बाइबल व्याख्या

निर्गमन 16:19

बाइबल

पाठ

सुबह की ओस सूख चुकी है, टोकरियाँ भर चुकी हैं, हर डेरे में उतना ही है जितना उस डेरे को चाहिए, न कम न अधिक। लोग अपने तंबुओं की ओर मुड़ने लगे हैं, और तभी मूसा की आवाज़ छावनी पर ठहर जाती है: "कोई इसमें से कुछ सवेरे तक न रख छोड़े।" बस इतना ही। कोई कारण नहीं बताया गया, कोई व्याख्या नहीं। भोजन मिल गया है, पेट भरने का वादा पूरा हुआ है, और उसी क्षण एक आज्ञा आती है जो हाथ को बंद मुट्ठी बनाने से रोकती है। जो मिला है उसे आज ही खाना है; कल के लिए कुछ नहीं बचाना है। यह वाक्य पूरे अध्याय का सबसे असहज मोड़ है, क्योंकि यह भूख का इलाज करने के बाद भूख के डर पर हाथ रखता है।

मर्म

सोचिए उन लोगों के बारे में जिन्होंने चार सौ साल ईंट के भट्ठों में गिनती से जीवन काटा है, जहाँ कल का अर्थ था अनिश्चितता और मालिक की मनमानी। ऐसे लोगों से कहा जा रहा है: भंडार मत बनाओ। यह केवल भोजन की व्यवस्था नहीं, यह हृदय की शिक्षा है। परमेश्वर ने पद 4 में स्वयं कहा था, "इससे मैं उनकी परीक्षा करूँगा", और परीक्षा यह नहीं थी कि वे बटोर पाएँगे या नहीं, बल्कि यह कि वे खाली हाथ सोकर भी परमेश्वर पर भरोसा रख पाएँगे या नहीं। मन्ना को संचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि जो परमेश्वर देते हैं वह वस्तु नहीं, संबंध है। कृपा को गोदाम में नहीं रखा जा सकता; उसे हर सुबह नए सिरे से प्राप्त करना पड़ता है। इसीलिए यह आज्ञा उदारता नहीं, बल्कि निर्भरता सिखाती है, और निर्भरता ही दासों को परमेश्वर की प्रजा बनाती है।

सूत्र

यह एक छोटी आज्ञा है, परन्तु इससे एक लंबी रेखा खिंचती है। चालीस साल तक इस्राएल हर सुबह उठकर वही सीखता रहा: जीवन कमाई से नहीं, दान से चलता है। और जब यीशु मसीह ने अपने शिष्यों को प्रार्थना करना सिखाया, तो उन्होंने महीने भर की नहीं, आज के दिन की रोटी माँगना सिखाया, ठीक उसी लय में जिसमें मन्ना गिरता था। बाद में यूहन्ना 6 में यीशु उन भीड़ों से, जो मन्ना की याद दिलाती हैं, कहते हैं कि सच्ची रोटी वे स्वयं हैं। यह जोड़ बेतुका नहीं है: मन्ना की तरह मसीह को भी संचित नहीं किया जा सकता। पिछले वर्ष का अनुभव, पिछले पुनरुद्धार की गर्मी, पिछले दशक का विश्वास, ये सब कल की टोकरी हैं। उनमें कीड़े पड़ जाते हैं। हर सुबह नए सिरे से आना पड़ता है।

दर्पण

यह आज्ञा हमारे उस हिस्से पर हाथ रखती है जो चुपचाप गिनता रहता है। बैंक की शेष राशि, बचत खाता, बच्चों की पढ़ाई का फंड, वह दराज़ जिसमें आप ज़रूरत से ज़्यादा दवा रखते हैं क्योंकि कमी का डर आपके भीतर बैठा है। ध्यान दें, पाठ बचत की निंदा नहीं करता; परमेश्वर स्वयं छठे दिन दुगुना देते हैं। पाठ उस बचत की निंदा करता है जो परमेश्वर के स्थान पर बैठ जाती है, जो कहती है कि कल मेरे भरोसे है, आपके नहीं। जब हम ईश्वर के प्रबंध से डरते हैं, हम भंडार को अपना ईश्वर बना लेते हैं। पद 20 दिखाता है कि यह रणनीति काम नहीं करती: सुरक्षा जमा करने पर सड़ती है।

आज यह करें: एक चीज़ चुनिए जो आपने "बाद में ज़रूरत पड़ेगी" सोचकर रख दी थी, और आज ही उसे किसी ज़रूरतमंद को दे दीजिए या भेज दीजिए, चाहे एक छोटी राशि हो या वह सामान।

