बाइबल व्याख्या

प्रेरितों के काम 6:1

बाइबल

मूल पाठ

यरूशलेम की उस मण्डली में सब कुछ बढ़ रहा था। लोग बढ़ रहे थे, रोटी तोड़ी जा रही थी, प्रेरितों के हाथों से चंगाई हो रही थी। और ठीक उसी बढ़ती के बीच, किसी गली के किसी कोने में, एक आवाज़ उठी जो प्रार्थना नहीं थी: कुड़कुड़ाहट। लूका इसे छिपाता नहीं। वह लिखता है कि "उन दिनों में जब चेलों की संख्या बहुत बढ़ने लगी, तब यूनानी भाषा बोलनेवाले इब्रानियों पर कुड़कुड़ाने लगे, कि प्रतिदिन की सेवकाई में हमारी विधवाओं की सुधि नहीं ली जाती।" शिकायत बहुत ठोस है, कोई धर्म-सिद्धांत का विवाद नहीं: रोज़ बाँटे जाने वाले भोजन में हमारी विधवाएँ छूट जाती हैं। दो भाषाओं, दो संस्कृतियों वाली एक ही मण्डली, और बीच में भूखी बुढ़ियाँ।

मर्म

यहाँ कलीसिया की पहली अंदरूनी दरार खुलती है, और वह विश्वास के प्रश्न पर नहीं, खाने की कतार पर खुलती है। यह हमें परमेश्वर के विषय में कुछ असुविधाजनक और सुंदर बताता है: वे भोजन-वितरण को आत्मिक मामला मानते हैं। विधवा इस्राएल की व्यवस्था में सबसे असुरक्षित व्यक्ति थी, न पति, न आय, न आवाज़; और परमेश्वर ने बार-बार अपने आप को उसका पक्षकार घोषित किया था। इसलिए जब यूनानी बोलने वाली विधवाएँ छूट जाती हैं, तो यह प्रबंधन की चूक भर नहीं, अनुग्रह की गवाही में दरार है। पवित्र आत्मा से भरी मण्डली भी अपने पूर्वाग्रहों से स्वतः मुक्त नहीं होती। भाषा, जन्मस्थान और परिचय का जाल वहाँ भी काम करता है। राज्य इसी जगह पर परखा जाता है: क्या जिनकी कोई आवाज़ नहीं, उनकी सुधि ली जाती है?

बड़ी कहानी का धागा

यह दृश्य अचानक नहीं आया। परमेश्वर ने व्यवस्था में बार-बार अपनी प्रजा को बाँधा था कि अनाथ, परदेशी और विधवा को खेत के कोने का अनाज मिले; जो लोग स्वयं मिस्र में परदेशी थे, वे किसी परदेशी को भूखा न छोड़ें। यरूशलेम की यह रोज़ की रोटी उसी आज्ञा का नया रूप है। और मसीह में यह आज्ञा और गहरी होती है, क्योंकि उन्होंने अपनी देह देकर यहूदी और यूनानी के बीच की दीवार गिरा दी। इसलिए जब एक ही मेज़ पर भाषा के आधार पर दो कतारें बन जाती हैं, तो क्रूस का काम व्यवहार में झुठलाया जा रहा है। ध्यान दीजिए कि इसी संकट से चुने गए सातों के नाम यूनानी हैं, और उन्हीं में से स्तिफनुस और फिलिप्पुस निकलते हैं, जिनके द्वारा सुसमाचार यरूशलेम की दीवारों के बाहर बहता है। एक भोजन-विवाद परमेश्वर के हाथ में मिशन का दरवाज़ा बन जाता है।

