बाइबल व्याख्या

मत्ती 16:26

बाइबल

पाठ

यीशु एक हिसाब-किताब का सवाल पूछते हैं, जैसे कोई व्यापारी बही खोलकर बैठा हो: "यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?" कल्पना कीजिए कि सौदा पूरा हो गया, पूरी दुनिया आपके नाम लिख दी गई, और उसी क्षण आप स्वयं को खो बैठे। दूसरा सवाल पहले से भी तीखा है: "या मनुष्य अपने प्राण के बदले में क्या देगा?" यानी अगर वह सौदा हो चुका हो, तो उसे वापस मोड़ने के लिए आपके पास कौन-सी मुद्रा बची है? यह वचन क्रूस उठाने के बुलावे के ठीक बाद आता है, जहाँ प्राण बचाने वाला उसे खोता है और प्रभु के लिए खोने वाला उसे पाता है।

मर्म

यहाँ यीशु नैतिक उपदेश नहीं दे रहे, वे बाज़ार का गणित लगा रहे हैं, और नतीजा यह है कि हर इंसान अपनी कीमत से ज़्यादा महँगा है। ग्रीक शब्द प्सूखे यहाँ "प्राण" है, यानी वह जीवन जो आप जीते हैं और वह स्वयं जो आप हैं, दोनों एक साथ। परमेश्वर के लेखे में यह वस्तु अदल-बदल के योग्य नहीं है; उसका कोई विनिमय मूल्य नहीं, केवल एक स्रष्टा है जिसने उसे दिया। इसीलिए दूसरा सवाल बिना उत्तर के छोड़ दिया गया है: कोई भी वेतन, कोई पदोन्नति, कोई सम्मान, कोई सुरक्षा उस खाली जगह को नहीं भर सकती। और यही वह बिंदु है जहाँ अनुग्रह प्रवेश करता है, क्योंकि जो कीमत हम नहीं चुका सकते, वह यरूशलेम की ओर जाते हुए मसीह स्वयं चुकाने जा रहे हैं।

सूत्र-धारा

"प्राण के बदले में क्या देगा?" यह सवाल यीशु ने हवा में से नहीं उठाया। भजन संहिता 49 में यही शिकायत गूँजती है कि कोई मनुष्य अपने भाई की जान का छुड़ौती-मूल्य परमेश्वर को नहीं चुका सकता; धनी लोग सोना ढेर करते हैं, पर कब्र का दरवाज़ा किसी सिक्के से नहीं खुलता। पूरे पुराने नियम में यह खाई खुली रहती है: छुड़ौती चाहिए, पर मनुष्य के हाथ में देने को कुछ नहीं। और इसी अध्याय में, वचन 21 में, यीशु पहली बार कहते हैं कि उन्हें यरूशलेम जाकर दुःख उठाना और मारा जाना है। यानी जिस मुद्रा की कमी है, वह मसीह अपने शरीर में लेकर चल रहे हैं। इसलिए यह वचन धमकी नहीं, घोषणा की दहलीज़ है: तुम्हारा प्राण इतना महँगा है कि उसे खरीदने परमेश्वर का पुत्र स्वयं आया।

दर्पण

यह वचन आपसे यह नहीं पूछता कि आप बुरे हैं या भले, बल्कि यह कि आप किस चीज़ के बदले अपने आपको दे रहे हैं। वह प्रमोशन जिसके लिए आपने घर पर मौजूद रहना छोड़ दिया, वह प्रतिष्ठा जिसके लिए आपने सच बोलना टाल दिया, वह क़र्ज़ जिसे चुकाने में आपकी नींद, आपका रविवार और आपकी नरमी सब बिक गई। ध्यान दीजिए, यीशु "सारे जगत" कहते हैं, किसी घिनौने पाप का नाम नहीं लेते। सौदा हमेशा शर्मनाक चीज़ों के लिए नहीं होता; अक्सर वह बिल्कुल सम्मानजनक चीज़ों के लिए होता है, और इसीलिए किसी को पता भी नहीं चलता कि कब हस्ताक्षर हो गए। और चूँकि वापसी की कोई मुद्रा नहीं है, यह सवाल आज ही पूछा जाना चाहिए, बाद में नहीं।

