इब्रानियों 5
पाठ
लेखक हमें पहले मन्दिर के आँगन में ले जाता है: हर महायाजक "मनुष्यों में से लिया जाता है", लोगों के लिये भेंट और पापबलि चढ़ाने को ठहराया जाता है, और चूँकि वह "आप भी निर्बलता से घिरा है", वह भूले भटकों के साथ नर्मी से पेश आ सकता है; यह पद कोई अपने आप नहीं लेता, हारून की तरह परमेश्वर ही बुलाते हैं। फिर दृश्य बदलता है और मसीह उसी बुलाहट में खड़े दिखाई देते हैं, "मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिये याजक", जिन्होंने अपनी देह के दिनों में आँसुओं और ऊँचे शब्द की पुकार के साथ प्रार्थना की, दुःख उठा-उठाकर आज्ञा माननी सीखी, और सिद्ध बनकर सदाकाल के उद्धार का कारण हो गए। और ठीक जब बात गहरी होने लगती है, लेखक रुककर सुननेवालों को टोकता है: तुम ऊँचा सुनने लगे हो, तुम्हें अब भी दूध चाहिए।
मर्म
इस अध्याय का धड़कता हुआ हृदय वह वाक्य है जिससे धर्मशास्त्र सदियों से असहज रहा है: "पुत्र होने पर भी, उसने दुःख उठा-उठाकर आज्ञा माननी सीखी।" यहाँ कोई पाप से पवित्रता की ओर बढ़ना नहीं है, बल्कि आज्ञाकारिता का उस भट्ठी में से गुज़रना है जहाँ आज्ञा मानने की कीमत असल में चुकानी पड़ती है। परमेश्वर ने हमें दूर से, आकाश से कोई आदेश भेजकर नहीं बचाया; वे हमारी चमड़ी के भीतर उतरे, जहाँ पसीना, भय और आँसू हैं। और यही बात मसीह को वह याजक बनाती है जो हमारी कमज़ोरी पर तिरस्कार से नहीं, नर्मी से झुकते हैं। ध्यान दीजिए, पुराने याजक की योग्यता उसकी निर्बलता थी, और मसीह की योग्यता उनका भोगा हुआ दुःख। उद्धार यहाँ कोई कानूनी लेन-देन भर नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की देन है जो जानता है कि परमेश्वर की इच्छा मानना कैसा लगता है जब वह इच्छा तोड़ डालती है। इसीलिए वे "सदाकाल के उद्धार का कारण" हैं, किसी अस्थायी राहत के नहीं।
सूत्र
पुराने नियम का याजकपन एक ऐसी व्यवस्था थी जो हमेशा अपनी ही कब्र खोदती रही: हर महायाजक को पहले अपने लिये बलि चढ़ानी पड़ती थी, और अंत में हर महायाजक मर जाता था, इसलिए हर पीढ़ी को नया चाहिए था। भजन संहिता 110 की वह पंक्ति, जिसे लेखक यहाँ उठाता है, इसी बन्द गली में एक दरवाज़ा खोलती है: "तू मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिये याजक है।" मलिकिसिदक हारून से सदियों पहले का है, वंशावली के बाहर का, अब्राहम को आशीष देनेवाला। यानी परमेश्वर के मन में एक याजकपन हारून से भी पुराना था और उससे कहीं आगे तक जाता है। मसीह उस वंशावली में नहीं आते जिसे मन्दिर पहचानता था; वे शपथ से आते हैं, "सदा के लिये"। पूरी बाइबल की कहानी यही है कि परमेश्वर स्वयं वह याजक जुटाते हैं जिसे मनुष्य कभी नियुक्त नहीं कर सकता था।
दर्पण
आयत सात में वह वाक्य है जो हमारी प्रार्थना के अनुभव को छूता है: यीशु ने "आँसू बहा-बहाकर" उससे विनती की "जो उसको मृत्यु से बचा सकता था", और "उसकी सुनी गई"। फिर भी क्रूस हटा नहीं। हममें से बहुतों ने ऐसी ही रातें जानी हैं, अस्पताल के गलियारे में, नौकरी छूटने के बाद के महीनों में, उस बच्चे के लिये जो लौटता नहीं। हम चुपचाप मान लेते हैं कि सुना जाना और बच जाना एक ही बात है, और जब बचाव नहीं आता तो हम प्रार्थना को शालीन बना देते हैं, माँगना छोड़कर सिर्फ़ समर्पण की भाषा बोलने लगते हैं। यह पवित्रता नहीं, थकान है। दूसरी ओर आयत बारह हमारी दूसरी नस दबाती है: वर्षों की कलीसियागत उपस्थिति के बाद भी हमें वही परिचित, आरामदेह दूध चाहिए। आज दस मिनट अकेले कमरे में जाइए और ऊँची आवाज़ में, शब्दों को सजाए बिना, परमेश्वर से वह एक बात कहिए जिसे आप महीनों से भीतर दबाए हैं।
संदर्भ