दर्पण

हम शिकायत करने वालों को जल्दी ही "समस्या" मान लेते हैं। कलीसिया में जो कहता है कि मेरी माँ को कोई देखने नहीं आया, जो कहता है कि हमारी भाषा में गीत नहीं गाए जाते, जो कहता है कि निर्णय हमेशा उन्हीं चार परिवारों में होते हैं, उसे हम अक्सर मन में "नकारात्मक व्यक्ति" का लेबल दे देते हैं। यह पद हमें रोकता है। पहली मण्डली की कुड़कुड़ाहट सच थी। और यह भी पूछिए: आपकी सभा में कौन ऐसा है जिसका नाम आप बीस साल बाद भी नहीं जानते? वह वृद्धा जो सबसे पीछे बैठती है, वह मज़दूर परिवार जो चाय के समय अलग खड़ा रहता है, वह विधवा जिसके पति की अंत्येष्टि के बाद फोन आना बंद हो गया। अनदेखी आमतौर पर द्वेष से नहीं, आदत से होती है। आज ही एक काम कीजिए: अपनी मण्डली की उस अकेली या विधवा स्त्री का नाम कागज़ पर लिखिए जिससे आपने महीनों बात नहीं की, और अभी, इसी घंटे, उसे फोन करके पूछिए कि इस हफ्ते उसे किस चीज़ की ज़रूरत है।

मुख्य पात्र

इस पद के असली पात्र वे यूनानी बोलने वाले विश्वासी हैं जिनके नाम लूका नहीं देता। ये प्रवासी यहूदी थे, जो साम्राज्य के किसी दूर शहर से जीवन के अंतिम वर्ष पवित्र नगर में बिताने लौटे थे। उनकी भाषा यूनानी थी, उनका उच्चारण अलग था, यरूशलेम में उनका कोई बड़ा कुटुम्ब नहीं था। पति मरे, और पीछे रह गई स्त्रियाँ बिल्कुल असुरक्षित। अब उन्होंने मसीह को अपनाया, इस उम्मीद में कि यहाँ कम से कम अपनापन मिलेगा, और यहाँ भी कतार में उनका नंबर पीछे रह गया। उनकी आत्मिक स्थिति में एक बात उल्लेखनीय है: उन्होंने चुपचाप निकल जाना नहीं चुना। उन्होंने बोला। कड़वाहट के साथ, पर मण्डली के भीतर बोला। कभी-कभी विश्वास की निशानी यही होती है कि आदमी दरवाज़ा पटककर जाने के बजाय अपनी पीड़ा समुदाय के सामने रख देता है।

एक बारीकी

"कुड़कुड़ाने लगे" पर ठहरिए। यूनानी में यह शब्द है गोग्गुस्मोस, और यह वही शब्द है जो पुराने नियम के यूनानी अनुवाद में जंगल के इस्राएल के लिए इस्तेमाल होता है, जब वे मन्ना और पानी पर मूसा के विरुद्ध बड़बड़ाते थे। लूका शब्द सोच-समझकर चुनता है। वह पाठक के कान में एक चेतावनी की घंटी बजाता है: नई प्रजा उसी मोड़ पर खड़ी है जिस मोड़ पर पुरानी प्रजा टूटी थी, और वह मोड़ भी रोटी का ही था। पर अंतर देखिए। जंगल में कुड़कुड़ाहट परमेश्वर के प्रबंध पर अविश्वास थी; यहाँ कुड़कुड़ाहट एक वास्तविक अन्याय की ओर इशारा करती है, और प्रेरित उसे दबाते नहीं, सुनते हैं। एक ही शब्द, दो अलग परिणाम। कलीसिया का स्वास्थ्य इसी में दिखता है कि वह शिकायत को खतरा मानती है या सूचना।

कठिन प्रश्न

पवित्र आत्मा से भरी, चिन्ह और चमत्कार करती, सब कुछ बाँटकर खाती हुई मण्डली में विधवाएँ भूखी कैसे रह गईं? लूका यह नहीं बताता कि यह जानबूझकर हुआ या केवल अव्यवस्था थी, और यह चुप्पी असहज है। हम चाहते हैं कि आत्मा का भर जाना हमें पूर्वाग्रह से प्रतिरक्षा दे दे, कि आत्मिक जागृति के बीच ऐसी शर्मनाक चीज़ें असंभव हो जाएँ। पर पाठ ऐसा कोई वादा नहीं करता। भरे हुए लोग भी अपनी भाषा वालों को पहले परोसते हैं। इसका उत्तर पाठ में यह नहीं है कि पाप कभी हुआ ही नहीं, बल्कि यह कि आत्मा ने मण्डली को सुनने, स्वीकारने और ढाँचा बदलने की शक्ति दी। अनुग्रह हमें गिरने से नहीं बचाता; वह हमें उठकर मेज़ फिर से लगाने की क्षमता देता है। यह कम आश्वस्त करने वाला है, और कहीं अधिक सच्चा।

चिंतन

आपकी मण्डली में इस समय कौन "यूनानी भाषा बोलने वाला" है, यानी कौन भीतर होकर भी किनारे पर है, और आप यह कैसे जानेंगे यदि आपने उससे कभी पूछा ही नहीं?

