उत्पत्ति 2:19
पाठ
परमेश्वर मैदान के पशुओं और आकाश के पक्षियों को उसी भूमि से रचते हैं जिससे उन्होंने आदम को रचा था, और फिर वे उन्हें आदम के पास ले आते हैं। ध्यान दीजिए कि वे स्वयं नाम नहीं रखते; वे लाते हैं "कि देखे, कि वह उनका क्या-क्या नाम रखता है।" और जो नाम आदम के मुँह से निकलता है, वह टिक जाता है: "जिस-जिस जीवित प्राणी का जो-जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया।" एक जुलूस, एक मनुष्य, और एक ऐसा परमेश्वर जो प्रतीक्षा करते हैं। सृष्टि का अंतिम शब्द इस बार सृष्टिकर्ता का नहीं, बल्कि मिट्टी से बने उस प्राणी का है जिसके नथनों में अभी-अभी श्वास फूँकी गई थी।
केंद्रीय बात
यहाँ परमेश्वर अपनी सर्वशक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि उसका हस्तांतरण करते हैं। वे कुछ ऐसा सौंपते हैं जो सचमुच का है, वापस लिया नहीं जाने वाला: शब्द की शक्ति। नाम रखना प्राचीन पूर्व में केवल लेबल लगाना नहीं था, यह पहचानना, समझना और उत्तरदायित्व लेना था। जिसे आप नाम देते हैं, उसे आप ध्यान से देखते हैं; जिसे आप ध्यान से देखते हैं, उसके लिए आप जवाबदेह हो जाते हैं। और यह जवाबदेही तीखी है, क्योंकि पशु उसी भूमि से बने हैं जिससे आदम स्वयं। ये उसके रिश्तेदार हैं, उसकी संपत्ति नहीं। अधिकार यहाँ स्वामित्व का पर्याय नहीं, सेवा का रूप है, ठीक जैसे पद 15 में आदम को वाटिका "काम करे और उसकी रखवाली करे" के लिए दी गई थी। परमेश्वर जोखिम उठाकर हमें बोलने देते हैं। इसका अर्थ है: हमारे शब्द मामूली नहीं होते।
सूत्र
पद 19 अकेला खड़ा नहीं है; वह पद 20 की निराशा की ओर बढ़ता है। आदम हर प्राणी को नाम देता है, पूरी सृष्टि उसके शब्द के नीचे व्यवस्थित हो जाती है, और अंत में लिखा है: "परन्तु आदम के लिये कोई ऐसा सहायक न मिला जो उससे मेल खा सके।" अधिकार ने उसका अकेलापन नहीं भरा। यह पहला संकेत है कि नाम देने की शक्ति मनुष्य को पूर्ण नहीं करती; उसे स्वयं भी किसी के द्वारा पहचाना जाना चाहिए। पौलुस मसीह को "अन्तिम आदम" कहते हैं (1 कुरिन्थियों 15:45, जिसे पद 7 के हाशिये में भी दिया गया है), और यही अन्तिम आदम वह करते हैं जो पहला आदम अपने लिए नहीं कर सका: वे अपनी भेड़ों को नाम लेकर बुलाते हैं। ईडन में मनुष्य नाम देता है; सुसमाचार में मनुष्य नाम पाता है।
दर्पण
हम पूरे दिन नाम रखते हैं, बस उन्हें नाम नहीं कहते। दफ्तर में हम किसी सहकर्मी को मन में "आलसी" कर देते हैं, और फिर छह महीने तक उसके हर काम को उसी नाम के चश्मे से देखते हैं। घर में एक बच्चे को "मुश्किल वाला" कह दिया जाता है, और वह बच्चा उस नाम में जीना सीख जाता है। हम अपने शरीर को आईने के सामने नाम देते हैं, आमतौर पर कठोर नाम। हम रिश्तेदारों को "स्वार्थी", विरोधियों को "पाखंडी", और अपनी थकान को "आत्मिक कमज़ोरी" कहते हैं। पद 19 का तीखापन यही है: आदम जो कहता है, वही टिक जाता है। परमेश्वर ने हमारे शब्दों को इतनी शक्ति दी है कि वे किसी के भीतर वर्षों तक चिपके रहते हैं। यह वरदान है और खतरा भी।
आज दस मिनट निकालिए: एक कागज़ पर उस व्यक्ति का नाम लिखिए जिसे आपने मन में कोई लेबल दे दिया है, नीचे वह लेबल भी लिखिए, फिर उसे काट दीजिए और ऊँची आवाज़ में परमेश्वर के सामने उस व्यक्ति के बारे में एक सच्ची, भली बात बोलिए।
अन्य पाठों की गूँज
आदम की नाम देने की शक्ति अध्याय 3 के बाद भी बनी रहती है: वह अपनी पत्नी को "हव्वा" कहता है, यानी पतन के बाद भी शब्द का यह अधिकार छीना नहीं गया, केवल घायल हुआ। यही बात इस वरदान को भयानक बनाती है। दूसरी ओर, यशायाह में परमेश्वर इस्राएल से कहते हैं कि उन्होंने उसे नाम लेकर बुलाया है; वहाँ भूमिकाएँ पलट जाती हैं। जो नाम देने वाला था, वह अब नाम पाने वाला है, और यह उसके लिए मुक्ति है, अपमान नहीं। बाइबल की कहानी नाम देने से शुरू होती है और नए नाम पाने पर खत्म होती है।
संदर्भ
अध्याय 2 सृष्टि को दूसरी बार, नीचे से, धूल की ऊँचाई से बताता है। आसपास की संस्कृतियों की कहानियों में देवता ही सब कुछ नाम देते हैं, और मनुष्य देवताओं की मज़दूरी करने के लिए गढ़ा जाता है, एक थका हुआ नौकर। यहाँ ठीक उलटा है। परमेश्वर पशुओं का जुलूस मनुष्य के सामने ले आते हैं और रुक जाते हैं। प्राचीन पूर्व में नाम रखना राजाओं का काम था; विजेता राजा हारे हुए राजा का नाम बदल देता था। इसलिए पद 19 में आदम एक राजसी कार्य करता है, परंतु वाटिका में, कुदाल हाथ में लिए, अपने ही रिश्तेदारों के बीच। यह ताज है, तलवार नहीं।
प्रश्न
अगर आदम का दिया हुआ हर नाम टिक गया, तो क्या परमेश्वर ने स्वयं को हमारी भाषा से बाँध लिया? पाठ यह नहीं कहता कि परमेश्वर ने कोई नाम सुधारा। और अगला अध्याय दिखाता है कि यही मुँह, जो ठीक-ठीक नाम रख सकता था, सर्प के झूठ के सामने चुप रह गया। परमेश्वर ने हमें ऐसी शक्ति दी जिसका दुरुपयोग निश्चित था। इसका कोई साफ़-सुथरा उत्तर नहीं है; यही प्रेम का जोखिम है। हम केवल इतना जानते हैं कि परमेश्वर ने उस टूटी हुई भाषा से मुँह नहीं मोड़ा, बल्कि अपना वचन शरीर बनाकर उसी के बीच भेज दिया।
चिंतन
आपके किसी शब्द ने किस व्यक्ति पर ऐसा नाम चिपका दिया है जिससे वह अब तक छूट नहीं पाया?
परमेश्वर आपको किस नाम से बुलाते हैं, और आप उसके बजाय किस नाम को सच मान बैठे हैं?
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