यशायाह 57:15
पाठ
अध्याय के इस मोड़ पर परमेश्वर अपना पता बताते हैं, और वह पता दो जगहों पर है। जो "महान और उत्तम और सदैव स्थिर रहता, और जिसका नाम पवित्र है", वही कहते हैं: "मैं ऊँचे पर और पवित्रस्थान में निवास करता हूँ, और उसके संग भी रहता हूँ, जो खेदित और नम्र हैं।" यानी एक ही परमेश्वर के दो निवास हैं, एक ऊँचाई पर जहाँ कोई पहुँच नहीं सकता, और दूसरा वहाँ जहाँ कोई पहुँचना नहीं चाहता, टूटे हुए और दबे हुए मन में। और वे वहाँ बैठे रहने के लिए नहीं आते, बल्कि इसलिए कि "नम्र लोगों के हृदय और खेदित लोगों के मन को हर्षित करूँ", यानी उन्हें फिर से जीवित करने के लिए। यह वाक्य उन्हीं मूर्तिपूजक, बेवफा लोगों से कहा जा रहा है जिन्हें पिछली आयतों में कड़ी फटकार पड़ी है।
मूल बात
यहाँ पवित्रता की हमारी आम समझ उलट जाती है। हम मानते हैं कि परमेश्वर की पवित्रता का अर्थ है दूरी, कि वे इसलिए ऊँचे हैं कि हमसे अलग रहें। पर यह पद कहता है कि परमेश्वर टूटे हुओं के पास आते हैं इसके बावजूद नहीं, बल्कि इसीलिए कि वे पवित्र हैं। जो नाम "पवित्र" है, वही नाम झुककर बैठने का कारण बनता है। इब्रानी में "खेदित" के पीछे जो शब्द है, दक्का, उसका अर्थ है "चूर-चूर किया हुआ", पत्थर की तरह पीसा हुआ। परमेश्वर उस मलबे को अपना मन्दिर बना लेते हैं। यही अनुग्रह की परिभाषा है: वे योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि टूटन के आधार पर निकट आते हैं, और आकर केवल सांत्वना नहीं देते, नया जीवन फूँकते हैं। यह वाचा का परमेश्वर है, जो अपने विश्वासघाती लोगों को छोड़ नहीं देते।
जोड़ने वाला सूत्र
यशायाह की पुस्तक में परमेश्वर का "ऊँचे पर" होना कोई नई बात नहीं; अध्याय 6 में भविष्यद्वक्ता ने उन्हें ऊँचे सिंहासन पर देखा था और अपने होंठों की अशुद्धता से काँप उठा था। पर यहाँ वही ऊँचाई नीचे झुकती है, और यही झुकाव आगे चलकर एक शरीर धारण कर लेता है। जब पौलुस फिलिप्पियों को लिखता है कि मसीह ने अपने आप को रिक्त किया और दास का रूप लिया, तो वह इसी पद का गद्य-रूप लिख रहा है: पवित्रता जो दूरी नहीं बनाती, बल्कि रास्ता तय करती है। ध्यान दीजिए, आयत 14 में पहले ही आदेश आ चुका है, "राजमार्ग बनाओ, मेरी प्रजा के मार्ग में से हर एक ठोकर दूर करो।" वह राजमार्ग हमारी ओर से ऊपर नहीं जाता; वह परमेश्वर की ओर से नीचे उतरता है। क्रूस उस सड़क का अंतिम छोर है, जहाँ पवित्र परमेश्वर सबसे अधिक "खेदित और नम्र" के बीच जा बैठे।
दर्पण
यह पद उस आदमी के लिए असुविधाजनक है जो सब कुछ सँभाले हुए दिखना चाहता है। हम टूटन को छिपाते हैं: दफ्तर में जहाँ कमजोरी दिखाना खतरनाक लगता है, घर में जहाँ बच्चों के सामने डर मानना अच्छा नहीं लगता, कलीसिया में जहाँ हम गवाही तो देते हैं पर पराजय नहीं बताते। और फिर हम सोचते हैं कि परमेश्वर हमारे सुधरे हुए संस्करण से ही मिलना पसंद करेंगे। यह पद उलटा कहता है। जिस बीमारी को आपने किसी को नहीं बताया, जिस कर्ज़ ने रात की नींद ले ली है, जिस रिश्ते में आप हार चुके हैं, ठीक वही जगह परमेश्वर का चुना हुआ निवासस्थान है। पर शर्त एक है: उसे मानना पड़ेगा, ढाँपना नहीं।
आज ही एक कागज़ पर एक वाक्य में वह बात लिखिए जिसने आपको भीतर से चूर किया है, फिर उसे हाथ में लेकर ज़ोर से कहिए: "प्रभु, आप कहते हैं कि आप यहीं रहते हैं।"
कठिन प्रश्न
