यशायाह 28:16
पाठ
यरूशलेम के हाकिमों ने अभी-अभी डींग मारी थी कि उन्होंने "मृत्यु से वाचा बाँधी" है और विपत्ति की बाढ़ उनके पास तक नहीं आएगी। इसी के जवाब में परमेश्वर बोलते हैं, और चौंकाने वाली बात यह है कि वे पहले विनाश की घोषणा नहीं करते, बल्कि एक निर्माण की: "देखो, मैंने सिय्योन में नींव का पत्थर रखा है, एक परखा हुआ पत्थर, कोने का अनमोल और अति दृढ़ नींव के योग्य पत्थर।" झूठ की आड़ में छिपे लोगों के सामने परमेश्वर एक असली आश्रय खड़ा करते हैं। और उस पत्थर के साथ एक वादा जुड़ा है जो उस घबराई हुई राजनीति के बिलकुल उलट है: "जो कोई विश्वास रखे वह उतावली न करेगा।"
मूल मर्म
यहाँ परमेश्वर स्वयं को राजमिस्त्री के रूप में दिखाते हैं, और यह केवल एक सुंदर चित्र नहीं है। जो परमेश्वर सृष्टि की नींव डालते हैं, वही इतिहास के भीतर भी नींव डालते हैं; उद्धार कोई तात्कालिक मरम्मत नहीं, एक निर्माण-कार्य है जिसकी योजना वे स्वयं बनाते हैं। ध्यान दीजिए कि यह अनुग्रह न्याय से पहले आता है: पत्थर पद 16 में रखा जाता है, और डोरी और साहुल पद 17 में उठाई जाती है। परमेश्वर पहले बचाव का स्थान देते हैं, फिर झूठे आश्रयों को नापते हैं। मनुष्य की सुरक्षा हमेशा अपनी बनाई हुई होती है, गठबंधन, पैसा, चतुराई, और वह हमेशा जल्दबाज़ी में बनती है। विश्वास का चिह्न यहाँ भावना नहीं, गति है: जो इस नींव पर टिकता है, वह भागता नहीं, घबराकर दौड़ता नहीं, क्योंकि उसके पैरों के नीचे कुछ ऐसा है जो उसने नहीं बनाया।
बड़ी कहानी का सूत्र
इस पत्थर का पीछा पूरे बाइबल में किया जा सकता है, और यह जबरदस्ती खींचा हुआ संबंध नहीं है; नए नियम ने स्वयं यह काम कर दिया। पतरस इसी वचन को लेकर यीशु मसीह की ओर इशारा करते हैं, और पौलुस रोमियों में भी। पर ध्यान देने लायक बात यह है कि सिय्योन में रखा पत्थर पहले मंदिर और दाऊद की वाचा से जुड़ा था, यानी परमेश्वर की उस प्रतिज्ञा से कि वे अपने लोगों के बीच बने रहेंगे। जब वह मंदिर गिरा और वह राजवंश टूटा, तो प्रतिज्ञा नहीं टूटी, क्योंकि नींव परमेश्वर ने रखी थी, इस्राएल ने नहीं। मसीह में वही नींव माँस और लहू बनकर आती है: परखा हुआ पत्थर, जो परीक्षा में, क्रूस तक, टिका रहा।
दर्पण
हम में से अधिकांश लोग "मृत्यु से वाचा" इतने नाटकीय शब्दों में नहीं बाँधते, पर हम उसे बाँधते ज़रूर हैं। बीमा की वह पॉलिसी जिसे हम रात में दोबारा पढ़ते हैं, वह बचत खाता जिस पर मन की शांति टिकी है, वह रिश्ता जिसे हम इसलिए नहीं टूटने देते क्योंकि अकेलापन डरावना है, वह प्रतिष्ठा जिसे दफ्तर में हम रोज़ संभालते हैं। ये सब बुरी चीज़ें नहीं हैं, पर आश्रय के रूप में ये "झूठ की शरण" हैं, और ओले उन्हें बहा ले जाते हैं। घबराहट की पहचान यही है: उतावली। लगातार कुछ न कुछ करते रहना, क्योंकि रुकना असुरक्षित लगता है। आज एक काम कीजिए: जिस एक चीज़ पर आपकी सुरक्षा वास्तव में टिकी है, उसका नाम कागज़ पर लिखिए, और उसके नीचे लिखिए "यह मेरी नींव नहीं है", फिर प्रार्थना में परमेश्वर को वह कागज़ पढ़कर सुनाइए।
