, और तब "प्रभु की इच्छा पूरी हो" इस्तीफ़ा नहीं, विश्वास की सबसे परिपक्व भाषा है।
प्रेरितों के काम 21 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
किस व्यक्ति या परिस्थिति के लिए आपकी प्रार्थना असल में यह है कि परमेश्वर जोखिम हटा दें, और क्या आप उसे "प्रभु की इच्छा पूरी हो" में बदलने को तैयार हैं?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Acts 21 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 40

सीढ़ियों पर खड़ा पौलुस पिटा हुआ है, जंजीरों में बंधा है, और नीचे वही भीड़ है जो अभी उसे मार डालना चाहती थी। फिर भी वह हाथ से इशारा करता है और "इब्रानी भाषा में बोलने लगा।" उनकी अपनी भाषा। जो तुम्हें ठुकराते हैं, क्या तुम उनसे उनकी भाषा में बात कर पाते हो? प्रेम वहीं से शुरू होता है, सुनने वाले के पास जाकर।

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