यहेजकेल 35
पाठ
परमेश्वर यहेजकेल को आज्ञा देते हैं कि वह अपना मुँह सेईर पहाड़, यानी एदोम देश की ओर करके उसके विरुद्ध भविष्यद्वाणी करे। दोष स्पष्ट है: एदोम ने इस्राएल से "युग-युग की शत्रुता" रखी, और जिस दिन यरूशलेम गिरा, उस दिन उसने अपने भाई को तलवार के हवाले कर दिया और उजड़ी हुई भूमि पर अपना दावा ठोंक दिया। दण्ड उसी नाप से लौटता है: जो उजाड़ देखकर आनन्दित हुआ, वही सदा के लिये उजाड़ हो जाएगा, और तब जानेगा कि यहोवा कौन है।
मूल बात
यह अध्याय हमें परमेश्वर के उस पक्ष से मिलाता है जिससे हम कतराते हैं: वे सुनते हैं। "इसे मैंने सुना है" (पद 13) इस पूरे भाषण की धुरी है। एदोम ने जो कहा, वह किसी दरबार में नहीं, बल्कि पहाड़ी रास्तों पर, लूट बाँटते हुए, आपसी हँसी में कहा था। ऐसी बातें इतिहास में दर्ज नहीं होतीं। परमेश्वर कहते हैं, वे दर्ज हुई हैं। यहाँ न्याय का आधार केवल हिंसा नहीं, बल्कि वह रवैया है जिससे हिंसा जन्म लेती है: दूसरे के पतन पर खुशी। और ध्यान दें, परमेश्वर अपने ही अनुशासन में पड़े लोगों की भी रक्षा करते हैं। उन्होंने यहूदा को दण्ड दिया, परन्तु जिसने उस दण्ड को अपना अवसर बनाया, उसे वे छोड़ते नहीं। परमेश्वर का ताड़ना देने का अधिकार किसी और के लिये शिकार का परवाना नहीं बन जाता।
बड़ी कहानी का सूत्र
एदोम एसाव की सन्तान है, याकूब का जुड़वाँ भाई। बाइबल में यह झगड़ा गर्भ से शुरू होता है और यहाँ तक चला आता है: दो भाई, एक ही पिता की आशीष, एक ही भूमि की लालसा। "ये दोनों जातियाँ और ये दोनों देश मेरे होंगे" (पद 10) उस पुरानी भूख की अन्तिम आवाज़ है, भाई की विरासत हथिया लेने की भूख। परमेश्वर की मुक्ति की कहानी इस भूख के विरुद्ध चलती है: विरासत दी जाती है, छीनी नहीं जाती। और यहेजकेल की पुस्तक इसी गिने हुए क्रम में आगे बढ़ती है, क्योंकि अध्याय 36 में वही "इस्राएल के पहाड़" फिर से फलने-फूलने की प्रतिज्ञा पाते हैं। जहाँ एदोम उजाड़ देखता है, वहाँ परमेश्वर पुनर्निर्माण देखते हैं। यही अन्त में क्रूस पर दिखेगा: जो भीड़ मज़ाक करती है, वह अन्तिम शब्द नहीं बोलती।
दर्पण
यह पाठ उस भावना को पकड़ता है जिसे हम कभी स्वीकार नहीं करते: किसी के गिरने पर भीतर उठी हल्की-सी संतुष्टि। वह सहकर्मी जिसका प्रोजेक्ट डूब गया और आपने सहानुभूति के शब्दों के पीछे राहत छिपा ली। वह रिश्तेदार जिसकी गृहस्थी बिखर गई और आपके मन ने कहा, देखा, मैं कहता था। वह कलीसिया या मंडली जिसकी बदनामी की खबर आपने ज़रा तेज़ी से आगे बढ़ा दी। एदोम ने तलवार नहीं उठाई थी, उसने सिर्फ़ दरवाज़ा खुला छोड़ा और ताली बजाई, और परमेश्वर ने उसे हत्या के बराबर गिना। आज यह करें: एक काग़ज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखें जिसके नुकसान से आपको चुपके से अच्छा लगा था, और उस नाम को ज़ोर से बोलकर उसकी भलाई के लिये प्रार्थना करें।
एक बारीकी
