सभोपदेशक 12:1
पाठ
उपदेशक अपनी लंबी खोज के अंत में एक जवान आदमी की ओर मुड़कर कहता है: "अपनी जवानी के दिनों में अपने सृजनहार को स्मरण रख।" यह कोई धार्मिक सलाह नहीं, बल्कि समय की घड़ी देखकर दी गई चेतावनी है। क्योंकि इसके बाद वे दिन आते हैं जिन्हें वह "विपत्ति के दिन" कहता है, और वे वर्ष जिनके बारे में आदमी खुद कहेगा, "मेरा मन इनमें नहीं लगता।" यानी वह उम्र जब शरीर थकता है, स्वाद फीका पड़ता है, और जीने का उत्साह धीरे-धीरे बुझता है। स्मरण अभी करो, कहता है उपदेशक, जब स्मरण करने की ताकत बची है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि वह "परमेश्वर को स्मरण रख" नहीं कहता, बल्कि "अपने सृजनहार को"। यह चुनाव सोच-समझकर किया गया है। पूरी पुस्तक में उपदेशक ने जीवन के हर टुकड़े को तौला है, काम, धन, बुद्धि, सुख, और हर बार वही निष्कर्ष निकला: व्यर्थ। लेकिन व्यर्थता का इलाज कोई बेहतर रणनीति नहीं है, बल्कि यह याद रखना कि तुम बनाए गए हो। तुम अपने आप से नहीं आए, इसलिए तुम्हारे जीवन का अर्थ तुम्हारे भीतर से नहीं निकलेगा। बाइबल का स्मरण कभी केवल मानसिक याद नहीं होता, वह रिश्ते में लौटना है। जवानी में यह करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि तब हम सबसे ज़्यादा यह भ्रम पालते हैं कि हम अपने मालिक खुद हैं। बुढ़ापा उस भ्रम को तोड़ता तो है, पर तब तक बहुत कुछ बीत चुका होता है।
सूत्र
उपदेशक जहाँ रुकता है, वहीं से सुसमाचार आगे बढ़ता है। वह जानता है कि मिट्टी मिट्टी में मिल जाएगी और "आत्मा परमेश्वर के पास जिसने उसे दिया लौट जाएगी", पर वह यह नहीं बता पाता कि उस लौटने का क्या होगा। वह जानता है कि परमेश्वर "सब कामों और सब गुप्त बातों का" न्याय करेगा, पर वह नहीं बताता कि उस न्याय में कोई कैसे खड़ा रह सकता है। यहीं मसीह आते हैं। नये नियम में पौलुस कहता है कि सब कुछ मसीह के द्वारा और उन्हीं के लिए सृजा गया; यानी जिस "सृजनहार" को स्मरण करने की बात उपदेशक कर रहा है, उसका चेहरा हमें बेतलहम और गुलगुता में दिखता है। सृष्टि का कर्ता स्वयं सृष्टि के भीतर उतरा, मिट्टी में मिला, और तीसरे दिन मिट्टी से बाहर आया। इसलिए "स्मरण रख" अब केवल एक चेतावनी नहीं, एक निमंत्रण है।
दर्पण
यह पद उस भ्रम पर हाथ रखता है जिसे हम सब पालते हैं: कि परमेश्वर के लिए समय बाद में निकाल लेंगे। पहले नौकरी जम जाए, पहले घर का कर्ज़ उतर जाए, पहले बच्चे थोड़े बड़े हो जाएँ। उपदेशक कहता है, वह "बाद में" कभी उतना खाली नहीं होगा जितना तुम सोचते हो, और तब तक तुम्हारे भीतर वह भूख भी नहीं बचेगी। चालीस की उम्र में घुटना दुखने लगता है, माता-पिता कमज़ोर होने लगते हैं, और अचानक समय एक सीमित चीज़ लगने लगता है। यह पद डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए लिखा गया है। आज ही, दस मिनट निकालकर एक कागज़ पर लिखिए कि आपके पास अनुमानतः कितने वर्ष बचे हैं, और उसके नीचे एक वाक्य में लिखिए कि उन वर्षों में आप किसके लिए जीना चाहते हैं।
कठिन प्रश्न
तो क्या जिसने जवानी गँवा दी, उसके लिए दरवाज़ा बंद है? पद पढ़कर ऐसा लग सकता है, और यह चुभन को छिपाना ईमानदारी नहीं होगी। उपदेशक सचमुच कह रहा है कि कुछ खिड़कियाँ बंद हो जाती हैं; बुढ़ापे में लौटना कठिन होता है, आदतें पत्थर बन चुकी होती हैं, और खोए हुए वर्ष वापस नहीं मिलते। बाइबल कहीं यह वादा नहीं करती कि परिणाम मिट जाएँगे। पर वह यह भी कहती है कि जो अंतिम घड़ी में क्रूस पर लटके चोर को स्वर्गलोक का वचन देते हैं, वे किसी को देर से आया कहकर नहीं लौटाते। दोनों बातें साथ रहती हैं: कृपा कभी देर नहीं करती, पर समय कभी वापस नहीं आता। इस तनाव को हल करने की कोशिश मत कीजिए, इसे जीने दीजिए।
