यशायाह 1:17
पाठ
नगर द्वार पर सुबह की धूल, बैठे हुए बुज़ुर्ग, और एक विधवा जो अपनी बारी की प्रतीक्षा में खड़ी है: यही वह दृश्य है जिसमें यह वचन गिरता है। परमेश्वर मंदिर की बलियों और धूप की चर्चा बंद करके अचानक अदालत की ओर उँगली उठाते हैं। पाँच छोटी आज्ञाएँ, एक के बाद एक, जैसे हथौड़े की चोट: "भलाई करना सीखो; यत्न से न्याय करो, उपद्रवी को सुधारो; अनाथ का न्याय चुकाओ, विधवा का मुकद्दमा लड़ो।" पहले पद में धोने और शुद्ध होने की बात थी, अब उस शुद्धता का ठोस रूप बताया जाता है। पवित्रता कोई भीतरी अनुभूति नहीं, वह एक पता है जहाँ जाकर किसी असहाय व्यक्ति का मामला लड़ा जाता है।
मूल बात
यशायाह के श्रोता धार्मिक लोग थे, कोई नास्तिक नहीं। मंदिर भरा हुआ था, पर्व मनाए जा रहे थे, चर्बी की गंध आँगनों में तैर रही थी। और परमेश्वर कहते हैं कि वे इससे थक चुके हैं। यह पद बताता है कि क्यों: क्योंकि उपासना और अदालत को अलग नहीं किया जा सकता। इस्राएल का परमेश्वर वही है जिसने मिस्र में एक बेसहारा भीड़ की चीख सुनी थी; उनका चरित्र ही यह है कि वे उस ओर झुकते हैं जिसके पास न पैसा है, न पैरवी करने वाला। इसलिए जब न्यायाधीश घूस लेकर अनाथ का मामला ठुकराता है, तो वह केवल कानून नहीं तोड़ रहा, वह परमेश्वर के स्वभाव का खंडन कर रहा है। "भलाई करना सीखो" में जो क्रिया है, वह अभ्यास की भाषा है, जन्मजात गुण की नहीं।
जोड़ने वाला सूत्र
यह पाँच आज्ञाओं की सूची अकेली नहीं खड़ी है। व्यवस्था में बार-बार अनाथ, विधवा और परदेशी का त्रिकोण लौटता है, क्योंकि प्राचीन समाज में इन तीनों के पास ज़मीन का दावा करने वाला कोई पुरुष नहीं था। यशायाह कोई नई नैतिकता नहीं गढ़ रहा, वह वाचा की याद दिला रहा है। और यही सूत्र आगे बढ़ता है: वह न्यायी जो अंततः आता है, वह घूस लेकर नहीं बैठता। यीशु मसीह ने अपनी सेवा की शुरुआत यशायाह के ही शब्दों से की, दरिद्रों को सुसमाचार सुनाने की घोषणा से। परमेश्वर का समाधान यह नहीं था कि वे बाहर से न्याय थोप दें, बल्कि यह कि वे स्वयं उस विधवा की तरफ़ खड़े हो गए, यहाँ तक कि क्रूस पर बेसहारा बनकर। अध्याय का अंत भी यही कहता है: सिय्योन न्याय के द्वारा छुड़ाई जाएगी।
दर्पण
आपके पास शायद कोई अदालत नहीं है, पर निर्णय लेने की जगहें ज़रूर हैं। जब दफ़्तर में किसी कमज़ोर सहकर्मी पर आरोप लगता है और चुप रहना सुरक्षित लगता है, तब आप न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे होते हैं। जब परिवार में किसी विधवा चाची की ज़मीन का मामला उठता है और सब कहते हैं "हमें क्या", तब भी। यह पद हमारी सबसे सभ्य कमज़ोरी को पकड़ता है: हम बुराई नहीं करते, हम बस मामला नहीं उठाते। "मुकद्दमा लड़ो" में एक झगड़ालू शब्द है, वह तटस्थता की अनुमति नहीं देता। धार्मिकता यहाँ जोखिम माँगती है, प्रतिष्ठा का जोखिम, रिश्तों का जोखिम।
आज ही एक नाम लिखिए: कोई ऐसा व्यक्ति जिसके साथ हाल में अन्याय हुआ और आप चुप रहे। उस नाम के नीचे एक वाक्य लिखिए जो आप इस हफ़्ते किसी के सामने बोलेंगे।
एक बारीकी