अगर परमेश्वर टूटे हुओं के साथ रहते हैं, तो क्या वे लोगों को तोड़ते हैं ताकि पास आ सकें? आयत 17 इस प्रश्न को टालने नहीं देती: "मैंने क्रोधित होकर उसको दुःख दिया था, और क्रोध के मारे उससे मुँह छिपाया था।" यहाँ चूर होना संयोग नहीं, न्याय का परिणाम है। पर उसी साँस में आयत 18 कहती है, "तो भी अब उसको चंगा करूँगा।" पाठ यह नहीं सिखाता कि हर पीड़ा परमेश्वर की छड़ी है; यशायाह 53 का दुःखी सेवक निर्दोष है, और अध्याय 57 की पहली आयत में धर्मी जन बिना कारण नाश होता है। इसलिए हमें दो सच एक साथ पकड़ने पड़ते हैं: कुछ टूटन हमारे अपने रास्तों का फल है, और कुछ का कारण हमें कभी नहीं बताया जाएगा। यह पद कारण की व्याख्या नहीं देता, केवल यह वादा देता है कि परमेश्वर मलबे में मिलेंगे। यह कम है, और यही सब कुछ है।
पहले सुननेवाले
ये शब्द उन लोगों तक पहुँचे जिनका मन्दिर या तो खंडहर था या समझौते से भरा। उनके कानों में "पवित्रस्थान" शब्द चोट करता होगा, क्योंकि जिस इमारत में परमेश्वर का नाम बसता था, वह उजड़ चुकी थी, और वे बाबेल के देवताओं और "हरे वृक्षों के तले" की पूजा के बीच अपनी पहचान खो चुके थे। उन्हें लगता था कि परमेश्वर चुप हैं, और आयत 11 में वे इसी चुप्पी को निर्भयता में बदल चुके हैं। ऐसे लोगों को यह सुनना सुन्न कर देने वाला रहा होगा: परमेश्वर का पता बदला नहीं, बस दो हो गया, और दूसरा पता उनके अपने कुचले हुए मन में है। निर्वासन में जिनके पास न मन्दिर था, न राजा, न बलिदान, उनके पास फिर भी एक जगह बची थी जहाँ परमेश्वर आना चाहते थे।
अन्य वचनों की गूँज
यशायाह स्वयं इस विचार को पुस्तक के अंत तक ले जाता है। अध्याय 66 में परमेश्वर कहते हैं कि स्वर्ग उनका सिंहासन और पृथ्वी उनके पाँवों की चौकी है, तो फिर मनुष्य उनके लिए कैसा घर बनाएगा; और वे उसी की ओर दृष्टि करते हैं जो दीन और खेदित मन का है और उनके वचन से काँपता है। यानी 57:15 कोई अकेला वाक्य नहीं, बल्कि पूरी पुस्तक का निष्कर्ष है: मन्दिर की जगह मनुष्य का मन। इसी अध्याय की आयत 19 भी आगे तक गूँजती है, "जो दूर और जो निकट हैं, दोनों को पूरी शान्ति मिले", और नया नियम इसे यहूदी और अन्यजाति दोनों पर लागू करता है। जो परमेश्वर टूटे हुओं के पास उतरते हैं, वही अंत में दूर वालों को भी घर ले आते हैं।
चिंतन
आप अपनी टूटन का कौन-सा हिस्सा परमेश्वर से भी "सँभाला हुआ" दिखाने की कोशिश करते हैं, और क्यों?
अगर परमेश्वर का दूसरा निवास चूर हुए मन में है, तो आपके आसपास कौन-सा व्यक्ति इस समय उनका पता है, और आप इस सप्ताह वहाँ कैसे पहुँचेंगे?
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Isaiah 57:15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यशायाह 57:15 का क्या अर्थ है?
यशायाह 57:15 किस विषय में है?
यशायाह 57:15 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यशायाह 57:15 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यशायाह 57:15 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Isaiah 57 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यशायाह 57:17 में परमेश्वर कहते हैं, "उसके लोभ के पाप के कारण मैं क्रोधित हुआ, मैंने उसे मारा, मैंने क्रोध में अपना मुँह छिपाया; परन्तु वह पीछे हटकर अपने मनमाने मार्ग पर चलता रहा।"
सोचिए, परमेश्वर ने ताड़ना दी, फिर भी इस्राएल अपनी ही ज़िद पर चलता रहा। कभी-कभी हम भी यही करते हैं, दुख आता है, पर हम रुककर सोचते नहीं कि परमेश्वर क्या कहना चाहते हैं। क्या आज कोई ऐसी चोट है जिसे आप अनसुना कर रहे हैं?
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