यशायाह 6
पाठ
उज्जियाह की मृत्यु के वर्ष, जब यहूदा का सिंहासन खाली हुआ, यशायाह ने एक और सिंहासन देखा जो कभी खाली नहीं होता: "मैंने प्रभु को बहुत ही ऊँचे सिंहासन पर विराजमान देखा।" साराप पुकारते हैं कि परमेश्वर पवित्र, पवित्र, पवित्र है; भवन धुएँ से भर जाता है; और यशायाह टूट जाता है, क्योंकि वह अशुद्ध होंठवाला मनुष्य है। एक जलता हुआ अंगारा वेदी से उठाकर उसके मुँह से छुआया जाता है, पाप क्षमा होता है, और तब वह आवाज़ सुनता है: "मैं किसको भेजूँ?" उसका उत्तर, "मुझे भेज," उसे एक ऐसे संदेश की ओर भेजता है जो लोगों को कठोर करेगा, जब तक देश उजाड़ न हो जाए, और तब भी एक ठूँठ बचा रहेगा।
मर्म
यह अध्याय दिखाता है कि पवित्रता कोई नैतिक विशेषण नहीं, बल्कि वह आग है जिसके सामने मनुष्य टिक नहीं सकता। ध्यान दें कि यशायाह अपने पाप की सूची नहीं गिनाता; वह बस अपने अस्तित्व की सच्चाई कहता है, कि उसके होंठ अशुद्ध हैं और वह अशुद्ध होंठवालों के बीच रहता है। पाप यहाँ व्यक्तिगत भी है और सामूहिक भी। और निर्णायक बात यह है: शुद्धिकरण यशायाह की तरफ़ से नहीं आता। वह न प्रार्थना करता है, न प्रायश्चित्त चढ़ाता है। स्वर्ग से एक साराप उड़कर आता है, वेदी से अंगारा लेकर। अनुग्रह हमेशा ऊपर से नीचे की ओर उड़ता है। और उसी क्षण के बाद, तभी, बुलाहट आती है। सेवा क्षमा का फल है, उसकी शर्त नहीं।
सूत्र
यूहन्ना अपने सुसमाचार में एक चौंकाने वाली टिप्पणी करता है: यशायाह ने उसकी महिमा देखी और उसके विषय में बोला, और वह "उसकी" महिमा यीशु की महिमा है। यानी वह जो ऊँचे सिंहासन पर विराजमान था, यूहन्ना के अनुसार, वही है जो बाद में एक क्रूस पर "ऊँचे" उठाया गया। यह जोड़ आकस्मिक नहीं। यशायाह 6 में उद्धार का पूरा ढाँचा पहले से मौजूद है: पवित्र परमेश्वर, नाश होता मनुष्य, वेदी से आती हुई अग्नि, और छुए जाने पर मिली क्षमा। मसीह में वह वेदी और वह बलिदान एक हो जाते हैं। जो आग यशायाह के होंठों को छूकर शुद्ध करती है, वही आग गोलगोथा पर स्वयं परमेश्वर के पुत्र को छूती है, ताकि हमें भस्म न करे।
दर्पण
आप शायद उस बिंदु को जानते हैं जहाँ यशायाह खड़ा है: वह क्षण जब कोई सुरक्षा-स्तंभ गिरता है और आप समझते हैं कि आप उस पर कितना टिके हुए थे। एक नौकरी जो चली गई, एक नेता जो निराश कर गया, एक शरीर जो अब वैसा नहीं चलता। उज्जियाह की मृत्यु ऐसा ही वर्ष था। ध्यान दें कि दर्शन तब आता है, खालीपन के वर्ष में। और ध्यान दें कि यशायाह की पहली प्रतिक्रिया उत्साह नहीं, बल्कि "हाय! हाय! मैं नाश हुआ" है। हम अक्सर परमेश्वर की उपस्थिति को आराम की तरह चाहते हैं। परन्तु जो वास्तव में उसके निकट आता है, वह पहले अपने बारे में सच सुनता है। जब तक आपने वह "हाय" नहीं कहा, आपका "मुझे भेज" शायद केवल आत्मविश्वास है।
