उत्पत्ति 5:1
पाठ
एक लंबी सूची शुरू होने से पहले लेखक एक वाक्य में सब कुछ रख देता है: यह आदम के वंश का लिखित लेखा है, और इस वंश की पहली बात कोई नाम या संख्या नहीं, बल्कि यह है कि जब परमेश्वर ने मनुष्य को रचा, तो अपने ही स्वरूप में रचा। इसके तुरंत बाद आगे की पंक्तियाँ जोड़ती हैं कि उन्हें नर और नारी बनाया, आशीष दी, और उनका नाम आदम रखा। यानी अध्याय की शुरुआत कब्रिस्तान की सूची से नहीं, सृष्टिकर्ता के इरादे से होती है। उसके बाद ही वह भारी दोहराव आता है, "तत्पश्चात् वह मर गया", नौ बार, जैसे किसी घंटे की गिनती।
केंद्रीय सत्य
यह वाक्य मृत्यु की सूची के ठीक ऊपर रखा गया है, और यही इसकी ताकत है। अध्याय तीन के बाद हम जानते हैं कि मनुष्य टूट चुका है; अध्याय चार में भाई भाई का खून बहा चुका है। फिर भी परमेश्वर उस स्वरूप को वापस नहीं लेते। पतन ने मनुष्य को बिगाड़ा, मिटाया नहीं। जो आपके सामने बैठा है, चाहे वह कितना ही असफल, बीमार, चिड़चिड़ा या बेकार लगे, वह परमेश्वर की छवि धारण करता है, और यह छवि उसके व्यवहार से नहीं, परमेश्वर के निर्णय से टिकी है। इसीलिए यह पद केवल मनुष्य के बारे में नहीं है; यह परमेश्वर के बारे में है, जो अपनी बनाई चीज़ को छोड़ते नहीं, चाहे वह कितनी ही खराब हो चुकी हो।
जोड़ने वाला सूत्र
ध्यान दीजिए कि यही "स्वरूप" शब्द दो पद बाद फिर लौटता है, पर वहाँ रुख बदल जाता है: आदम से "उसकी समानता में उस ही के स्वरूप के अनुसार" शेत उत्पन्न हुआ। परमेश्वर का स्वरूप अब आदम के स्वरूप से होकर आगे बढ़ता है, यानी वह छवि भी आगे जाती है और वह टूटन भी। यह वंशावली एक ऐसे मनुष्य की प्रतीक्षा में है जो इस दोहरी विरासत को तोड़ सके। मत्ती अपनी पुस्तक ठीक इसी शैली से शुरू करता है, यीशु मसीह की वंशावली, ताकि हम समझें कि यह लंबी कतार किसी अंतहीन कब्रिस्तान में नहीं, एक व्यक्ति में जाकर खुलती है। मसीह में परमेश्वर की छवि धुँधली नहीं, पूरी है; और वह हमें उस छवि में लौटाने आए, न कि केवल हमें क्षमा देकर छोड़ देने।
आईना
अब सीधी बात। आप अपनी कीमत किस चीज़ से नापते हैं? नौकरी में जब कोई और आगे बढ़ा दिया जाता है, आपके भीतर जो चुभन उठती है, वह केवल ईर्ष्या नहीं; वह यह डर है कि शायद मैं सचमुच कम हूँ। शरीर जब ढलने लगता है, जब घुटना दर्द करता है और आईने में आप वह नहीं दिखते जो दस साल पहले थे, तब भीतर एक धीमी आवाज़ कहती है कि आपकी उपयोगिता घट रही है। यह पद उस आवाज़ को झूठा ठहराता है। आपकी गरिमा आपके प्रदर्शन से नहीं, परमेश्वर के हाथ की मुहर से आती है, और वह मुहर आपके सबसे बुरे दिन भी नहीं मिटती।
पर यही आईना दूसरी ओर भी घूमता है। जिस व्यक्ति के बारे में आपने मन ही मन तय कर लिया है कि वह बदल नहीं सकता, वह ससुर, वह पड़ोसी, वह सहकर्मी जिसकी शक्ल देखकर आपका मूड बिगड़ता है, उसके ऊपर भी वही मुहर लगी है। आप उसे नीचा आँककर परमेश्वर के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं।