संदर्भ
उपदेशक की दुनिया में बुढ़ापा आज जैसा नहीं था। न पेंशन, न दवाइयाँ, न ऑपरेशन। जो शरीर काम नहीं करता था, वह परिवार पर बोझ बन जाता था, और पद 3 से 5 की तस्वीरें, काँपते पहरुए, धीमी होती चक्की, बंद किवाड़, किसी कविता की कल्पना नहीं बल्कि हर गाँव का रोज़ का दृश्य थीं। एक जवान इस्राएली के सामने चुनाव सीधा था: जब तक हाथ-पैर चलते हैं, कमाओ, बनाओ, फैलाओ। इसी भीड़-भाड़ में बूढ़ा शिक्षक एक जवान को रोककर कहता है, अपने बनानेवाले को याद कर। यह उस समाज की पूरी अर्थव्यवस्था के विरुद्ध बोला गया वाक्य है, क्योंकि यह उत्पादकता को नहीं, रिश्ते को जीवन का केंद्र बनाता है।
एक बारीकी
"स्मरण रख" के लिए इब्रानी शब्द है ज़ाखोर। बाइबल में यह शब्द शायद ही कभी केवल दिमागी याद के लिए आता है। जब कहा जाता है कि परमेश्वर ने नूह को स्मरण किया, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें अचानक ध्यान आया, बल्कि यह कि उन्होंने काम करना शुरू किया। ज़ाखोर का मतलब है किसी को अपने वर्तमान में सक्रिय रूप से जगह देना, उसके अनुसार जीना। इसलिए यह पद यह नहीं कह रहा कि जवानी में परमेश्वर के बारे में सोच लो; वह कह रहा है कि अपने पूरे जवान जीवन को, अपनी पढ़ाई, नौकरी, प्रेम, पैसे को, सृजनहार के साथ के रिश्ते के भीतर रखो। और जब प्रभु यीशु रोटी तोड़कर कहते हैं कि यह मेरी याद में करो, तो वे इसी शब्द की परंपरा में बोलते हैं।
मनन के प्रश्न
आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा आपने चुपचाप "सृजनहार" के दायरे से बाहर रखा हुआ है, यह सोचकर कि वह धर्म का मामला नहीं है?
यदि आपके पास आज जितनी ताकत है, वह अगले दस वर्षों में घटती जाएगी, तो आप उसे अभी किस काम में लगाना चाहेंगे?
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Ecclesiastes 12:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Ecclesiastes 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
अपनी जवानी के दिनों में अपने सृजनहार को स्मरण रख" (सभोपदेशक 12:1)। ध्यान दे, सुलैमान यह नहीं कहता कि परमेश्वर को स्मरण रख, बल्कि अपने सृजनहार को। जिसने तुझे गढ़ा, वही जानता है कि तू किसलिए बना है। जवानी की ताकत में यह भूल जाना आसान है। पर एक दिन शरीर थकेगा, मन उदास होगा, और तब नई शुरुआत कठिन लगेगी। आज ही उसकी ओर मुड़, जब तक दिल में रस बाकी है।
क्योंकि परमेश्वर सब कामों और सब गुप्त बातों का, चाहे वे भली हों या बुरी, न्याय करेगा।" सारी पुस्तक में जो कुछ व्यर्थ लगा, वह यहाँ आकर अर्थ पा जाता है। जो भलाई तूने चुपचाप की, जिसे किसी ने नहीं देखा, वह खोई नहीं है। और जो तूने अंधेरे में छिपाया, वह भी भुलाया नहीं गया। परमेश्वर के सामने कुछ भी छोटा या अनदेखा नहीं होता। आज का तेरा छोटा सा निर्णय भी उसकी दृष्टि में है।
पिता, जब आवाज़ें धीमी पड़ने लगती हैं और दुनिया का शोर दूर सुनाई देता है, तब भी तू पास है। मेरी ताकत घटती जाए, पर तुझ पर मेरा भरोसा घटने न पाए। सुबह की चिड़िया की तरह मुझे हर दिन तेरी ओर जगा दे, और शांति में तेरी आवाज़ पहचानना सिखा।
पिता, धन्यवाद कि आपने उपदेशक को "मनभावने वचन" खोजने का यत्न करने और सच्चाई की बातें ठीक रीति से लिखने की प्रेरणा दी। धन्यवाद कि आपका वचन न केवल सच्चा है, बल्कि मन को भाता भी है। मेरी बातों को भी सच्चाई और मिठास से भर दीजिए।
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