लैव्यव्यवस्था 22
पाठ
लैव्यव्यवस्था 22 दो मोर्चों पर पवित्रता की माँग करता है: एक ओर याजकों की देह और जीवन-स्थिति, दूसरी ओर वेदी पर लाए जाने वाले पशुओं की निर्दोषता। जो अशुद्ध है वह पवित्र वस्तुओं को छू नहीं सकता, और जो दोषयुक्त है वह परमेश्वर के सामने चढ़ाया नहीं जा सकता। अध्याय बार-बार एक ही टेक पर लौटता है: "मैं यहोवा हूँ, तुम्हारा पवित्र करनेवाला।"
मर्म
इस अध्याय की धुरी वचन 32 में है: "मैं इस्राएलियों के बीच अवश्य ही पवित्र माना जाऊँगा।" परमेश्वर की पवित्रता कोई अमूर्त गुण नहीं, वह एक ऐसी उपस्थिति है जो अपने चारों ओर एक क्षेत्र बनाती है, और उस क्षेत्र में जो कुछ भी आता है उसे बदलना पड़ता है। याजक भी अपनी मर्जी से पवित्र वस्तु नहीं खा सकते; अंधा पशु भी वेदी पर स्वीकार नहीं। यहाँ धर्म का वह सस्ता रूप ध्वस्त होता है जिसमें हम सोचते हैं कि परमेश्वर हमारे बचे-खुचे को खुशी से ले लेंगे। पवित्रता माँग करती है, क्योंकि परमेश्वर स्वयं वास्तविक हैं।
सूत्र
निर्दोष बलिदान की माँग पूरे शास्त्र में एक ही दिशा में बहती है। मलाकी 1:8 में परमेश्वर उन्हीं इस्राएलियों को झिड़कते हैं जो अंधे और लँगड़े पशु चढ़ा रहे थे, "क्या तू उसे अपने हाकिम को भेंट कर।" फिर 1 पतरस 1:19 आता है, जहाँ मसीह को "निर्दोष और निष्कलंक मेम्ने" कहा गया है। लैव्यव्यवस्था 22 का हर वचन जो शारीरिक दोष गिनाता है, वह उस एक व्यक्ति की ओर इशारा करता है जिसमें न कोई कलंक था, न कोई छिपा हुआ दोष। बलिदान की व्यवस्था इसलिए इतनी सख्त थी क्योंकि वह एक असली, अंतिम बलिदान की छाया थी। छाया धुँधली नहीं हो सकती थी, वरना असली की पहचान खो जाती।
आइना
हम पढ़ते हैं "दोषयुक्त पशु मत चढ़ाओ" और सोचते हैं यह हमारा विषय नहीं। पर सोचिए: हम परमेश्वर को क्या देते हैं? दिन का बचा हुआ आखिरी थका हुआ आधा घंटा, वेतन का वह हिस्सा जो कहीं और खर्च नहीं हो सका, वह ध्यान जो टीवी और फोन के बीच में से बचा। यह अंधे और लूले पशु का ही आधुनिक रूप है। अध्याय पूछता है, क्या तुम अपने मालिक को भी ऐसा ही देते हो? और याजकों के लिए जो नियम हैं, वे उन सबके लिए हैं जो आज परमेश्वर की सेवा में हैं: छोटे समूह के अगुवे, माता-पिता जो बच्चों को शिक्षा देते हैं, कलीसिया में सेवा करने वाले। जो पवित्र को छूता है, वह लापरवाह नहीं रह सकता।
एक विवरण
वचन 27-28 पर रुकिए। नवजात पशु सात दिन तक अपनी माँ के साथ रहे, और माँ-बच्चे को एक ही दिन बलि न करना। बलिदान की इस पूरी कठोर व्यवस्था के बीच में यह अजीब कोमलता कहाँ से आई? यह वही परमेश्वर हैं जो व्यवस्था के बीच भी सृष्टि के प्राकृतिक बंधनों का सम्मान करते हैं। एक जानवर भी माँ की गोद के बिना नहीं मारा जाएगा। पवित्रता और करुणा यहाँ एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। जो परमेश्वर निर्दोष बलिदान माँगते हैं, वही परमेश्वर बछड़े को उसकी माँ के दूध का पहला हफ्ता देते हैं। यह छोटा सा वचन उस पूरी छवि को बदल देता है जो हम "पुराने नियम के कठोर परमेश्वर" के बारे में मन में रखते हैं।
अंतर्पाठ
यशायाह 53:7 में वह "मेम्ना जो घात होने को ले जाया जाता है" इसी अध्याय की भाषा से निकला है, वहीं "निर्दोष" शब्द गूँजता है। इब्रानियों 9:14 सीधे कहता है कि मसीह ने "अपने आप को निष्कलंक परमेश्वर के सामने चढ़ाया।" पर एक विरोधाभास भी देखिए: लैव्यव्यवस्था 22:25 कहता है कि परदेशी से लिया दोषयुक्त पशु ग्रहण न होगा, फिर भी मरकुस 12:33 में शास्त्री कहता है कि "प्रेम रखना सब होमबलियों से बढ़कर है," और यीशु उसकी प्रशंसा करते हैं। बलिदान की व्यवस्था अपने आप में अंतिम नहीं थी, वह किसी बड़ी चीज़ की ओर इशारा करती थी। और मलाकी 1 वापस बुलाइए: जो लोग सोचते थे कि परमेश्वर को कुछ भी चलेगा, उनके लिए यह अध्याय आज भी उत्तर है।
मुख्य पात्र
पूरे अध्याय में एक ही आवाज़ बोलती है, और वह सात बार अपना नाम दोहराती है: "मैं यहोवा हूँ।" यह दोहराव संयोग नहीं। परमेश्वर अपने बारे में यहाँ कुछ प्रकट कर रहे हैं जिसे हम आसानी से भूल जाते हैं: वे कोई अवधारणा नहीं, वे एक व्यक्ति हैं जिसका एक नाम है, एक चरित्र है, और उस चरित्र में एक अनम्य पवित्रता है। पर उसी आवाज़ में करुणा भी है, "जो तुम को मिस्र देश से निकाल लाया।" पवित्रता की माँग करने वाले वही हैं जो छुड़ाने वाले भी हैं। इस्राएल की पवित्रता उनकी अपनी उपलब्धि नहीं, वह उस मुक्ति का उत्तर है जो पहले ही मिल चुकी। यही क्रम आज भी है: पहले अनुग्रह, फिर उसका प्रत्युत्तर।
चिंतन
*मैं परमेश्वर को अपने जीवन का कौन-सा "अंधा या लूला" पशु चढ़ा रहा हूँ, यानी वह हिस्सा जो कहीं और स्वीकार न
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Leviticus 22 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Leviticus 22 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हे प्रभु, तू पवित्र है और तेरी सेवा भी पवित्रता माँगती है। मेरे जीवन में जो भी अशुद्धता है, चाहे मन की हो या तन की, उसे तू प्रकट कर और शुद्ध कर। मैं तेरे पास आना चाहता हूँ, पर बिना खुद को तेरे सामने खोले नहीं। मुझे साफ़ हृदय दे।
हे प्रभु, तू जानता है कि मेरे भीतर कई कमियाँ हैं, कई टूटी हुई जगहें हैं जिन्हें मैं तेरे सामने लाने से डरता हूँ। पर तू मुझे सिखा रहा है कि तू पूर्णता चाहता है, और वह पूर्णता तू स्वयं मसीह में मुझे देता है। मुझे स्वीकार कर, और अपने अनुग्रह से मुझे नया बना।
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