सभोपदेशक 2:2
पाठ
सुलैमान ने हँसी को अदालत के कटघरे में खड़ा किया और फैसला सुनाया: "यह तो बावलापन है।" फिर उसने आनन्द से भी जिरह की, पर इस बार आरोप नहीं, एक सवाल: "उससे क्या प्राप्त होता है?" पिछले पद में उसने अपने मन से कहा था कि चल, आनन्द के द्वारा तुझको जाँचूँ, और नतीजा हाथ आने से पहले ही वह जान गया कि यह भी व्यर्थ है। यह पद उस प्रयोग की रसीद है। ध्यान दीजिए, वह हँसी को पाप नहीं कहता, मूर्खता कहता है। और आनन्द को झूठा नहीं कहता, बस बंजर कहता है। कुछ उगता नहीं उसमें। हँसी के बाद जो खालीपन बचता है, उसी पर यह आधा वाक्य उँगली रखता है।
मूल बात
जिस शब्द का अनुवाद "बावलापन" हुआ है, इब्रानी में वह होलेलाह है, एक ऐसी दीवानगी जिसमें आदमी ज़ोर से हँसता है पर दिशा खो चुका होता है। सुलैमान की शिकायत यह नहीं कि खुशी बुरी है; अध्याय के अंत में वही कहेगा कि खाने-पीने और सुख भोगने का अधिकार परमेश्वर की ओर से मिलता है। उसकी शिकायत यह है कि खुशी को जब हम जीवन का उत्तर बना देते हैं, तब वह टूट जाती है, क्योंकि वह उत्तर बनने के लिए बनी ही नहीं। उपहार को नींव बना दो तो वह चटक जाएगा। परमेश्वर के हाथ से लिया गया आनन्द वरदान है; परमेश्वर की जगह बिठाया गया आनन्द मज़ाक है, और सबसे कड़वा मज़ाक अपने ही ऊपर।
सूत्र
बाइबल की कहानी में यह पद एक खाली कुर्सी की तरह है। सुलैमान के पास सब कुछ था, और उसने ईमानदारी से बता दिया कि उस सब में से कोई भी चीज़ मनुष्य के भीतर की भूख नहीं मिटा सकी। यही खालीपन पुराने नियम में जगह-जगह अपनी ओर किसी के आने की प्रतीक्षा करता है। दिलचस्प यह है कि जब वह आया, तो उसने भोज में जाना नहीं छोड़ा, पानी को दाखमधु बना दिया, और अपने आने को विवाह की खुशी कहा। मसीह ने सुलैमान के प्रयोग को उलटा नहीं किया, उसे उसकी जड़ से जोड़ दिया। आनन्द व्यर्थ नहीं रहता जब वह किसी के होने से निकलता है, न कि किसी चीज़ के पाने से। दुःख की बात यह है कि उस आनन्द की कीमत क्रूस पर चुकाई गई, हँसी की नहीं।
आइना
आप भी जाँच चला रहे हैं, बस उसे प्रयोग नहीं कहते। सप्ताह भर के तनाव के बाद शुक्रवार की रात, चौथा एपिसोड, अंगूठे के नीचे सरकती स्क्रीन, दोस्तों के बीच वह ज़ोर की हँसी जिसके ठीक बाद गाड़ी में बैठते ही एक अजीब सूनापन उतर आता है। आप बुरा कुछ नहीं कर रहे। आप सिर्फ़ वह भार किसी हल्की चीज़ पर टाँग रहे हैं जो उसे उठा नहीं सकती। सुलैमान का सवाल आपके ऊपर भी वही है: "उससे क्या प्राप्त होता है?" वह हँसी छीनने नहीं आया, आपसे यह पूछने आया है कि आप हँसी से क्या मँगवा रहे हैं। जब मनोरंजन आपकी दवा बन जाता है, तब वह आपको सुला देता है, चंगा नहीं करता।
आज यह कीजिए: जिस एक चीज़ की ओर आप थकने पर सबसे पहले हाथ बढ़ाते हैं, उसका नाम कागज़ पर लिखिए, और उसके नीचे यह लिखिए, "उससे क्या प्राप्त होता है?" फिर उस कागज़ को अपने हाथ में पकड़े हुए, ज़ोर से, परमेश्वर से कहिए कि वह चीज़ आपको वह नहीं दे सकती जो आप उससे माँग रहे हैं।
श्रोता
पहले सुननेवाले ऐसे लोग थे जिनके लिए "हँसी" राजा के दरबार का साज़-सामान थी: गायक, गायिकाएँ, दाखमधु, भोज। उन्होंने शायद सोचा हो कि यदि उनके पास सुलैमान जितने साधन होते, तो वे इस परीक्षा में पास हो जाते। यह पद उनकी उस कल्पना को काट देता है। जो आदमी सबसे बड़ा प्रयोग कर सकता था, उसी ने रिपोर्ट लिखी है, और रिपोर्ट नकारात्मक है। इसराएल में जीवन किसान का जीवन था: सूखा, फसल, कर्ज़, बच्चों की मृत्यु। ऐसे श्रोता के कान में यह वाक्य कड़वा नहीं, राहत भरा लगता है। जो मेरी पहुँच से बाहर है, वह मेरा उद्धार भी नहीं था। धनी होने से भीतर की प्यास नहीं बुझती, यह जानना गरीब के लिए एक तरह की आज़ादी है।
