इब्रानियों 1:10
पाठ
लेखक स्तोत्र 102 से एक पंक्ति उठाता है और उसे सीधे पुत्र के मुँह पर नहीं, बल्कि पुत्र के कानों पर रख देता है: "हे प्रभु, आदि में तूने पृथ्वी की नींव डाली, और स्वर्ग तेरे हाथों की कारीगरी है।" यह परमेश्वर का सम्बोधन है जो अब मसीह को कहा जा रहा है। पद 8 और 9 में पुत्र को सिंहासन और राजदण्ड मिला; पद 10 में उसे उससे भी पुरानी चीज़ मिलती है, सृष्टि की नींव। जो अन्तिम दिनों में बोलनेवाला पुत्र है, वही आदि में रचनेवाला हाथ है। और अगले पदों में जो कहा जाएगा, वह इस पद के बिना समझ में नहीं आता: सृष्टि पुराने वस्त्र की तरह घिसेगी, पर यह रचनेवाला बना रहेगा।
मूल बात
यहाँ जो हो रहा है, उसे हल्के में न लें। एक यहूदी लेखक, जो एक ही परमेश्वर की उपासना में पला-बढ़ा है, एक स्तोत्र लेता है जिसमें दुःख में डूबा भक्त सृष्टिकर्ता यहोवा को पुकारता है, और उस पुकार का पता बदलकर यीशु के नाम कर देता है। यह अतिशयोक्ति नहीं, आराधना की भाषा का सचेत विस्तार है। पद 2 पहले ही कह चुका था कि "उसी के द्वारा उसने सारी सृष्टि भी रची है", और पद 10 उसी बात को स्तोत्र के शब्दों में मुहर लगाता है। इसका अर्थ यह है कि उद्धार किसी बाहरी सहायक का काम नहीं। जिस हाथ ने पृथ्वी की नींव डाली, उसी हाथ ने क्रूस की कीलें झेलीं। जो हमें बचाता है, वह हमारा मालिक भी है, और इसलिए बचाने का उसका अधिकार अटल है।
साझा धागा
उत्पत्ति 1:1 से लेकर स्तोत्र 102 तक, सृष्टि करना परमेश्वर की अपनी पहचान थी, किसी और को उधार न दी जानेवाली। इब्रानियों का लेखक उस पहचान को तोड़ता नहीं, फैलाता है: आदि में जो रचनेवाला था, वही अन्तिम दिनों में बोलनेवाला है। इससे उद्धार की पूरी कहानी एक ही हाथ की कहानी बन जाती है। जिसने नींव डाली, वही उसे पापों से धोता है; जिसने स्वर्ग को अपनी कारीगरी बनाया, वही "महामहिमन् के दाहिने जा बैठा" है। मुक्ति इसलिए मरम्मत नहीं, बल्कि रचनेवाले का अपनी ही रचना पर लौटना है। और इसीलिए वह अधूरी नहीं छूट सकती। कारीगर अपने काम को कभी अनजान की तरह नहीं छोड़ता।
दर्पण
यह पद उन जगहों पर चुभता है जहाँ हम अपनी दुनिया को अपने हाथ का काम मानते हैं। जिस नौकरी को आपने बीस साल में खड़ा किया, जिस घर की किश्तें आप चुकाते हैं, जिन बच्चों को आपने पाला, इन सबकी नींव आपने नहीं डाली। यह राहत है और चोट भी। राहत, क्योंकि जो टिकाए हुए है वह आप नहीं हैं। चोट, क्योंकि हम टिकाने वाले बने रहना चाहते हैं। और जब शरीर थकने लगता है, जब माता-पिता बूढ़े होते हैं, जब बचत घटती है, तो पद 11 का "वस्त्र के समान पुराने हो जाएँगे" महज़ कविता नहीं रह जाता।
आज कोई एक चीज़ चुनें जिसे आप अपनी बनाई हुई मानते हैं, और उसे नाम लेकर ऊँची आवाज़ में मसीह को सौंप दें: "यह तेरे हाथों की कारीगरी है, मेरी नहीं।"
अन्तर्पाठ
यूहन्ना 1:3 का हवाला पद 2 पर ही दिया गया है, और वह संगत सुनने लायक है: वहाँ भी वचन के द्वारा सब कुछ रचा गया, और वही वचन देह बनकर हमारे बीच आया। इब्रानियों 1:10 उसी सच को स्तोत्र की प्रार्थना-भाषा में गाता है, यानी सिद्धान्त आराधना बन जाता है। दूसरी तरफ़ स्तोत्र 102 का मूल सन्दर्भ देखिए: वहाँ बोलनेवाला एक टूटा हुआ मनुष्य है जिसके दिन धुएँ की तरह उड़ रहे हैं। उसका सहारा यह था कि सृष्टिकर्ता बना रहता है। इब्रानियों कहता है: वह सहारा एक व्यक्ति है, और अब उसका नाम मालूम है।
कठिन प्रश्न