पिछली बार जब किसी ने आपकी सेवकाई या आपके परिवार के बारे में शिकायत की, तो आपने उसे खतरा माना या सूचना, और आज उसका क्या फल दिख रहा है?

Acts में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Acts

John Stott

Stott's classic on how the gospel crossed every boundary on earth.

Acts For Everyone, Part 1

N.T. Wright

The church's explosive beginnings, explained with energy and care.

Acts: An Introduction and Commentary

I. Howard Marshall

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Acts

Ajith Fernando

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Acts 6:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

प्रेरितों के काम 6:1 का क्या अर्थ है?
यरूशलेम की उस मण्डली में सब कुछ बढ़ रहा था। लोग बढ़ रहे थे, रोटी तोड़ी जा रही थी, प्रेरितों के हाथों से चंगाई हो रही थी। और ठीक उसी बढ़ती के बीच, किसी गली के किसी कोने में, एक आवाज़ उठी जो प्रार्थना नहीं थी: कुड़कुड़ाहट। लूका इसे छिपाता नहीं। वह लिखता है कि "उन दिनों में जब चेलों की संख्या बहुत बढ़ने लगी, तब यूनानी भाषा बोलनेवाले इब्रानियों पर कुड़कुड़ाने लगे, कि प्रतिदिन की सेवकाई में हमारी विधवाओं की सुधि नहीं ली जाती।" शिकायत बहुत ठोस है, कोई धर्म-सिद्धांत का विवाद नहीं: रोज़ बाँटे जाने वाले भोजन में हमारी विधवाएँ छूट जाती हैं। दो भाषाओं, दो संस्कृतियों वाली एक ही मण्डली, और बीच में भूखी बुढ़ियाँ।
प्रेरितों के काम 6:1 किस विषय में है?
यह दृश्य अचानक नहीं आया। परमेश्वर ने व्यवस्था में बार-बार अपनी प्रजा को बाँधा था कि अनाथ, परदेशी और विधवा को खेत के कोने का अनाज मिले; जो लोग स्वयं मिस्र में परदेशी थे, वे किसी परदेशी को भूखा न छोड़ें। यरूशलेम की यह रोज़ की रोटी उसी आज्ञा का नया रूप है। और मसीह में यह आज्ञा और गहरी होती है, क्योंकि उन्होंने अपनी देह देकर यहूदी और यूनानी के बीच की दीवार गिरा दी। इसलिए जब एक ही मेज़ पर भाषा के आधार पर दो कतारें बन जाती हैं, तो क्रूस का काम व्यवहार में झुठलाया जा रहा है। ध्यान दीजिए कि इसी संकट से चुने गए सातों के नाम यूनानी हैं, और उन्हीं में से स्तिफनुस और फिलिप्पुस निकलते हैं, जिनके द्वारा सुसमाचार यरूशलेम की दीवारों के बाहर बहता है। एक भोजन-विवाद परमेश्वर के हाथ में मिशन का दरवाज़ा बन जाता है।
प्रेरितों के काम 6:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इस पद के असली पात्र वे यूनानी बोलने वाले विश्वासी हैं जिनके नाम लूका नहीं देता। ये प्रवासी यहूदी थे, जो साम्राज्य के किसी दूर शहर से जीवन के अंतिम वर्ष पवित्र नगर में बिताने लौटे थे। उनकी भाषा यूनानी थी, उनका उच्चारण अलग था, यरूशलेम में उनका कोई बड़ा कुटुम्ब नहीं था। पति मरे, और पीछे रह गई स्त्रियाँ बिल्कुल असुरक्षित। अब उन्होंने मसीह को अपनाया, इस उम्मीद में कि यहाँ कम से कम अपनापन मिलेगा, और यहाँ भी कतार में उनका नंबर पीछे रह गया। उनकी आत्मिक स्थिति में एक बात उल्लेखनीय है: उन्होंने चुपचाप निकल जाना नहीं चुना। उन्होंने बोला। कड़वाहट के साथ, पर मण्डली के भीतर बोला। कभी-कभी विश्वास की निशानी यही होती है कि आदमी दरवाज़ा पटककर जाने के बजाय अपनी पीड़ा समुदाय के सामने रख देता है।
प्रेरितों के काम 6:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पवित्र आत्मा से भरी, चिन्ह और चमत्कार करती, सब कुछ बाँटकर खाती हुई मण्डली में विधवाएँ भूखी कैसे रह गईं? लूका यह नहीं बताता कि यह जानबूझकर हुआ या केवल अव्यवस्था थी, और यह चुप्पी असहज है। हम चाहते हैं कि आत्मा का भर जाना हमें पूर्वाग्रह से प्रतिरक्षा दे दे, कि आत्मिक जागृति के बीच ऐसी शर्मनाक चीज़ें असंभव हो जाएँ। पर पाठ ऐसा कोई वादा नहीं करता। भरे हुए लोग भी अपनी भाषा वालों को पहले परोसते हैं। इसका उत्तर पाठ में यह नहीं है कि पाप कभी हुआ ही नहीं, बल्कि यह कि आत्मा ने मण्डली को सुनने, स्वीकारने और ढाँचा बदलने की शक्ति दी। अनुग्रह हमें गिरने से नहीं बचाता; वह हमें उठकर मेज़ फिर से लगाने की क्षमता देता है। यह कम आश्वस्त करने वाला है, और कहीं अधिक सच्चा।
प्रेरितों के काम 6:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछली बार जब किसी ने आपकी सेवकाई या आपके परिवार के बारे में शिकायत की, तो आपने उसे खतरा माना या सूचना, और आज उसका क्या फल दिख रहा है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Acts 6 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 2

