यहेजकेल 12
पाठ
परमेश्वर यहेजकेल को आदेश देते हैं कि वह दिन के उजाले में, सबके देखते हुए, बँधुआई का सामान बाँधे, शाम को अपने घर की दीवार फोड़े, बोझ कंधे पर उठाए, मुँह ढाँपे और निकल जाए। जब लोग पूछें, "यह तू क्या करता है?", तो उत्तर यह है: यरूशलेम का प्रधान और सारा घराना इसी तरह जाएगा। इसके बाद दो और चिन्ह आते हैं, काँपते हुए रोटी खाना, और उस कहावत का खण्डन जिसमें लोग कहते थे कि दर्शन कभी पूरे नहीं होते।
मर्म
यहाँ केन्द्र में परमेश्वर का वचन है, और वचन के बारे में एक दावा जो हमें असहज करता है: "जब मैं बोलूँ, तब जो वचन मैं कहूँ, वह पूरा हो जाएगा।" परमेश्वर का बोलना सूचना देना नहीं, कार्य करना है। सृष्टि में उन्होंने कहा और चीज़ें हो गईं; वाचा में उन्होंने कहा और इस्राएल एक जाति बन गया; और अब वही वचन तोड़ने का काम करता है, क्योंकि वाचा में आशीष के साथ शाप भी लिखा था। न्याय यहाँ परमेश्वर के क्रोध का अनियंत्रित फूटना नहीं, बल्कि उनकी वफ़ादारी का दूसरा चेहरा है। जो परमेश्वर वादा निभाते हैं, वही चेतावनी भी निभाते हैं। और ध्यान दें कि न्याय का लक्ष्य भी ज्ञान है: "तब वे जान लेंगे कि मैं यहोवा हूँ।" परमेश्वर विनाश नहीं, पहचान चाहते हैं।
मुख्य सूत्र
पद 2 की भाषा ध्यान खींचती है: आँखें हैं पर देखते नहीं, कान हैं पर सुनते नहीं। यही शब्द यीशु ने अपने शिष्यों से कहे, "क्या तुम्हारी आँखें होकर भी नहीं देखते?" (मरकुस 8:18), और यह संयोग नहीं। परमेश्वर की प्रजा का पुराना रोग यह नहीं था कि उसके पास वचन नहीं था, बल्कि यह कि वचन उस तक पहुँचकर भी भीतर नहीं उतरा। इसीलिए परमेश्वर अन्त में केवल शब्द नहीं भेजते, वे अपने वचन को देह में भेजते हैं। यहेजकेल का शरीर ही चिन्ह बना, "मैंने तुझे इस्राएल के घराने के लिये एक चिन्ह ठहराया है"; वह अपने लोगों की सज़ा को अपने ऊपर अभिनीत करता है। यह उस पैटर्न की धुँधली छाया है जिसमें मसीह हमारे निर्वासन को केवल दिखाते नहीं, उठा लेते हैं।
दर्पण
हममें भी वही कहावत जीवित है जो पद 22 में है: "दिन अधिक हो गए हैं, और दर्शन की कोई बात पूरी नहीं हुई।" हम इसे धर्मशास्त्र की भाषा में नहीं, आदतों में बोलते हैं। वह पाप जिसके बारे में आपने दस साल पहले सोचा था कि इसे छोड़ना होगा, और जो अब बस आपके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया है। वह टैक्स की बेईमानी, वह ठंडा विवाह, वह क्रोध जो बच्चों पर गिरता है और जिसे आप "थकान" कहते हैं। कुछ नहीं हुआ, इसलिए कुछ नहीं होगा। परमेश्वर की सहनशीलता को हमने उनकी उदासीनता पढ़ लिया। पद 28 इस गणित को तोड़ता है: "विलम्ब न होगा।"
आज एक काम करें: कागज़ पर उस एक चीज़ का नाम लिखें जिसके बारे में आप भीतर से जानते हैं कि परमेश्वर ने उसे छोड़ने को कहा है, और जिसे आप टालते आए हैं। नाम लिखकर, ज़ोर से पढ़कर, उसे परमेश्वर के सामने स्वीकार करें।
श्रोताओं का चेहरा
यहेजकेल के आसपास बैठे लोग बाबेल में थे, 597 में पहली बँधुआई में लाए गए। वे पूरी तरह निराश नहीं थे; वे आशावादी थे, और यही समस्या थी। उनका हिसाब था: यरूशलेम खड़ा है, मन्दिर खड़ा है, सिद्दकिय्याह सिंहासन पर है, मिस्र मदद करेगा, हम कुछ बरसों में घर होंगे। इसलिए जब उन्होंने इस याजक-नबी को दिन के उजाले में सामान बाँधते और शाम को अपनी दीवार तोड़ते देखा, तो यह प्रदर्शन उनकी सबसे प्यारी उम्मीद पर हमला था। दीवार तोड़कर निकलना किसी शरणार्थी की सामान्य यात्रा नहीं, भागे हुए कैदी की छवि है। और ढँका हुआ मुँह, राजा की लज्जा। वे समझ गए थे, इसीलिए उन्होंने पूछा, "यह तू क्या करता है?"
पृष्ठभूमि
समय लगभग 593-592 ईसा पूर्व, स्थान कबार नदी के किनारे तेल-अबीब, बाबेली साम्राज्य के भीतर निर्वासितों की बस्ती। ये लोग गुलाम नहीं थे, उनके घर थे, कुछ हद तक आज़ादी भी, लेकिन वे सत्ता से पूरी तरह कटे हुए थे। यरूशलेम में सिद्दकिय्याह नबूकदनेस्सर का अधीन राजा था और गुप्त रूप से विद्रोह की योजना बना रहा था। पद 13 का वाक्य भयानक रूप से सटीक निकला: वह बाबेल पहुँचेगा पर उस नगर को देखेगा नहीं। 2 राजा 25 बताता है कि उसकी आँखें रिबला में फोड़ दी गईं और वह अंधा बाबेल ले जाया गया। जिसने देखने से इनकार किया, उसने देखने की शक्ति खो दी। न्याय ने पाप का आकार ले लिया।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में असली पात्र वे परमेश्वर हैं जो बार-बार बोलते हैं, "यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुँचा", पाँच बार। यह ऐसे परमेश्वर हैं जो चुप रहकर वार नहीं करते। वे चेतावनी देते हैं, फिर चेतावनी को अभिनीत करवाते हैं, और यह सब इस उम्मीद में, "सम्भव है कि वे ध्यान दें।" यह वाक्य पूरे अध्याय की कुंजी है; यहाँ न्याय की घोषणा करनेवाला मन भी पश्चाताप के लिए दरवाज़ा खुला छोड़ रहा है। और पद 16 में अनुग्रह की छोटी-सी किरण: "मैं उनमें से थोड़े से लोगों को तलवार, भूख और मरी से बचा रखूँगा।" परमेश्वर कभी पूरी तरह मिटाते नहीं; एक बचा हुआ शेष सदा रहता है, क्योंकि उनका अन्तिम उद्देश्य नाश नहीं, बल्कि यह है कि लोग जानें कि वे कौन हैं।
चिंतन के प्रश्न
मेरे जीवन में कौन-सी "कहावत" चल रही है, कौन-सा वह तर्क जिससे मैं परमेश्वर के बोले हुए वचन को दूर के भविष्य में टाल देता हूँ?
यहेजकेल को अपने शरीर से संदेश जीना पड़ा। क्या मेरे जीवन में कुछ ऐसा दिखता है जिसे देखकर कोई पूछे, "यह तू क्या करता है?"
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