प्रसंग
यह अध्याय आठवीं सदी ईसा पूर्व का है, जब अश्शूर का साम्राज्य उत्तर से सब कुछ निगलता चला आ रहा था। सामरिया गिर चुका है या गिरने को है, और यरूशलेम के दरबार में सबसे व्यावहारिक सलाह यह थी: मिस्र के साथ संधि कर लो। यशायाह इस कूटनीति को "मृत्यु से वाचा" कहते हैं, क्योंकि वह उस परमेश्वर को छोड़कर बनाई गई थी जिसने वह शहर दिया था। पद 7 बताता है कि याजक और नबी तक दाखमधु से लड़खड़ा रहे हैं, यानी जिन्हें दिशा दिखानी थी वे स्वयं भटके हुए हैं। इस माहौल में, जहाँ नशा, ठट्ठा और डर एक साथ चल रहे हैं, परमेश्वर निर्माण की भाषा में बोलते हैं। यह अपने आप में एक धक्का है।
कठिन प्रश्न
अगर नींव इतनी दृढ़ है, तो यरूशलेम आगे चलकर गिरा क्यों? मंदिर जला, लोग बंधुआई में गए, और सदियों तक सिय्योन खंडहर रहा। यहाँ कोई आसान उत्तर नहीं है, और पाठ भी नहीं देता। परमेश्वर जो वादा करते हैं वह यह नहीं कि पत्थरें नहीं गिरेंगी, बल्कि यह कि "जो कोई विश्वास रखे वह उतावली न करेगा।" नींव बचाव की गारंटी नहीं, टिकने की जगह है। और यह अंतर कड़वा है, क्योंकि इसका अर्थ है कि विश्वासी भी बाढ़ में भीगता है। जो उसे मिलता है वह बच निकलना नहीं, बल्कि बाढ़ के बीच खड़े रहने का आधार है, और इसी आधार पर मसीह स्वयं क्रूस तक खड़े रहे।
पहले सुननेवाले
वे लोग राजनीति के जानकार थे, मंदिर के पत्थरों को रोज़ देखते थे, और शिलान्यास की रस्म का अर्थ समझते थे: राजा नींव का पत्थर रखता है और उस पर अपना नाम लिखवाता है। जब यशायाह कहते हैं "मैंने सिय्योन में नींव का पत्थर रखा है", तो वे सुनते हैं कि असली राजा कौन है और यह शहर किसका है। इब्रानी में "विश्वास" और "दृढ़ता" एक ही जड़ से निकलते हैं; उनके कानों में विश्वास कोई भावना नहीं थी, बल्कि किसी ठोस चीज़ पर अपना भार डाल देना। उनके लिए यह वचन अपमान भी था और आमंत्रण भी: तुम्हारी संधियाँ ढह जाएँगी, पर यहाँ कुछ है जो नहीं ढहेगा।
मनन
आपके जीवन में "उतावली" कहाँ दिखती है, और वह किस डर से निकल रही है?
अगर परमेश्वर आज आपके जीवन पर डोरी और साहुल लगाएँ, तो कौन सी दीवार टेढ़ी निकलेगी?
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यशायाह 28:16 का क्या अर्थ है?
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पिता, धन्यवाद कि तू न्याय करनेवालों को न्याय करने की आत्मा देता है और जो फाटक पर युद्ध को रोकते हैं उन्हें वीरता देता है। मेरे छोटे बड़े फैसलों में तेरी बुद्धि और संघर्ष की घड़ी में तेरा बल ही मेरा सहारा है। तू ही मुझे थामे रखता है।
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