संदर्भ

यह मिस्र से निकलने के बाद दूसरे महीने का पंद्रहवाँ दिन है, ठीक एक महीना उस रात के बाद जब वे फसह खाकर निकले थे। सीन का जंगल एलीम और सीनै के बीच का पथरीला सूखा इलाका है, जहाँ बाज़ार नहीं, खेत नहीं, कोई राजा नहीं जिससे रोटी माँगी जाए। लगभग बीस लाख लोग, या जितने भी, बिना खेती बिना भंडार के चल रहे हैं। मिस्र में उन्हें दास होने के बदले निश्चित राशन मिलता था, इसलिए उनका बुड़बुड़ाना केवल कृतघ्नता नहीं, गहरे असुरक्षा का शब्द है: "माँस की हाँड़ियों के पास बैठकर मनमाना भोजन खाते थे"। स्वतंत्रता का स्वाद अनिश्चित होता है। और इसी अनिश्चितता के बीच परमेश्वर संचय पर रोक लगाते हैं, जो उस समय के हर व्यवहारिक तर्क के विरुद्ध है।

मुख्य पात्र

इस दृश्य में मूसा बोलता है, पर आज्ञा का स्रोत परमेश्वर हैं, और यहाँ उनका चरित्र खुलकर दिखता है। वे बुड़बुड़ाना सुनते हैं और दंड नहीं, भोजन देते हैं; पद 12 में वे शिकायत को बहाना नहीं, प्रार्थना मानते हैं। परंतु वे केवल पेट भरकर संतुष्ट नहीं होते। वे उस प्रजा को गढ़ना चाहते हैं जो दास-मानसिकता से बाहर आए। इसलिए दान के साथ एक सीमा आती है, और सीमा भी कृपा का हिस्सा है। यह वह परमेश्वर है जो हमें आवश्यकता में छोड़ते नहीं, पर हमें आत्मनिर्भरता का भ्रम भी नहीं देते। पद 20 में मूसा का क्रोध इसी चिंता की छाया है: जो लोग रख छोड़ते हैं, वे अपने उद्धारकर्ता का अपमान करते हैं।

अंतर्पाठ

पद 18 की वह पंक्ति, कि जिसके पास अधिक था उसके कुछ अधिक न रह गया और जिसके पास थोड़ा था उसको कुछ घटी न हुई, पौलुस बाद में कुरिन्थ की कलीसिया से चंदा माँगते समय उठाते हैं; उनके लिए मन्ना उदारता का मॉडल है, क्योंकि जहाँ कोई भंडार नहीं करता वहाँ कोई भूखा नहीं रहता। दूसरी ओर यीशु का वह धनी किसान खड़ा है जो कोठार बड़े बनाकर कहता है कि अब वर्षों के लिए प्रबंध हो गया, और उसी रात उसकी आत्मा माँगी जाती है। वह किसान पद 20 का ही आधुनिक चेहरा है। बीच में पद 33 का वह पात्र रखा है, ओमेर भर मन्ना संदूक के आगे, संचय नहीं बल्कि स्मृति, कि परमेश्वर ने खिलाया था।

चिंतन

आपकी ज़िंदगी में वह "टोकरी" कौन सी है जिसे आप कल के डर से भरकर रखते हैं, और यदि वह खाली हो जाए तो आपका विश्वास क्या कहेगा?

मन्ना हर सुबह नया मिलता था, पुराना सड़ जाता था; आपका परमेश्वर के साथ संबंध आज की ताज़ी रोटी पर चल रहा है या दस साल पुरानी बटोरी हुई पूँजी पर?

Exodus में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Exodus

Alec Motyer

Traces how God rescues a people for himself, from slavery to Sinai.

Exodus For You

Tim Chester

An accessible chapter by chapter guide that keeps pointing to Jesus.

Exodus: An Introduction and Commentary

R. Alan Cole

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Exodus

Peter Enns

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

Exodus: Saved for God's Glory

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Exodus 16:19 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

