उत्पत्ति 40:23
पाठ
फ़िरौन का जन्मदिन बीत चुका है। जैसा यूसुफ ने कहा था, वैसा ही हुआ: पिलानेहारा फिर से राजा के हाथ में कटोरा देने लगा, और पकानेहारा पेड़ पर लटका दिया गया। यूसुफ की बात अक्षरशः सच निकली, उसकी भविष्यवाणी की विश्वसनीयता सिद्ध हो गई। और ठीक उसी क्षण, जब उसका एकमात्र सम्भावित सहारा दरबार में लौट आया है, वचन एक ठंडी, सपाट पंक्ति के साथ अध्याय बन्द कर देता है: "फिर भी पिलानेहारों के प्रधान ने यूसुफ को स्मरण न रखा; परन्तु उसे भूल गया।" दो बार कहा गया, मानो एक बार कहने से चोट कम लगती। उसने याद नहीं रखा, और वह भूल गया। कहानी वहीं रुक जाती है, बिना किसी सांत्वना के।
मर्म
इस एक वाक्य में बाइबल का सबसे गहरा तनाव खुलता है: मनुष्य भूलता है, परमेश्वर स्मरण करते हैं। इब्रानी क्रिया ज़ाखर (स्मरण करना) केवल मन में कुछ आ जाना नहीं है; वाचा की भाषा में इसका अर्थ है किसी के पक्ष में कार्य करने के लिए उठ खड़ा होना। जब उत्पत्ति कहती है कि परमेश्वर ने नूह को स्मरण किया, तो जल घटने लगा। यहाँ वही शब्द नकारात्मक रूप में एक दरबारी पर लगाया गया है, और यही इस पद का धर्मशास्त्रीय वार है: यूसुफ का उद्धार कभी किसी एहसानमन्द आदमी की सिफ़ारिश पर टिका ही नहीं था। अनुग्रह मानवीय कृतज्ञता के बाज़ार से नहीं आता। यदि पिलानेहारा उसी सप्ताह बोल देता, तो यूसुफ एक उपकृत व्यक्ति के रूप में बाहर आता, मिस्र का उद्धारकर्ता बनकर नहीं। भूल जाना यहाँ केवल कृतघ्नता नहीं, यह परमेश्वर के समय का पर्दा है।
सूत्र
ध्यान दीजिए कि यूसुफ ने पिलानेहारे से क्या माँगा था: "मुझे स्मरण करना।" ठीक यही शब्द बाइबल में एक और बार, एक और फाँसी के पास बोले जाते हैं। यूसुफ दो कैदियों के बीच खड़ा है, एक को जीवन सुनाता है और दूसरे को मृत्यु, और स्वयं निर्दोष होते हुए बन्दी रहता है। सदियों बाद दो अपराधियों के बीच एक और निर्दोष लटकाया जाएगा, और उनमें से एक कहेगा, "मुझे स्मरण करना।" अन्तर यही है कि वहाँ कोई भूलता नहीं। यूसुफ ने एक मनुष्य के स्मरण पर दाँव लगाया और हार गया; क्रूस पर लटका वह डाकू एक राजा के स्मरण पर दाँव लगाता है और उसी दिन स्वर्गलोक पाता है। उत्पत्ति 40 का यह खाली, निराश अन्त हमें सिखाता है कि मनुष्य की स्मृति कहाँ टूटती है, ताकि हम जान सकें कि उद्धार किसकी स्मृति पर टिका है।
दर्पण
आपने भी किसी के लिए कुछ किया है जिसका हिसाब केवल आपके मन में दर्ज है। वह सहकर्मी जिसकी परियोजना आपने रातों में सँभाली और जिसकी पदोन्नति के भाषण में आपका नाम नहीं आया। वह रिश्तेदार जिसके अस्पताल के दिनों में आप खड़े रहे और जिसने बाद में जायदाद के बँटवारे में आपको सबसे पीछे रखा। हम सब भीतर एक बहीखाता रखते हैं, और उस बही का असली शीर्षक है: "मेरा भविष्य इन लोगों की याददाश्त पर निर्भर है।" यूसुफ का यह पद उस बही को फाड़ देता है। कृतज्ञता की उम्मीद पाप नहीं है, पर उस पर अपना उद्धार टिका देना मूर्तिपूजा के बहुत पास है। आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसने आपका किया हुआ भुला दिया, और ऊँची आवाज़ में परमेश्वर से कहिए कि आप उस व्यक्ति से बदले की माँग वापस ले रहे हैं, फिर वह कागज़ फाड़ दीजिए।
कठिन प्रश्न
अगला अध्याय इन शब्दों से शुरू होता है कि पूरे दो वर्ष बीत गए। दो वर्ष। यदि परमेश्वर का समय इतना सिद्ध था, तो उन सात सौ रातों की ज़रूरत क्या थी? क्या यूसुफ ने सिफ़ारिश माँगकर कोई गलती की, क्या वह ईश्वर के बजाय मनुष्य पर भरोसा करने का दण्ड था? वचन यह नहीं कहता। वह कहीं नहीं लिखता कि "परन्तु परमेश्वर यूसुफ के साथ थे" इस पद के बाद, जैसा उसने बन्दीगृह में आने पर लिखा था। यहाँ केवल सन्नाटा है, और लेखक जानबूझकर हमें उस सन्नाटे में बैठा देता है। हम बाद से पीछे देखकर अर्थ जोड़ सकते हैं, पर यूसुफ उन दो वर्षों में अर्थ नहीं देख सकता था। विश्वास का सबसे कठिन रूप यही है: बिना व्याख्या के ठहरना, और परमेश्वर की भलाई को प्रमाण मिलने से पहले सच मानना।
