बाइबल व्याख्या

सभोपदेशक 6

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

सुलैमान एक ऐसी विडंबना की ओर उंगली उठाते हैं जो लगभग असहनीय है: कोई व्यक्ति है जिसे परमेश्वर धन, सम्पत्ति और प्रतिष्ठा देते हैं, लेकिन उसे उसका आनंद लेने नहीं दिया जाता, कोई और आकर उसे भोग लेता है। फिर वे और गहरे उतरते हैं, कहते हैं कि सौ पुत्रों वाला और लम्बी आयु जीने वाला व्यक्ति भी अगर तृप्त न हो, तो गर्भ में ही मर जाने वाले बच्चे से बदतर है। अंत में एक तीखा प्रश्न: कौन जानता है कि इस परछाई जैसे जीवन में मनुष्य के लिए क्या भला है?

मर्म

यह अध्याय एक ऐसी सच्चाई खोलता है जिसे हम टालते हैं: पाने और भोगने में फर्क है। परमेश्वर किसी को सब कुछ दे सकते हैं, फिर भी तृप्ति एक अलग वरदान है जो साथ नहीं आता। पद 7 में सुलैमान कहते हैं कि "मनुष्य का सारा परिश्रम उसके पेट के लिये होता है तो भी उसका मन नहीं भरता।" यहाँ बाइबल की मानव-समझ की गहराई है: हमारी असली भूख पेट की नहीं, मन की है, और उसे कोई भी सांसारिक चीज़ भर नहीं सकती। यह पाप के बाद की दुनिया की स्थिति है, जहाँ हाथ भरे रह सकते हैं पर आत्मा खाली रहती है।

समग्र सूत्र

यह खाली मन ही वह जगह है जहाँ मसीह की ज़रूरत सबसे तेज़ महसूस होती है। सुलैमान के पास सब कुछ था, बुद्धि, धन, स्त्रियाँ, प्रतिष्ठा, और फिर भी उन्होंने लिखा कि सब व्यर्थ है। यह "व्यर्थ" पुराने नियम की एक तैयारी है, एक खालीपन जो चिल्लाकर किसी और को बुला रहा है। यूहन्ना 4 में सामरी स्त्री से यीशु कहते हैं कि जो पानी वे देंगे, उसे पीने वाला फिर कभी प्यासा न होगा। सुलैमान का पेट जो भरता नहीं, वही यीशु की रोटी का विपरीत है, "मैं जीवन की रोटी हूँ।" पद 12 का प्रश्न, "मनुष्य को कौन बता सकता है कि उसके बाद सूर्य के नीचे क्या होगा," अपने उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है, और वह उत्तर मसीह के पुनरुत्थान में खुला है। जो सूर्य के नीचे नहीं पाया जा सकता, वह सूर्य के ऊपर से आया।

दर्पण

ईमानदारी से पूछें: क्या आप उन लोगों में से हैं जिन्हें परमेश्वर ने भरपूर दिया है, पर आप उसे भोग नहीं पा रहे? नौकरी है, पर उसमें रस नहीं। बच्चे हैं, पर उनके साथ बैठने का सुख नहीं। घर है, पर वह घर नहीं लगता। यह पद 2 की भयानक विडंबना है, और यह केवल अमीरों की समस्या नहीं। मध्यवर्गीय जीवन भी इसी बीमारी से ग्रस्त है, अगला फ़ोन, अगली छुट्टी, अगली पदोन्नति, और फिर भी मन खाली। सुलैमान आपको झकझोर रहे हैं: अगर तृप्ति स्वयं परमेश्वर से नहीं आती, तो कितना भी जोड़ लो, गड्ढा उतना ही गहरा रहेगा। यह प्रश्न रविवार की प्रार्थना का नहीं, सोमवार की सुबह का है।

मुख्य पात्र

इस अध्याय का मुख्य पात्र वह अनाम व्यक्ति है जिसके पास सब कुछ है और कुछ भी नहीं। सौ पुत्र, हज़ारों साल की आयु, धन, सम्मान, और फिर भी "उसका प्राण प्रसन्न" नहीं। सुलैमान का यह चित्रण आत्मकथात्मक है, वे स्वयं वह व्यक्ति थे। इसीलिए उनकी आवाज़ में कड़वाहट नहीं, थकावट है। यह उस आदमी की आवाज़ है जिसने सब चखा और पाया कि स्वाद नहीं। पद 10 में वे स्वीकार करते हैं कि मनुष्य "उससे जो उससे अधिक शक्तिमान है झगड़ा नहीं कर सकता।" यह हार नहीं, यथार्थ है। जो व्यक्ति यहाँ बोल रहा है, वह अपनी सीमा जान चुका है, और यह जानना ही ज्ञान की शुरुआत है।