निर्गमन 16:19 का क्या अर्थ है?
सुबह की ओस सूख चुकी है, टोकरियाँ भर चुकी हैं, हर डेरे में उतना ही है जितना उस डेरे को चाहिए, न कम न अधिक। लोग अपने तंबुओं की ओर मुड़ने लगे हैं, और तभी मूसा की आवाज़ छावनी पर ठहर जाती है: "कोई इसमें से कुछ सवेरे तक न रख छोड़े।" बस इतना ही। कोई कारण नहीं बताया गया, कोई व्याख्या नहीं। भोजन मिल गया है, पेट भरने का वादा पूरा हुआ है, और उसी क्षण एक आज्ञा आती है जो हाथ को बंद मुट्ठी बनाने से रोकती है। जो मिला है उसे आज ही खाना है; कल के लिए कुछ नहीं बचाना है। यह वाक्य पूरे अध्याय का सबसे असहज मोड़ है, क्योंकि यह भूख का इलाज करने के बाद भूख के डर पर हाथ रखता है।
निर्गमन 16:19 किस विषय में है?
यह एक छोटी आज्ञा है, परन्तु इससे एक लंबी रेखा खिंचती है। चालीस साल तक इस्राएल हर सुबह उठकर वही सीखता रहा: जीवन कमाई से नहीं, दान से चलता है। और जब यीशु मसीह ने अपने शिष्यों को प्रार्थना करना सिखाया, तो उन्होंने महीने भर की नहीं, आज के दिन की रोटी माँगना सिखाया, ठीक उसी लय में जिसमें मन्ना गिरता था। बाद में यूहन्ना 6 में यीशु उन भीड़ों से, जो मन्ना की याद दिलाती हैं, कहते हैं कि सच्ची रोटी वे स्वयं हैं। यह जोड़ बेतुका नहीं है: मन्ना की तरह मसीह को भी संचित नहीं किया जा सकता। पिछले वर्ष का अनुभव, पिछले पुनरुद्धार की गर्मी, पिछले दशक का विश्वास, ये सब कल की टोकरी हैं। उनमें कीड़े पड़ जाते हैं। हर सुबह नए सिरे से आना पड़ता है।
निर्गमन 16:19 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज यह करें: एक चीज़ चुनिए जो आपने "बाद में ज़रूरत पड़ेगी" सोचकर रख दी थी, और आज ही उसे किसी ज़रूरतमंद को दे दीजिए या भेज दीजिए, चाहे एक छोटी राशि हो या वह सामान।
निर्गमन 16:19 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इस दृश्य में मूसा बोलता है, पर आज्ञा का स्रोत परमेश्वर हैं, और यहाँ उनका चरित्र खुलकर दिखता है। वे बुड़बुड़ाना सुनते हैं और दंड नहीं, भोजन देते हैं; पद 12 में वे शिकायत को बहाना नहीं, प्रार्थना मानते हैं। परंतु वे केवल पेट भरकर संतुष्ट नहीं होते। वे उस प्रजा को गढ़ना चाहते हैं जो दास-मानसिकता से बाहर आए। इसलिए दान के साथ एक सीमा आती है, और सीमा भी कृपा का हिस्सा है। यह वह परमेश्वर है जो हमें आवश्यकता में छोड़ते नहीं, पर हमें आत्मनिर्भरता का भ्रम भी नहीं देते। पद 20 में मूसा का क्रोध इसी चिंता की छाया है: जो लोग रख छोड़ते हैं, वे अपने उद्धारकर्ता का अपमान करते हैं।
निर्गमन 16:19 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपकी ज़िंदगी में वह "टोकरी" कौन सी है जिसे आप कल के डर से भरकर रखते हैं, और यदि वह खाली हो जाए तो आपका विश्वास क्या कहेगा?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Exodus 16 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 26

पिता, धन्यवाद कि आपने छः दिन मन्ना बटोरने की व्यवस्था दी और सातवें दिन विश्राम का उपहार भी। आप मेरी थाली भी भरते हैं और मेरी थकी देह को ठहरने की छुट्टी भी देते हैं। आपके हाथ से मिली रोटी और आराम, दोनों के लिए मेरा मन आभारी है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 28

तुम लोग मेरी आज्ञाओं और व्यवस्था को कब तक नहीं मानोगे?" परमेश्वर यह सातवें दिन पूछता है, जब कुछ लोग मन्ना ढूँढ़ने बाहर निकल गए। रोटी की कमी नहीं थी, छठे दिन दुगना मिल चुका था। कमी भरोसे की थी। आज भी जब मैं आराम नहीं कर पाता, तो सवाल यही है: क्या मुझे यकीन है कि कल का दिया हुआ आज के लिए काफी है?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 35

पिता, तूने उन्हें चालीस साल तक दिन प्रतिदिन खिलाया, जब तक वे ठहरने की जगह तक न पहुँच गए। मेरा रास्ता भी लंबा लगता है और आगे का कुछ साफ नहीं दिखता। मुझे आज की रोटी के लिए धन्यवाद देना सिखा, और भरोसा रखना कि कल भी तू ही देगा।

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