अगर पुत्र ही सृष्टिकर्ता है, तो पद 9 का "परमेश्वर, तेरे परमेश्वर, ने… तेरा अभिषेक किया" क्या मतलब रखता है? रचनेवाला किसी से अभिषिक्त क्यों होगा? लेखक इस तनाव को सुलझाता नहीं, दोनों वाक्यों को एक साथ खड़ा रहने देता है। यहीं मसीह का रहस्य है: वह अनादि रचनेवाला, और वही आज्ञाकारी, अभिषिक्त, पुरस्कृत पुत्र। हम इसे तर्क की चिकनी सतह नहीं बना सकते, और जो लोग बनाने की कोशिश करते हैं वे आम तौर पर आधा मसीह पाते हैं। यहाँ ईमानदारी यही है कि हम दोनों सच्चाइयों को थामे रहें और झुकें, समझ लेने का दावा किए बिना।
एक बारीकी
"कारीगरी" शब्द पर ठहरिए। स्वर्ग यहाँ कोई विशाल तन्त्र नहीं, बल्कि हाथ से बनाई गई वस्तु है, जैसे बढ़ई की बनाई मेज़ या जुलाहे का बुना कपड़ा। और ठीक अगले पद में वही कपड़ा घिसता है, लपेटा जाता है, बदला जाता है। यानी लेखक जान-बूझकर सृष्टि को एक बनी हुई, पहनी हुई, और एक दिन उतारी जानेवाली चीज़ के रूप में देखता है। यह सृष्टि का अपमान नहीं; यह उसकी सही जगह है। कपड़ा कीमती हो सकता है, पर वह पहननेवाले से बड़ा नहीं होता। और नाज़रत के उस बढ़ई के हाथ, जिनमें कीलें ठुकीं, वही हाथ हैं जिन्होंने यह कारीगरी की।
चिन्तन के प्रश्न
आप अपने जीवन की किस चीज़ को "अपने हाथों की कारीगरी" मानकर जकड़े हुए हैं, और यह पद उस पकड़ के बारे में क्या कहता है?
अगर आपको प्रार्थना में मसीह को सृष्टिकर्ता कहकर पुकारना पड़े, तो आपकी प्रार्थना का लहजा कैसे बदल जाएगा?
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Hebrews 1:10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
इब्रानियों 1:10 का क्या अर्थ है?
इब्रानियों 1:10 किस विषय में है?
इब्रानियों 1:10 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इब्रानियों 1:10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इब्रानियों 1:10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Hebrews 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
परमेश्वर के सब स्वर्गदूत उसे दण्डवत् करें।" सोचो, जो स्वर्गदूत परमेश्वर के सिंहासन के सामने खड़े रहते हैं, वे उस बालक के आगे झुके जो चरनी में लेटा था। जगत ने उसके लिए जगह न रखी, पर स्वर्ग ने उसे उपासना दी। आज तेरा मन किसके आगे झुकता है? जिसे स्वर्गदूत पूजते हैं, क्या वह तेरे दिन में दूसरे स्थान पर खड़ा है?
और स्वर्गदूतों से उतना ही उत्तम ठहरा, जितना उसने उत्तराधिकार में उनसे श्रेष्ठ नाम पाया।" गौर कर, यहाँ ताकत या तेज की तुलना नहीं हो रही, नाम की हो रही है। स्वर्गदूत सेवक हैं, यीशु पुत्र है। और जिस पुत्र के पास यह नाम है, वही तुझे भाई कहने से नहीं शरमाता। सोच, तेरा नाम भी उसी घराने की सूची में लिखा है।
पिता, धन्यवाद कि तेरे पुत्र का सिंहासन युगानुयुग स्थिर है। जब मेरे चारों ओर सब कुछ बदलता और टूटता है, तब यीशु का राज्य नहीं हिलता। धन्यवाद कि उसका राजदण्ड न्याय का राजदण्ड है, इसलिए मैं उसके हाथों में अपने अनसुलझे मामले सौंपकर चैन से सो सकता हूँ।
स्वर्गदूतों के बारे में सोचते ही हम ऊँचाइयों की कल्पना करते हैं, पर लेखक पूछता है, "क्या वे सब सेवा टहल करनेवाली आत्माएँ नहीं, जो उद्धार पाने वालों के लिये सेवा करने को भेजी जाती हैं?" यानी वे भेजे जाते हैं, तेरे लिये। जिस दिन तू सबसे छोटा और भुलाया हुआ महसूस करता है, स्वर्ग तेरी ओर झुका होता है।
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