विवरण
साराप शब्द का अर्थ ही है "जलनेवाले।" ये चमकते प्राणी अपने मुँह और पाँव ढाँपे हुए हैं, यानी वे भी उस पवित्रता के सामने पूरी तरह खुले खड़े नहीं हो सकते। और फिर इनमें से एक "हाथ में अंगारा लिए हुए" यशायाह के पास आता है। वह अंगारा हवा से नहीं आया; वह "वेदी पर से" उठाया गया, उस जगह से जहाँ बलिदान जलते हैं। इसका मतलब है कि यशायाह की क्षमा किसी की कीमत पर आई। यह भावुक क्षमा नहीं, बलिदान-आधारित क्षमा है। और वह जगह जहाँ पाप सबसे ज़्यादा दिखता था, उसके होंठ, ठीक वही जगह है जिसे आग छूती है। परमेश्वर हमारी सबसे शर्मनाक जगह से बचकर नहीं निकलते; वे उसी को छूते हैं और उसी को सेवा का साधन बनाते हैं।
श्रोता
यशायाह के पहले पाठक वे लोग थे जिन्होंने उज्जियाह के लंबे, समृद्ध शासन का अंत देखा और अश्शूर की छाया को उत्तर से बढ़ते देखा। उनके लिए अध्याय के अंत का वह भयानक वाक्य कोई रूपक नहीं था: नगर उजड़ेंगे, घर खाली होंगे, देश सुनसान हो जाएगा। और उन्हें यह भी सुनना पड़ा कि उनका बहरापन परमेश्वर के न्याय का हिस्सा है, कि लगातार सुनने से इनकार करना अंततः सुनने की क्षमता खो देना बन जाता है। परन्तु उसी अंधकार में एक शब्द टिका रहा: "पवित्र वंश उसका ठूँठ ठहरेगा।" कटे हुए पेड़ का ठूँठ। निर्वासन में बैठे लोगों के लिए यह वादा जीवन-रेखा था, और यशायाह की पुस्तक बाद में उसी ठूँठ से एक कोंपल निकलते हुए दिखाएगी।
अंतर्पाठ
यूहन्ना 12 इस अध्याय को सीधे यीशु से जोड़ता है, और चौंकाने वाली बात यह है कि यूहन्ना कठोर होने वाले पद्य को भी उद्धृत करता है: जो लोग यीशु को देखकर विश्वास नहीं करते, वे यशायाह 6 की उसी कहानी में खड़े हैं। सुसमाचार सुनना कभी तटस्थ नहीं होता। दूसरी ओर, प्रकाशितवाक्य 4 में वही "पवित्र, पवित्र, पवित्र" फिर गूँजता है, पर वहाँ सिंहासन के बीच एक मेम्ना खड़ा है, मानो वध किया गया हो। यशायाह ने सिंहासन देखा और मरने का डर महसूस किया; यूहन्ना ने सिंहासन देखा और वहाँ एक बलिदान पाया। वही वेदी, वही आग, परन्तु अब अंगारा हमारे पास आने के लिए स्वयं जल चुका है।
चिंतन
उज्जियाह की मृत्यु का आपका "वर्ष" कौन-सा रहा है, और उस खालीपन में आपने किस सिंहासन को देखा?
आप परमेश्वर के लिए जो करना चाहते हैं, वह क्षमा पाए हुए होंठों से निकलता है, या अपनी योग्यता सिद्ध करने की चाह से?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हे प्रभु, मेरे भीतर भी वही सवाल उठता है, कब तक? कब तक यह इंतज़ार, यह सूनापन, यह चुप्पी? जब जवाब मेरी उम्मीद से अलग हो, तब भी मुझे भागने मत देना। थके मन के साथ ही सही, मैं तेरे सामने खड़ा रहना चाहता हूँ।
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