"भलाई करना सीखो" पर रुकिए। सीखना, यानी न जानना, यानी अभ्यास, गलती, दोहराव। परमेश्वर यह नहीं कहते "भले बनो", जो एक असंभव माँग होती। वे कहते हैं सीखो, जैसे कोई शिल्प सीखा जाता है, जैसे बच्चा चलना सीखता है। यह पद तीसरे पद से जुड़ता है, जहाँ बैल और गदहा अपने मालिक को पहचानते हैं पर इस्राएल नहीं। वहाँ समस्या अज्ञान की थी; यहाँ उपाय शिक्षा का है। और सीखने के लिए विनम्रता चाहिए, यह स्वीकार करना कि हमारी धार्मिकता की समझ टेढ़ी हो चुकी है। एक ऐसा राष्ट्र जो बलिदान की विधियाँ पूरी सटीकता से जानता था, उसे भलाई का क, ख, ग फिर से पढ़ना था।
अन्य वचनों की गूँज
तेईसवाँ पद इसी बात का उल्टा चित्र है: "वे अनाथ का न्याय नहीं करते, और न विधवा का मुकद्दमा अपने पास आने देते हैं।" यही दो शब्द, वही दो लोग, पर क्रिया उलटी। परमेश्वर की आज्ञा और यरूशलेम की वास्तविकता आमने-सामने रखी गई हैं, और अंतर बताता है कि यह उपदेश काल्पनिक नहीं था। दूसरी गूँज पंद्रहवें पद में है: "तुम्हारे हाथ खून से भरे हैं।" वे हाथ प्रार्थना में उठाए जाते हैं, और वही हाथ शोषण करते हैं। इसलिए सत्रहवाँ पद केवल एक नैतिक जोड़ नहीं, बल्कि उन्हीं हाथों की चिकित्सा है: जो हाथ छीनते थे, वे अब किसी का पक्ष लेकर उठें।
कठिन सवाल
अगर परमेश्वर प्रार्थना सुनने से इनकार कर सकते हैं, तो अनुग्रह कहाँ गया? यह पद हमें बेचैन करता है, क्योंकि यह सुनने की शर्त लगाता प्रतीत होता है। ईमानदारी से कहें तो यशायाह इस तनाव को हल नहीं करता। वह अगले ही साँस में कहता है कि लाल रंग के पाप हिम के समान उजले हो जाएँगे, बिना यह बताए कि माँग और क्षमा एक साथ कैसे खड़ी रहती हैं। शायद यही सही है। जो व्यक्ति अनाथ को लूटकर धूप जलाता है, उसके लिए अनुग्रह की बात सुनना केवल एक और चाल बन जाएगी। परमेश्वर पहले हमारा मुँह उस विधवा की ओर घुमाते हैं, और फिर बात करने बैठते हैं।
चिंतन के प्रश्न
पिछले महीने में किस अन्याय के बारे में मैंने जान-बूझकर विस्तार से पूछना टाल दिया, ताकि मुझे कुछ करना न पड़े?
अगर "भलाई करना सीखो" एक अभ्यास है, तो इस समय मैं किस चीज़ में शुरुआती हूँ, और मैं किससे सीख सकता हूँ?
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Isaiah 1:17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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यशायाह 1:17 का क्या अर्थ है?
यशायाह 1:17 किस विषय में है?
यशायाह 1:17 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यशायाह 1:17 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यशायाह 1:17 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Isaiah 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
सुन, मैं अपने बैरियों से बदला लूँगा और अपने शत्रुओं से पलटा लूँगा।" चौंकाने वाली बात यह है कि ये बैरी कोई पराई जाति नहीं, यह उसकी अपनी यरूशलेम है। जिन्हें उसने बेटे कहकर पाला, वही उसके विरोधी बन गए। पर अगली आयत बताती है कि वह मैल जलाने आता है, बच्चे को मिटाने नहीं। परमेश्वर का क्रोध भी शुद्ध करने के लिए है। कहीं तू उस आग से भाग रहा है जो तुझे साफ करने आई है?
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