यह पत्र ऐसे विश्वासियों के लिये लिखा गया जो यहूदी परंपरा में पले थे और जिनके लिये मन्दिर, याजक और बलिदान कोई रूपक नहीं, हर साल का ठोस अनुभव थे। वे जानते थे कि प्रायश्चित के दिन महायाजक पहले अपने ही पापों के लिये बलि चढ़ाता है, फिर लोगों के लिये, और यही उसकी शर्मिंदगी उसे लोगों के साथ नर्म बनाती थी। मसीह पर विश्वास करने की कीमत उन्हें सामाजिक बहिष्कार, संपत्ति की हानि और अपने ही परिवारों की नज़रों में गिरने के रूप में चुकानी पड़ी थी। लौट जाने का दबाव व्यावहारिक था: पुरानी व्यवस्था में लौटो, तो सुरक्षा भी मिलेगी और एक दृश्यमान याजक भी। इसी दबाव के बीच लेखक जिद करता है कि उनके पास एक ऐसा याजक है जिसे परमेश्वर ने स्वयं ठहराया, और जो कभी बदला नहीं जाएगा।
एक बारीकी
"भक्ति के कारण उसकी सुनी गई।" यूनानी शब्द यहाँ है εὐλάβεια, यानी वह श्रद्धामय भय जिसमें आदमी परमेश्वर के सामने झुकता है बिना अपनी माँग को झूठा बनाए। ध्यान दीजिए कि लेखक यह नहीं कहता कि प्रार्थना पूरी हुई; वह कहता है कि वह सुनी गई। परमेश्वर ने उन्हें मृत्यु से पहले नहीं बचाया, मृत्यु के पार बचाया। यह छोटा-सा अंतर हमारी पूरी प्रार्थना-समझ को पलट देता है: सुने जाने का प्रमाण परिस्थिति का बदलना नहीं, बल्कि प्रार्थी का उठाया जाना है। और यही अनुभव उन्हें वह करुणा देता है जिसकी बात आयत दो करती है। जो स्वयं अनसुने लगनेवाले क्षणों से गुज़रा है, वही आपकी अनसुनी लगती प्रार्थना के साथ नर्मी से पेश आ सकता है।
पहले सुननेवाले
उन्होंने यह पत्र सुनते हुए संभवतः एक चुभन महसूस की होगी। पहले भाग में सांत्वना: तुम्हारा याजक तुम्हारे आँसुओं को भीतर से जानता है। फिर अचानक फटकार: "समय के विचार से तो तुम्हें गुरु हो जाना चाहिए था।" उस संस्कृति में गुरु बनना सम्मान की बात थी, और यह कहना कि तुम अब भी शिशु हो, सार्वजनिक शर्म थी। पर लेखक उन्हें अपमानित करने नहीं, जगाने के लिये यह कहता है। उसकी शिकायत बुद्धि की नहीं, अभ्यास की है: परिपक्वता उन्हें मिलती है "जिनकी ज्ञानेन्द्रियाँ अभ्यास करते-करते, भले बुरे में भेद करने में निपुण हो गई हैं।" वे सुन रहे थे कि विश्वास कोई जानकारी का भंडार नहीं, बल्कि दबाव में बार-बार सही चुनने से बना हुआ स्वाद है।
मनन के प्रश्न
आपकी कौन-सी प्रार्थना ऐसी है जिसे आप अब सिर्फ़ इसलिए शालीन शब्दों में कहते हैं क्योंकि उत्तर देर से आ रहा है, और उसे ऊँची आवाज़ में कहना आपके लिये कैसा होगा?
पिछले साल किन ठोस परिस्थितियों ने आपको "भले बुरे में भेद" करने का अभ्यास कराया, और कहाँ आपने अभ्यास से बचकर परिचित दूध चुन लिया?
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Hebrews 5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
इब्रानियों 5 का क्या अर्थ है?
इब्रानियों 5 किस विषय में है?
इब्रानियों 5 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इब्रानियों 5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इब्रानियों 5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Hebrews 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
याजक की योग्यता उसकी मजबूती नहीं, उसकी कमज़ोरी थी। "वह अज्ञानियों, और भूले भटकों के साथ नर्मी से व्यवहार कर सकता है, इसलिए कि वह आप भी निर्बलता से घिरा है।" जिस गिरावट पर तू आज शर्मिंदा है, शायद वही तुझे किसी गिरे हुए के पास चुपचाप बैठना सिखाएगी। और जब दिल किसी पर कठोर हो जाए, तो समझ लेना कि हम अपनी ही निर्बलता भूल बैठे हैं।
वह पुत्र तो था, तो भी उसने दुःख उठा उठाकर आज्ञा माननी सीखी।" पुत्र होना दुःख से छूट का प्रमाणपत्र नहीं था। यीशु ने आज्ञाकारिता किताबों से नहीं, गतसमनी के पसीने और आँसुओं से सीखी। तो जब तेरी प्रार्थना का जवाब राहत नहीं, बल्कि एक और कठिन दिन होता है, तब सोच: शायद पिता तुझे छोड़ नहीं रहा, सिखा रहा है।
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