यहेजकेल 28
पाठ
सोर के प्रधान ने अपने मन में कहा, "मैं ईश्वर हूँ, मैं समुद्र के बीच परमेश्वर के आसन पर बैठा हूँ," और परमेश्वर उत्तर देते हैं: तू ईश्वर नहीं, मनुष्य ही है। पहला भाग व्यापार से कमाई हुई बुद्धि और दौलत पर फूले हुए शासक का न्याय है; दूसरा भाग एक विलाप-गीत है जो उसी राजा को अदन की वाटिका के एक चमकते करूब के रूप में चित्रित करता है, जो अपनी सुंदरता के कारण गिरा। अंत में सीदोन पर दंड और इस्राएल के लिए एक वादा: वे अपने देश में निडर बसेंगे।
मर्म
यह अध्याय मनुष्य के सबसे पुराने झूठ को खोलकर रख देता है: कि सफलता हमें ईश्वर बना देती है। ध्यान दीजिए, सोर के राजा पर मूर्तिपूजा या अनैतिकता का आरोप नहीं है। उस पर आरोप है कि उसने बुद्धि से धन कमाया, धन से और बुद्धि बढ़ाई, और फिर "धन के कारण तेरा मन फूल उठा है।" पाप यहाँ अक्षमता नहीं, अति-क्षमता है। परमेश्वर यह नहीं कहते कि उसकी बुद्धि झूठी थी; वे कहते हैं कि वह सचमुच बुद्धिमान था और उसी ने उसे अंधा किया। मनुष्य होना कोई अपमान नहीं, यह सच्चाई है; पर जो मनुष्य अपनी सीमा भूल जाता है, वह अपने ही वैभव की आग में भस्म होता है।
मुख्य सूत्र
अदन की वाटिका, एक चमकता प्राणी, और "मैं परमेश्वर सा हूँ" का दावा: यह कहानी हम पहले पढ़ चुके हैं, और अंत वही है, भूमि पर पटक दिया जाना। बाइबल की पूरी कथा इसी ढलान पर टिकी है: ऊपर चढ़ने की कोशिश नीचे गिराती है। और ठीक यहीं मसीह उल्टा चलते हैं। जो वास्तव में परमेश्वर के स्वरूप में थे, उन्होंने उसे पकड़े रहने की वस्तु न समझा, बल्कि स्वयं को रिक्त किया और मनुष्य बने। सोर का राजा मनुष्य था और ईश्वर होने का ढोंग करता था; यीशु ईश्वर थे और सचमुच मनुष्य बने। इसलिए एक भस्म हुआ और "फिर कभी पाया न जाएगा," जबकि दूसरा ऊँचा किया गया। यही वह सूत्र है जो अध्याय 25 के अंतिम वचनों को भी थामता है: बिखरे हुए लोग इकट्ठे किए जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर स्वयं नीचे उतरते हैं।
दर्पण
सोर का पाप आपके और मेरे जीवन में बड़े दावों से नहीं, छोटे अनुमानों से शुरू होता है। जब आप मीटिंग में यह मान लेते हैं कि आपकी समझ कमरे की सबसे अच्छी समझ है। जब आप बच्चों के भविष्य की योजना इस तरह बनाते हैं मानो परिणाम आपके हाथ में हो। जब बचत खाते का आँकड़ा आपके भीतर एक चुपचाप सुरक्षा पैदा करता है जो प्रार्थना की जगह ले लेता है। ध्यान दीजिए, पाठ "लेन-देन" शब्द को दो बार दोहराता है: अभिमान यहाँ आर्थिक है, वह सौदों में बसता है। जहाँ लाभ बढ़ता है और किसी और की हानि अदृश्य हो जाती है, वहीं कुटिलता पलती है। आज यह कीजिए: अपने बैंक ऐप या बटुए में पिछले महीने का सबसे बड़ा लेन-देन खोलिए, उसे देखते हुए ज़ोर से कहिए, "मैं ईश्वर नहीं, मनुष्य हूँ," और फिर इस पैसे को परमेश्वर के हाथ में सौंपने की एक छोटी प्रार्थना कीजिए।
एक बारीकी
पद 9 का प्रश्न किसी धर्मशास्त्रीय बहस से नहीं, तलवार की नोक से आता है: "तब, क्या तू अपने घात करनेवाले के सामने कहता रहेगा, 'मैं परमेश्वर हूँ?'" यह व्यंग्य नहीं, परीक्षा है। हमारे सारे दावे उस क्षण में तौले जाते हैं जब हम असहाय होते हैं। अस्पताल के बिस्तर पर, नौकरी छूटने के दिन, उस फ़ोन कॉल के बाद जिसने सब बदल दिया। वहाँ पता चलता है कि हमने अपनी पहचान किस पर टिकाई थी। और यहाँ कृपा छिपी है: जो आज स्वेच्छा से कहता है "मैं मनुष्य हूँ," उसे उस दिन यह जबरन सीखना नहीं पड़ेगा। विनम्रता, असल में, समय से पहले सच बोल लेना है।
एक कठिन प्रश्न
पद 15 कहता है, "जिस दिन से तू सिरजा गया, और जिस दिन तक तुझ में कुटिलता न पाई गई, उस समय तक तू अपनी सारी चाल चलन में निर्दोष रहा।" प्रश्न यह है: निर्दोष में कुटिलता आई कहाँ से? पाठ कारण नहीं बताता, केवल क्षण बताता है। परमेश्वर ने उसे सुंदर बनाया, और वही सुंदरता उसके पतन का रास्ता बनी। यह असहज है, क्योंकि इसका अर्थ है कि परमेश्वर के दिए वरदान हमारे सबसे बड़े जोखिम भी हैं: आपकी बुद्धि, आपका आकर्षण, आपकी कार्यक्षमता। बाइबल यहाँ बुराई की उत्पत्ति का दर्शन नहीं देती, वह केवल चेतावनी देती है। मुझे इस खालीपन के साथ जीना सीखना पड़ा है: मैं नहीं जानता कि अच्छाई कैसे सड़ जाती है, पर मैं जानता हूँ कि यह मुझमें भी हो सकता है।
मुख्य पात्र
सोर का राजा एक ऐसा आदमी है जिसे सब कुछ मिला: सौंदर्य, मणि, संगीत, पवित्र पर्वत पर स्थान। और उसका दुखद चरित्र यह है कि वह इनमें से किसी को उपहार के रूप में नहीं देख पाया। "सुन्दरता के कारण तेरा मन फूल उठा था; और वैभव के कारण तेरी बुद्धि बिगड़ गई थी।" भीतर से वह शायद असुरक्षित था, क्योंकि जो लोग सचमुच सुरक्षित होते हैं उन्हें ईश्वर होने का दावा नहीं करना पड़ता। उसके विरुद्ध खड़े परमेश्वर क्रोधी तानाशाह नहीं हैं; गौर कीजिए कि यह अध्याय दंड की घोषणा नहीं, "विलाप का गीत" है। परमेश्वर उसके पतन पर रोते हैं। यही हमारे न्यायी का चेहरा है: वह जो झूठ को सहन नहीं करता, पर झूठे के खो जाने पर शोक मनाता है।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन का कौन सा वरदान, जो सचमुच परमेश्वर का दिया है, धीरे-धीरे आपकी पहचान बनता जा रहा है?
यदि आज आपकी सबसे बड़ी क्षमता छिन जाए, तो आपके पास क्या बचेगा, और क्या वह पर्याप्त है?
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