आज यह कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसे आपने भीतर से लिख दिया है, और उस नाम के आगे लिखिए "परमेश्वर के स्वरूप में", फिर उसे ज़ोर से एक बार पढ़िए।
एक बारीकी
हिन्दी में जो "वंशावली" या "लेखा" है, वह मूल में एक विशेष शब्द है, तोलदोत, जिसका अर्थ है "उत्पत्तियाँ", यानी "इससे आगे क्या निकला"। उत्पत्ति की पूरी किताब इन्हीं तोलदोत वाक्यों से जुड़ी हुई है, जैसे रीढ़ की हड्डियाँ। पर यहाँ कुछ अनोखा है: यह इकलौती जगह है जहाँ लेखक कहता है कि यह लेखा लिखित है, दर्ज है, संभाला हुआ है। सोचिए, मृत्यु की यह सूची किसी के रजिस्टर में रखी गई है। नाम भूले नहीं गए। नौ सौ तीस साल जीकर मर जाने वाला आदमी भी परमेश्वर की स्मृति से नहीं गिरा। आप जिनके अंतिम संस्कार में खड़े थे और जिन्हें दुनिया एक साल में भूल गई, वे भी नहीं गिरे।
पहले सुनने वाले
कल्पना कीजिए उन इस्राएलियों की जो मिस्र से निकले थे, या बाद में बाबुल में बैठे थे। मिस्र में राजा को देवता की छवि कहा जाता था, बाकी सब मज़दूर थे, ईंटें ढोने के लिए। बाबुल में राजा की मूर्ति मंदिर में खड़ी होती थी, और आम आदमी उस मूर्ति के सामने झुकता था। इस पृष्ठभूमि में यह वाक्य लगभग विद्रोह जैसा है: छवि फिरौन की नहीं, हर मनुष्य की है, गुलाम की भी, स्त्री की भी। जिस समाज ने उन्हें कीड़ा समझा था, उसी के बीच परमेश्वर उन्हें बताते हैं कि तुम्हारी पीठ पर चाबुक के निशान हैं, पर तुम्हारे ऊपर मेरा स्वरूप है।
मुख्य पात्र
इस पद का मुख्य पात्र आदम नहीं, परमेश्वर हैं। और उनका व्यवहार ग़ौर करने लायक है। जिस मनुष्य ने उनकी आज्ञा तोड़ी, जिसका बेटा हत्यारा निकला, उस मनुष्य की वंशावली शुरू करते समय परमेश्वर की ओर से कोई शिकायत दर्ज नहीं होती, कोई "देखो मैंने कहा था" नहीं। बस यह याद दिलाना कि मैंने इसे अपने स्वरूप में बनाया था। यह ज़िद है, अच्छे अर्थ में; एक सृष्टिकर्ता की ज़िद जो अपने काम को अधूरा नहीं छोड़ता। और अगली ही पंक्ति कहती है कि "उन्हें आशीष दी"। पतन के बाद भी आशीष वापस नहीं ली गई। यही वह परमेश्वर हैं जो आगे चलकर हनोक के साथ चलेंगे, नूह को बचाएँगे, और अंततः अपने पुत्र को हमारे जैसा बनाकर भेजेंगे।
चिंतन के प्रश्न
पिछले हफ़्ते किस पल में मैंने अपनी कीमत अपने काम, अपनी सफलता या दूसरों की राय से नापी, और उस पल में यह पद मुझसे क्या कहता?
मैं जिस व्यक्ति को सबसे कम आँकता हूँ, अगर मैं सचमुच मानूँ कि उस पर परमेश्वर का स्वरूप है, तो मेरे व्यवहार में कौन सी एक चीज़ इसी सप्ताह बदलनी होगी?
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Genesis 5:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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उत्पत्ति 5:1 का क्या अर्थ है?
उत्पत्ति 5:1 किस विषय में है?
उत्पत्ति 5:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
उत्पत्ति 5:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
उत्पत्ति 5:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
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