पद 10 के अन्त में एक टिप्पणी है जो पूरे अध्याय को खोल देती है: "यद्यपि यहोवा वहाँ था।" एदोम ने नक्शा देखा और खाली ज़मीन गिनी, दो देश, दो जातियाँ, मालिक गायब। उसने जला हुआ मन्दिर देखा और निष्कर्ष निकाला कि देवता हार गया। परन्तु खण्डहर का मतलब अनुपस्थिति नहीं था। परमेश्वर वहीं थे, मलबे के बीच, अपने लोगों के दण्ड में भी उपस्थित। यहेजकेल की पूरी पुस्तक इसी शब्द पर समाप्त होती है, जब नए नगर का नाम रखा जाता है: यहोवा वहाँ है। जो खँडहर आपको परमेश्वर की गैरमौजूदगी का सबूत लगता है, वह असल में उनके मौजूद होने की सबसे कम पहचानी जाने वाली जगह हो सकती है।
पृष्ठभूमि
कल्पना कीजिए: 586 ईसा पूर्व के कुछ वर्ष बाद, बाबेल की नहरों के किनारे बसे निर्वासितों की बस्ती। वहाँ खबरें देर से पहुँचती हैं, और सबसे कड़वी खबर यह थी कि जब बाबेल की सेना ने यरूशलेम तोड़ा, तो दक्षिण से एदोमी ऊपर चढ़ आए, भागते हुओं के रास्ते रोके, बचे-खुचे गाँव लूटे, और नेगेव की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया। एदोम सेईर की लाल बलुआ चट्टानों में बसा था, ऊँचे घाटों और सँकरी घाटियों का देश, व्यापारिक मार्गों पर बैठा हुआ और बाबेल के साथ समझदारी से पेश आने वाला। उसके लिये यरूशलेम का पतन व्यापार का अवसर था। निर्वासितों के लिये वह विश्वासघात था, और भाई का विश्वासघात सबसे गहरा चुभता है।
शास्त्र की गूँज
ओबद्याह की छोटी पुस्तक पूरी तरह इसी विषय पर है, और वहाँ भी दोष वही है: भाई के विपत्ति के दिन तमाशा देखना, फाटक पर खड़े होकर बचे हुओं को पकड़वाना। भजनकार भी उस दिन की चीख याद रखता है जब आवाज़ें उठी थीं, इसे ढा दो, नींव तक गिरा दो। दूसरी ओर, यहेजकेल 36 में जो इस्राएल के पहाड़ों से कहा जाता है, वह सेईर पहाड़ से कहे गए हर वाक्य का उलटा है: शाखाएँ, फल, लौटते हुए लोग, फिर बसे हुए नगर। दोनों अध्याय जानबूझकर आमने-सामने रखे गए हैं, ताकि निर्वासित सुन सकें कि परमेश्वर का अन्तिम इरादा उजाड़ना नहीं, बसाना है। और नया नियम इसी तर्क को हमारे हाथ से लेकर परमेश्वर के हाथ में रख देता है: बदला लेना मेरा काम है, मैं ही बदला दूँगा।
चिंतन
किसकी असफलता की खबर सुनकर मेरे भीतर राहत जागती है, और मैं उस राहत को किस नाम से छिपाता हूँ?
मेरे जीवन का कौन-सा खण्डहर मुझे परमेश्वर की अनुपस्थिति का सबूत लगता है, और क्या मैं यह मानने को तैयार हूँ कि वे वहीं हैं?
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Ezekiel 35 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यहेजकेल 35 का क्या अर्थ है?
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यहेजकेल 35 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
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Ezekiel 35 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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