आज सोने से पहले एक कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जिसे पाने के लिए इस समय आप सबसे ज़्यादा दे रहे हैं, और उसके नीचे एक वाक्य में लिखिए कि उसकी कीमत में असल में क्या जा रहा है। फिर वह कागज़ हाथ में लेकर प्रभु से ज़ोर से कहिए: यह मेरा प्राण नहीं है, यह आपका है।

प्रश्न

एक बेचैन करने वाली बात यह है कि यीशु यहाँ स्वार्थ को नहीं मिटाते, वे उसे सही दिशा में मोड़ते हैं। "क्या लाभ होगा?" यह लाभ-हानि की भाषा है, और अगले ही वचन में वे कहते हैं कि मनुष्य का पुत्र "हर एक को उसके कामों के अनुसार प्रतिफल देगा।" तो क्या शिष्यता आख़िरकार एक बेहतर निवेश है, अनुग्रह का चोला पहने हुए सौदेबाज़ी? इसका आसान उत्तर नहीं है। इतना कहा जा सकता है कि यीशु उस इच्छा को झूठा नहीं कहते जो जीना चाहती है; वे कहते हैं कि वह इच्छा बहुत छोटी चीज़ों पर टिक गई है। फिर भी यह तनाव बना रहता है कि जो अपना प्राण खोता है वही उसे पाता है, और जो पाने के लिए खोता है वह शायद अभी तक बचा ही रहा है। इस गाँठ को खोलने का काम हमारा नहीं, अनुग्रह का है।

श्रोताओं का चित्र

ये शब्द कैसरिया फिलिप्पी के इलाके में बोले गए, रोमी सत्ता और मूर्तिपूजा के मंदिरों की छाया में। "सारे जगत को प्राप्त करे" उनके लिए मुहावरा नहीं था; रोम ने सचमुच जगत जीत लिया था, और गलील के मछुए हर दिन उस विजय का कर चुकाते थे। "प्राण के बदले" वाक्यांश ग़ुलामों के बाज़ार से आता था, जहाँ आदमी की जान की कीमत सिक्कों में तय होती थी। और क्रूस उन्होंने सड़क किनारे लटके देखे थे, कल्पना में नहीं। इसलिए वचन 24 का बुलावा उनके कानों में रूपक नहीं, धमकी जैसा गिरा होगा। जिस मसीह से वे राज्य, सिंहासन और आज़ादी की उम्मीद कर रहे थे, वही उन्हें सिखा रहा था कि असली सौदा हथियारों का नहीं, प्राण का है।

मुख्य पात्र

यह सवाल पूछने वाला वही व्यक्ति है जो कुछ ही क्षण पहले पतरस को "हे शैतान" कह चुका है, उसी पतरस को जिसे उसने अभी-अभी धन्य कहा था। इस तीखेपन में क्रूरता नहीं, तात्कालिकता है: यीशु जानते हैं कि वे किस ओर चल रहे हैं, और उन्हें किसी ऐसे मित्र की ज़रूरत नहीं जो उन्हें बचाने की पेशकश करे। जो व्यक्ति पूछता है कि प्राण के बदले क्या दिया जा सकता है, वह इसका उत्तर अपने ही जीवन से देने जा रहा है। उनका गणित ठंडा नहीं है; इसमें उस चरवाहे का दर्द है जो देखता है कि लोग अपनी सबसे कीमती चीज़ कौड़ियों में दे रहे हैं। परमेश्वर मनुष्य को उससे कहीं अधिक महँगा आँकते हैं जितना मनुष्य स्वयं को आँकता है।

मनन

पिछले एक साल में आपने चुपचाप कौन-सी कीमत चुकाई है, और आपको कब पता चला कि आप चुका रहे हैं?

