1 पतरस 2
दृश्य
एक पत्थर पड़ा है, ज़मीन पर, किनारे। राजमिस्त्रियों ने उसे उठाया, देखा, नापा, और फेंक दिया। "बेकार है।" वे आगे बढ़ गए, अपनी दीवार बनाते रहे। पर परमेश्वर उस फेंके हुए पत्थर के पास झुकते हैं और कहते हैं, "यही मेरा कोने का पत्थर है।" यही दृश्य पतरस के मन में है जब वह उन बिखरे हुए विश्वासियों को लिखता है, जो एशिया माइनर के शहरों में परदेशी की तरह जी रहे हैं, जिन्हें उनके पड़ोसी "कुकर्मी" कहकर बदनाम कर रहे हैं। तुम फेंके हुए लगते हो? पतरस कहता है, तुम्हारा प्रभु भी फेंका गया था। और देखो वह अब कहाँ है।
पाठ
बैर, छल, कपट, डाह, बदनामी, ये सब उतार दो, पतरस कहता है, और नए जन्मे बच्चे की तरह शुद्ध दूध की भूख रखो। मसीह के पास आओ, जो जीविता पत्थर है, ताकि तुम भी जीविते पत्थर बनकर एक आत्मिक घर बनो, एक याजकों का समाज। फिर वह विश्वासियों की पहचान बताता है, चुना हुआ वंश, परमेश्वर की निज प्रजा, और उन्हें सिखाता है कि परदेशी की तरह कैसे जीना है, अधिकारियों के प्रति, स्वामियों के प्रति, और अन्याय के प्रति, मसीह के पद-चिन्हों पर चलते हुए।
मर्म
यह अध्याय एक बड़ी उलटफेर पर टिका है। जिसे संसार ने निकम्मा ठहराया, वही परमेश्वर के पास बहुमूल्य है। यह केवल यीशु के बारे में नहीं है, यह उन लोगों के बारे में भी है जो उससे जुड़े हैं। पतरस उन विश्वासियों से कह रहा है जिनके पास न मंदिर था, न याजक, न कोई सामाजिक प्रतिष्ठा, "तुम स्वयं मंदिर हो। तुम स्वयं याजक हो।" यह क्रांतिकारी है। इस्राएल के लिए जो एक विशेष बुलाहट थी, वह अब उन बिखरे हुए, हाशिये पर पड़े मसीहियों की पहचान बन गई है। परमेश्वर का घर अब पत्थर और गारे से नहीं, जीविते लोगों से बनता है, और उसका केंद्रीय पत्थर वह है जिसे दुनिया ने ठुकराया।
सूत्र
पतरस पुराने नियम के तीन पत्थरों को एक साथ रखता है, यशायाह का कोने का पत्थर, भजन का ठुकराया हुआ पत्थर, यशायाह का ठोकर का पत्थर। तीनों मिलकर मसीह की ओर इशारा करते हैं। और फिर अध्याय का अंत यशायाह 53 पर पहुँचता है, वह पीड़ित सेवक जो चुपचाप कष्ट सहता है, जिसकी मार से हम चंगे हुए। पतरस ने यह अपनी आँखों से देखा था, वह प्रांगण में खड़ा था जब यीशु ने गाली सुनकर गाली नहीं दी। इस्राएल की पूरी कहानी, निर्गमन से लेकर "तुम मेरे लिये याजकों का राज्य होगे" (निर्गमन 19), होशे के "जो प्रजा नहीं थी वह प्रजा हुई" तक, अब मसीह में एक नए समुदाय पर उतर आती है।
दर्पण
यह पाठ हमारी उस चाहत को छूता है जो हर इंसान में है, कहीं का होना, किसी की गिनती में आना। पतरस कहता है, तुम्हारी पहचान तुम्हारे बॉस की राय पर नहीं टिकी, न पड़ोसियों की गपशप पर, न इंस्टाग्राम पर, न तुम्हारे बैंक बैलेंस पर। तुम चुना हुआ वंश हो। पर फिर वह तुरन्त पलटता है, अगर तुम सचमुच यह मानते हो, तो अन्याय सहते वक्त बदला मत लो। कठिन मालिक के अधीन रहो। यह आज के कर्मचारी के लिए है जिसे बॉस अपमानित करता है, उस बहू के लिए जिसे सास ताने देती है, उस विश्वासी के लिए जिसे परिवार में मसीह के कारण चुप कराया जाता है। पतरस सस्ती सांत्वना नहीं देता, वह कहता है, यही तुम्हारी बुलाहट है।
प्रश्न