यह ठीक नहीं कि हम परमेश्वर का वचन छोड़कर खाने-पीने की सेवा में लगे रहें।" प्रेरितों ने सेवा को छोटा नहीं कहा, उन्होंने सात लोग चुनकर उसे और भी सम्मान दिया। उन्होंने बस पहचाना कि हर अच्छा काम उनका काम नहीं है। तुम भी हर जगह हाथ डालकर थक चुके हो? पूछो, परमेश्वर ने असल में किस बात के लिए तुम्हें बुलाया है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

प्रेरितों ने विधवाओं की ज़रूरत को छोटा नहीं कहा, उन्होंने सात भरोसेमंद लोग चुने। पर अपने बारे में उन्होंने साफ कहा, "परन्तु हम प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे रहेंगे।" ध्यान दो, "लगे रहेंगे", यानी लगातार, बिना छोड़े। हर भला काम तुम्हारा काम नहीं है। जो परमेश्वर ने खास तौर पर तुम्हें सौंपा है, उसे भीड़ में खोने मत दो।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

सात सेवकों को चुनने के तुरन्त बाद लिखा है, "और परमेश्वर का वचन फैलता गया और यरूशलेम में चेलों की गिनती बहुत बढ़ती गई।" यानी विधवाओं की शिकायत को गंभीरता से सुनना कोई छोटा काम नहीं था। जिस मंडली में उपेक्षित लोगों की परवाह होती है, वहीं वचन बढ़ता है। तेरे घर में, तेरी कलीसिया में कौन अनदेखा रह गया है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 1

कलीसिया बढ़ रही थी, और ठीक उसी समय दरार दिखी: "प्रतिदिन की सेवकाई में हमारी विधवाओं की सुधि नहीं ली जाती।" भीड़ बढ़ने पर सबसे पहले वही छूट जाते हैं जिनकी आवाज़ धीमी है। ध्यान दो, यह शिकायत दबाई नहीं गई, सुनी गई। तेरी मंडली में, तेरे घर में कौन है जिसकी सुधि रोज़ नहीं ली जाती? उसका नाम आज तुझे याद आया, यह संयोग नहीं है।

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