कठिन सवाल
फिर क्या हँसना गलत है? और यदि नहीं, तो सुलैमान इतनी तेज़ी से उसे "बावलापन" क्यों कह देता है? ईमानदारी से कहूँ, उपदेशक इस तनाव को सुलझाता नहीं, उसके साथ जीता है। यही आदमी आगे कहेगा कि खाना, पीना और परिश्रम में सुखी रहना परमेश्वर की ओर से मिलता है, और अंत में फिर जोड़ देगा, "यह भी व्यर्थ और वायु को पकड़ना है।" दोनों बातें साथ खड़ी हैं। मुझे लगता है फ़र्क़ माँगने और पाने में है। जो आनन्द मैं ज़बरदस्ती निकालता हूँ, वह मूर्खता है; जो आनन्द मेरे हाथ में रख दिया जाता है, वह वरदान है। पर कब कौन सा है, इसका कोई साफ़ पैमाना वह हमें नहीं देता। यह रहस्य हमें विनम्र रखने के लिए खुला छोड़ा गया है।
अन्य वचन
लूका के धनवान किसान की कहानी लगभग इसी पद का नाटक है: वह अपने मन से कहता है कि खा, पी, सुख भोग, और उसी रात उसका प्राण माँग लिया जाता है। सुलैमान की तरह वह भी अपने मन से बात करता है, और दोनों जगह मन को दिया गया आश्वासन टिकता नहीं। दूसरी ओर, यशायाह में परमेश्वर पूछते हैं कि तुम अपनी कमाई उस चीज़ पर क्यों ख़र्च करते हो जो रोटी नहीं है। वही सवाल, अलग शब्दों में। बाइबल भूख की निंदा नहीं करती, वह भूख के गलत पते पर चिट्ठी भेजने की निंदा करती है।
चिंतन
पिछले महीने आपने थकान के समय किस चीज़ से आराम माँगा, और ईमानदारी से बताइए, उससे क्या प्राप्त हुआ?
आपके जीवन में कोई एक खुशी ऐसी है जो आपने कमाई नहीं, सिर्फ़ पाई है? आज उसके लिए परमेश्वर को धन्यवाद देने में आपको क्या रोक रहा है?
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Ecclesiastes 2:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
सभोपदेशक 2:2 का क्या अर्थ है?
सभोपदेशक 2:2 किस विषय में है?
सभोपदेशक 2:2 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
सभोपदेशक 2:2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
सभोपदेशक 2:2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ecclesiastes 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मैं जमा करने और सहेजने में इतना उलझ जाता हूँ कि आनंद भूल जाता हूँ। मुझे बुद्धि और समझ दे, और वह खुशी भी जो सिर्फ तेरे हाथ से मिलती है। जो तेरे मन को भाता है, वही मेरा जीवन बने।
सुलैमान ने सब कुछ आज़माया, बाग़, महल, संगीत, धन, और अंत में थककर पूछा, "क्योंकि उसके बिना कौन खा सकता और कौन सुख भोग सकता है?" सुख कोई चीज़ नहीं जिसे हम जमा कर लें, वह परमेश्वर के हाथ से मिलने वाला दान है। सोचो, आज की रोटी भी तुम्हें स्वाद तभी देती है जब वह देता है। जो तुम्हारे पास पहले से है, क्या तुमने उसके लिए उसका धन्यवाद किया?
धन्यवाद कि आपने हमें सिखाया कि जो कुछ हम धरती पर परिश्रम से कमाते हैं, वह हमारे बाद दूसरों के लिए छूट जाएगा। इसलिए हमारा मन उसमें नहीं उलझा रहता। धन्यवाद कि आप स्वयं हमारा स्थिर भाग हैं, जो कभी किसी और के हाथ नहीं जाता।
सुलैमान ने महल बनाए, बाग लगाए, सोना जमा किया, और अंत में लिखा कि सब व्यर्थ है। फिर उसकी नज़र रोटी की थाली पर टिकी: "मनुष्य के लिये खाने-पीने और परिश्रम करते हुए अपने जीव को सुखी रखने से बढ़कर और कुछ भी अच्छा नहीं।" जो तुम्हारे पास आज है, वही परमेश्वर का हाथ है। क्या तुम बड़ी चीज़ों की तलाश में आज की थाली का स्वाद भूल तो नहीं गए?
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