विवरण

पद 3 में एक चौंकाने वाली बात है: "अधूरे समय का जन्मा हुआ बच्चा" उस व्यक्ति से उत्तम है जो लम्बी आयु जीता है पर तृप्त नहीं। यह हिब्रू संस्कृति में लगभग निंदनीय कथन है, जहाँ लम्बी आयु और सन्तान परमेश्वर के आशीर्वाद की चरम निशानी थीं। सुलैमान कह रहे हैं: आशीर्वाद के बाहरी चिह्न आशीर्वाद की गारंटी नहीं। जो बच्चा सूर्य कभी नहीं देखता, उसे "अधिक चैन मिला" क्योंकि उसने इस सूर्य के नीचे की व्यर्थता नहीं झेली। यह विवरण मसीह की उस बात की छाया है कि लाभ क्या है यदि मनुष्य सारा जगत पा ले और अपना प्राण खो दे। मात्रा नहीं, गुणवत्ता; लम्बाई नहीं, गहराई।

प्रश्न

अगर परमेश्वर धन देते हैं पर उसे भोगने की क्षमता नहीं देते, तो क्या यह क्रूरता नहीं? सुलैमान इस प्रश्न को खुला छोड़ते हैं, और हमें भी छोड़ना चाहिए। परन्तु एक संकेत है: शायद यह क्रूरता नहीं, दया है। अगर धन में तृप्ति मिल जाती, तो हम कभी परमेश्वर को न खोजते। खालीपन एक घाव है, पर वह घाव ही वह दरवाज़ा है जिससे मसीह भीतर आते हैं। पद 12 का प्रश्न, कि मनुष्य के लिए क्या भला है, केवल वह उत्तर दे सकता है जो मनुष्य से अधिक जानता है। सुलैमान इस उत्तर की केवल प्रतीक्षा कर सकते थे। हम उसे जानते हैं।

चिंतन

*आपके जीवन में कौन सी वह चीज़ है जो परमेश्वर ने दी है पर आप उसे भोग नहीं पा रहे, और

Ecclesiastes में और गहराई से जानें

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Ecclesiastes: An Introduction and Commentary

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Ecclesiastes 6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