अगर आपका प्राण खरीदा नहीं जा सकता, केवल दिया जा सकता है, तो आज आप उसे किसके हाथ में सौंप रहे हैं?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

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The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

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Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

The Message of the Sermon on the Mount

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Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.

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Matthew 16:26 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 16:26 का क्या अर्थ है?
यीशु एक हिसाब-किताब का सवाल पूछते हैं, जैसे कोई व्यापारी बही खोलकर बैठा हो: "यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?" कल्पना कीजिए कि सौदा पूरा हो गया, पूरी दुनिया आपके नाम लिख दी गई, और उसी क्षण आप स्वयं को खो बैठे। दूसरा सवाल पहले से भी तीखा है: "या मनुष्य अपने प्राण के बदले में क्या देगा?
मत्ती 16:26 किस विषय में है?
"प्राण के बदले में क्या देगा?" यह सवाल यीशु ने हवा में से नहीं उठाया। भजन संहिता 49 में यही शिकायत गूँजती है कि कोई मनुष्य अपने भाई की जान का छुड़ौती-मूल्य परमेश्वर को नहीं चुका सकता; धनी लोग सोना ढेर करते हैं, पर कब्र का दरवाज़ा किसी सिक्के से नहीं खुलता। पूरे पुराने नियम में यह खाई खुली रहती है: छुड़ौती चाहिए, पर मनुष्य के हाथ में देने को कुछ नहीं। और इसी अध्याय में, वचन 21 में, यीशु पहली बार कहते हैं कि उन्हें यरूशलेम जाकर दुःख उठाना और मारा जाना है। यानी जिस मुद्रा की कमी है, वह मसीह अपने शरीर में लेकर चल रहे हैं। इसलिए यह वचन धमकी नहीं, घोषणा की दहलीज़ है: तुम्हारा प्राण इतना महँगा है कि उसे खरीदने परमेश्वर का पुत्र स्वयं आया।
मत्ती 16:26 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज सोने से पहले एक कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जिसे पाने के लिए इस समय आप सबसे ज़्यादा दे रहे हैं, और उसके नीचे एक वाक्य में लिखिए कि उसकी कीमत में असल में क्या जा रहा है। फिर वह कागज़ हाथ में लेकर प्रभु से ज़ोर से कहिए: यह मेरा प्राण नहीं है, यह आपका है।
मत्ती 16:26 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
ये शब्द कैसरिया फिलिप्पी के इलाके में बोले गए, रोमी सत्ता और मूर्तिपूजा के मंदिरों की छाया में। "सारे जगत को प्राप्त करे" उनके लिए मुहावरा नहीं था; रोम ने सचमुच जगत जीत लिया था, और गलील के मछुए हर दिन उस विजय का कर चुकाते थे। "प्राण के बदले" वाक्यांश ग़ुलामों के बाज़ार से आता था, जहाँ आदमी की जान की कीमत सिक्कों में तय होती थी। और क्रूस उन्होंने सड़क किनारे लटके देखे थे, कल्पना में नहीं। इसलिए वचन 24 का बुलावा उनके कानों में रूपक नहीं, धमकी जैसा गिरा होगा। जिस मसीह से वे राज्य, सिंहासन और आज़ादी की उम्मीद कर रहे थे, वही उन्हें सिखा रहा था कि असली सौदा हथियारों का नहीं, प्राण का है।
मत्ती 16:26 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछले एक साल में आपने चुपचाप कौन-सी कीमत चुकाई है, और आपको कब पता चला कि आप चुका रहे हैं?
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Matthew 16 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 6

हे प्रभु, मेरे मन को सतर्क रख। छोटी छोटी बुरी बातें, गलत सोच और झूठी शिक्षाएँ चुपके से भीतर आ जाती हैं और सब कुछ बदल देती हैं। मुझे विवेक दे कि पहचान सकूँ क्या मुझे भीतर लेना है और क्या नहीं। तेरी सच्चाई में मुझे थामे रख।

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