पृष्ठभूमि
यूसुफ इस समय लगभग अट्ठाईस वर्ष का है, तेरह वर्षों से गुलाम, पहले पोतीपर के घर में, अब अंगरक्षकों के प्रधान के बन्दीगृह में, एक झूठे आरोप पर। मिस्र में उसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं; वह एक इब्री है, एक चुराया हुआ दास, जैसा वह स्वयं कहता है। दूसरी ओर पिलानेहारा दरबार का अत्यन्त विश्वासपात्र अधिकारी था; वह राजा के प्याले को चखकर जहर से उसकी रक्षा करता था, और इसीलिए फ़िरौन के सबसे निकट खड़ा होता था। जन्मदिन पर क्षमादान देना राजाओं की प्रथा थी, और यह आदमी उसी कृपा से बहाल हुआ। अब सोचिए: जो व्यक्ति अभी-अभी जेल से निकला है, वह फ़िरौन के सामने एक विदेशी दास का नाम क्यों लेगा, वह भी ऐसे दास का जिस पर अपने स्वामी की पत्नी के साथ अपराध का आरोप है? भूलना यहाँ आलस्य नहीं, सुविधा थी।
पहले पाठक
जिन्होंने यह कहानी पहली बार सुनी, वे मिस्र से निकले हुए या निर्वासन से लौट रहे लोग थे, एक ऐसी जाति जो जानती थी कि भुला दिया जाना क्या होता है। उन्होंने चार सौ वर्ष ईंटें बनाईं और आकाश चुप रहा। उनके कानों में यह पद चुभा होगा, क्योंकि यह उनकी अपनी कहानी का छोटा रूप था: एक इब्री, मिस्र में, जिसे कोई याद नहीं करता। पर वे यह भी जानते थे कि निर्गमन 2 में क्या लिखा है, कि परमेश्वर ने उनकी कराहट सुनी और अपनी वाचा को स्मरण किया। इसलिए उनके लिए यह अन्त निराशा का नहीं, प्रतीक्षा का था। जहाँ मनुष्य की स्मृति समाप्त होती है, वहीं से वाचा का परमेश्वर काम शुरू करते हैं, और वे कभी देर से नहीं, केवल हमारी घड़ी से अलग चलते हैं।
चिन्तन के प्रश्न
किस व्यक्ति या किस अवसर पर आपने चुपचाप अपना भविष्य टिका रखा है, और यदि वह दरवाज़ा कभी न खुले तो आपके विश्वास का क्या होगा?
यूसुफ के उन दो मौन वर्षों में परमेश्वर क्या कर रहे थे, और आपके जीवन के वर्तमान "मौन" को आप किस नाम से पुकारना चाहेंगे?
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Genesis 40:23 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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उत्पत्ति 40:23 का क्या अर्थ है?
उत्पत्ति 40:23 किस विषय में है?
उत्पत्ति 40:23 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
उत्पत्ति 40:23 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
उत्पत्ति 40:23 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Genesis 40 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि यूसुफ ने बंदीगृह में अपना दुःख भूलकर उन दोनों पर दृष्टि की और देखा कि वे उदास हैं। आपका धन्यवाद कि आप हमें भी ऐसी आँखें देते हैं जो दूसरों की उदासी पहचानें, और ऐसा मन जो पूछे कि आज तुम्हारा मुँह क्यों उतरा हुआ है।
पिलानेवाले ने सपने में कोई सिंहासन नहीं देखा। उसने बस वही देखा जो वह रोज़ किया करता था: "मैंने दाख लेकर फ़िरौन के कटोरे में निचोड़ा और कटोरे को फ़िरौन के हाथ में दिया।" बहाली अक्सर ऐसी ही दिखती है, अपने छोटे से काम पर लौट आना। पर सोच, उस दिन जब तेरा कटोरा फिर भर जाए, क्या तू उसे याद रखेगा जो अब भी अंधेरे में बैठा है?
कारागार की एक ही रात, दो आदमी, और दोनों को स्वप्न। "एक ही रात में" परमेश्वर वहाँ बोल रहा था जहाँ लोग भूली हुई कोठरी समझते थे। यूसुफ जेल में था, फिर भी अगली सुबह उसने दूसरों के उतरे हुए चेहरे देखे। तेरी अपनी कैद तुझे अंधा न कर दे। परमेश्वर उस रात भी काम कर रहा है जिसे तू व्यर्थ समझता है।
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