सभोपदेशक 6 का क्या अर्थ है?
सुलैमान एक ऐसी विडंबना की ओर उंगली उठाते हैं जो लगभग असहनीय है: कोई व्यक्ति है जिसे परमेश्वर धन, सम्पत्ति और प्रतिष्ठा देते हैं, लेकिन उसे उसका आनंद लेने नहीं दिया जाता, कोई और आकर उसे भोग लेता है। फिर वे और गहरे उतरते हैं, कहते हैं कि सौ पुत्रों वाला और लम्बी आयु जीने वाला व्यक्ति भी अगर तृप्त न हो, तो गर्भ में ही मर जाने वाले बच्चे से बदतर है। अंत में एक तीखा प्रश्न: कौन जानता है कि इस परछाई जैसे जीवन में मनुष्य के
सभोपदेशक 6 किस विषय में है?
यह अध्याय एक ऐसी सच्चाई खोलता है जिसे हम टालते हैं: पाने और भोगने में फर्क है। परमेश्वर किसी को सब कुछ दे सकते हैं, फिर भी तृप्ति एक अलग वरदान है जो साथ नहीं आता। पद 7 में सुलैमान कहते हैं कि "मनुष्य का सारा परिश्रम उसके पेट के लिये होता है तो भी उसका मन नहीं भरता।" यहाँ बाइबल की मानव-समझ की गहराई है: हमारी असली भूख पेट की नहीं, मन की है, और उसे कोई भी सांसारिक चीज़ भर नहीं सकती। यह पाप के बाद की दुनिया की स्थिति है, जहाँ हाथ भरे रह सकते हैं पर आत्मा खाली रहती है।
सभोपदेशक 6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यह खाली मन ही वह जगह है जहाँ मसीह की ज़रूरत सबसे तेज़ महसूस होती है। सुलैमान के पास सब कुछ था, बुद्धि, धन, स्त्रियाँ, प्रतिष्ठा, और फिर भी उन्होंने लिखा कि सब व्यर्थ है। यह "व्यर्थ" पुराने नियम की एक तैयारी है, एक खालीपन जो चिल्लाकर किसी और को बुला रहा है। यूहन्ना 4 में सामरी स्त्री से यीशु कहते हैं कि जो पानी वे देंगे, उसे पीने वाला फिर कभी प्यासा न होगा। सुलैमान का पेट जो भरता नहीं, वही यीशु की रोटी का विपरीत है, "मैं जीवन की रोटी हूँ।" पद 12 का प्रश्न, "मनुष्य को कौन बता सकता है कि उसके बाद सूर्य के नीचे क्या होगा," अपने उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है, और वह उत्तर मसीह के पुनरुत्थान में खुला है। जो सूर्य के नीचे नहीं पाया जा सकता, वह सूर्य के ऊपर से आया।
सभोपदेशक 6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
ईमानदारी से पूछें: क्या आप उन लोगों में से हैं जिन्हें परमेश्वर ने भरपूर दिया है, पर आप उसे भोग नहीं पा रहे? नौकरी है, पर उसमें रस नहीं। बच्चे हैं, पर उनके साथ बैठने का सुख नहीं। घर है, पर वह घर नहीं लगता। यह पद 2 की भयानक विडंबना है, और यह केवल अमीरों की समस्या नहीं। मध्यवर्गीय जीवन भी इसी बीमारी से ग्रस्त है, अगला फ़ोन, अगली छुट्टी, अगली पदोन्नति, और फिर भी मन खाली। सुलैमान आपको झकझोर रहे हैं: अगर तृप्ति स्वयं परमेश्वर से नहीं आती, तो कितना भी जोड़ लो, गड्ढा उतना ही गहरा रहेगा। यह प्रश्न रविवार की प्रार्थना का नहीं, सोमवार की सुबह का है।
सभोपदेशक 6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
इस अध्याय का मुख्य पात्र वह अनाम व्यक्ति है जिसके पास सब कुछ है और कुछ भी नहीं। सौ पुत्र, हज़ारों साल की आयु, धन, सम्मान, और फिर भी "उसका प्राण प्रसन्न" नहीं। सुलैमान का यह चित्रण आत्मकथात्मक है, वे स्वयं वह व्यक्ति थे। इसीलिए उनकी आवाज़ में कड़वाहट नहीं, थकावट है। यह उस आदमी की आवाज़ है जिसने सब चखा और पाया कि स्वाद नहीं। पद 10 में वे स्वीकार करते हैं कि मनुष्य "उससे जो उससे अधिक शक्तिमान है झगड़ा नहीं कर सकता।" यह हार नहीं, यथार्थ है। जो व्यक्ति यहाँ बोल रहा है, वह अपनी सीमा जान चुका है, और यह जानना ही ज्ञान की शुरुआत है।
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Ecclesiastes 6 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 6

चाहे वह दो हजार वर्ष जीवित रहे, परन्तु कुछ सुख न भोगे, तो क्या?" सुलैमान लम्बी उम्र को नहीं, बल्कि बिना स्वाद के जीने को खाली कहता है। तू भी शायद सब कुछ "बाद के लिए" बचा रहा है, रोटी, हँसी, अपनों के साथ बैठना। पर जो आज परमेश्वर के हाथ से मिला है, उसे आज ही ग्रहण कर। कल की गिनती तेरे हाथ में नहीं।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 4

पिता, कुछ ज़िंदगियाँ बिना नाम के आती हैं और अँधेरे में खो जाती हैं, और दुनिया उन्हें याद तक नहीं रखती। पर तू उन्हें जानता है। जो दुख हम किसी को बता नहीं पाते, उसे तेरे सामने रखते हैं। हमें थाम ले, और भरोसा दे कि तेरी नज़र से कोई नहीं छूटता।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

छाया के समान" जीवन बिताने वाले से सभोपदेशक पूछता है कि उसके लिए भला क्या है, और उत्तर नहीं देता। यह चुप्पी क्रूर नहीं, दयालु है। तू अपनी योजनाओं की लंबी सूची पकड़े बैठा है, पर कल का एक दिन भी तेरे हाथ में नहीं। तो आज जो सामने है, वही रोटी, वही चेहरा, वही काम, उसे परमेश्वर के हाथ से लेकर जी। छाया छोटी है, पर वह प्रकाश के कारण ही बनती है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

आँखों से देख लेना मन की चंचलता से उत्तम है: यह भी व्यर्थ और मानो वायु को पकड़ना है।"

जो तेरे हाथ में है, उसे देख। जो नहीं है, उसके पीछे मन दौड़ता रहता है, और थकता ही जाता है। सुलैमान कहता है, यह हवा पकड़ने जैसा है।

आज रुककर सोच: परमेश्वर ने जो दिया है, क्या तूने उसे सच में देखा भी है? या मन कहीं और भटक रहा है, किसी और जीवन के पीछे जो कभी तेरा था ही नहीं?

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