पद 18 पर आकर पैर रुक जाते हैं। "कुटिलों" स्वामियों के भी अधीन रहो? क्या पतरस गुलामी को उचित ठहरा रहा है? क्या वह अन्याय के सामने चुप रहने को कह रहा है? ईमानदार जवाब यह है कि पतरस व्यवस्था बदलने की बात नहीं कर रहा, वह उन लोगों को लिख रहा है जिनके पास व्यवस्था बदलने की कोई शक्ति नहीं थी। पर वह कुछ गहरा कह रहा है, तुम्हारी गरिमा तुम्हारे स्वामी के व्यवहार से नहीं आती। और मसीह ने भी अन्याय को मिटाने के लिए पहले उसे सहा। यह उत्तर पूरा नहीं है। यहाँ रहस्य है, और पतरस उसे मिटाता नहीं।
विवरण
"नए जन्मे बच्चों के समान निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करो।" यह छवि ठहरकर देखने लायक है। एक भूखा शिशु जो रोता है, तड़पता है, कुछ और नहीं जानता। न सभ्यता, न शिष्टाचार, बस भूख। पतरस उन विश्वासियों से जिन्होंने "प्रभु की भलाई का स्वाद चख लिया है" यह कह रहा है, वह पहला स्वाद तुम्हारे अंदर भूख जगाए, न कि तृप्ति। परिपक्व मसीही वह नहीं जो अब भूखा नहीं, बल्कि वह जो और गहरी भूख रखता है।
प्रोफ़ाइल
पतरस के पहले पाठक पोंतुस, गलातिया, कप्पदुकिया के छोटे-छोटे शहरों में बिखरे थे। वे यहूदी और अन्यजाति दोनों थे, ज़्यादातर सामाजिक रूप से कमज़ोर, कुछ गुलाम, कुछ ऐसी पत्नियाँ जिनके पति अविश्वासी थे। उनके पड़ोसी उन पर शक करते थे, क्योंकि वे रोमी देवताओं के त्योहारों में शामिल नहीं होते थे, सम्राट को देवता नहीं मानते थे। "ये लोग समाज तोड़ रहे हैं।" जब उन्होंने सुना, "तुम चुना हुआ वंश
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उसी के मार खाने से तुम चंगे हुए।" पतरस यह बात उन दासों से कह रहा था जो बेकसूर होकर मार खा रहे थे। उनके घाव सह लेने वाला मसीह खुद घायल हुआ, पर उसके घाव से चंगाई बही। तेरे साथ हुए अन्याय के निशान उसे अनजाने नहीं हैं। वह क्रूस पर सिर्फ तेरे पाप ही नहीं, तेरा दर्द भी पहचानता है।
पतरस यह चिट्ठी उन लोगों को लिख रहा था जो अपने ही शहरों में परदेशी जैसे जी रहे थे, ठुकराए हुए, बिखरे हुए। और उन्हीं से वह कहता है, "पर तुम एक चुना हुआ वंश, और राज-पदधारी याजकों का समाज, और पवित्र लोग, और परमेश्वर की निज प्रजा हो।" तेरी पहचान लोगों की राय से नहीं, उसके बुलावे से तय होती है। तू अंधकार से निकाला गया है, अब किसकी ज्योति चमका रहा है?
यदि तुमने प्रभु की भलाई का स्वाद चख लिया है।" पतरस "अगर" कहता है, मानो पूछ रहा हो, क्या सच में चखा है? स्वाद चखना दूर से देखना नहीं, अपने भीतर लेना है। जिस बच्चे ने माँ का दूध चख लिया, वह फिर उसी के लिए रोता है। परमेश्वर की भलाई का एक घूँट तुम्हें और प्यासा बना देता है। आज तुम्हारी लालसा बता रही है कि तुमने कहाँ स्वाद पाया है।
क्योंकि परमेश्वर की इच्छा यह है कि तुम भले काम करने के द्वारा निर्बुद्धि लोगों की अज्ञानता को चुप करा दो।" पतरस उन लोगों को लिख रहा था जिन पर झूठे इलज़ाम लगते थे। उसने सफाई देने को नहीं कहा, भला काम करने को कहा। तुम्हारे बारे में जो गलत कहा गया, उसका सबसे मजबूत जवाब तुम्हारी बहस नहीं, तुम्हारा चुपचाप किया गया भला है।
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