याकूब 5
पाठ
याकूब अमीरों पर एक भविष्यवक्ता की तरह टूट पड़ते हैं: तुम्हारा सोना-चाँदी सड़ चुका है, और जिन मजदूरों की मजदूरी तुमने रोक ली, उनकी पुकार "सेनाओं के प्रभु के कानों तक पहुँच गई है।" फिर स्वर बदलता है और वे कलीसिया की ओर मुड़ते हैं: किसान की तरह धीरज धरो, प्रभु का आगमन निकट है, एक दूसरे पर दोष न लगाओ, शपथ न खाओ। और अंत में एक प्रार्थना करनेवाली मंडली का चित्र: दुःखी प्रार्थना करे, रोगी प्राचीनों को बुलाए, पापों को एक दूसरे के सामने मान लिया जाए, और भटके हुए को कोई प्रेम से लौटा लाए।
मर्म
यह अध्याय दो चीज़ों को एक साथ पकड़े हुए है जिन्हें हम आमतौर पर अलग रखते हैं: न्याय और करुणा। जो परमेश्वर मजदूर की अनसुनी पुकार सुनते हैं, वही परमेश्वर बीमार पर तेल मलवाकर उसे उठाते हैं। याकूब के लिए परमेश्वर तटस्थ नहीं हैं; वे पक्ष लेते हैं, और उनका पक्ष उसकी ओर है जिसकी आवाज़ दब गई है। यहाँ मुक्ति का अर्थ केवल व्यक्तिगत क्षमा नहीं, बल्कि यह भी है कि इतिहास का हिसाब एक दिन खुलेगा और सही किया जाएगा। इसलिए धीरज कायरता नहीं है, बल्कि इस भरोसे का रूप है कि न्यायाधीश असली है और द्वार पर खड़ा है। कलीसिया इसी बीच के समय में जीती है: प्रार्थना करती, कबूल करती, चंगी होती हुई।
सूत्र-धारा
छठा पद अनजाने में सुसमाचार की छाया बन जाता है: "तुम ने धर्मी को दोषी ठहराकर मार डाला; वह तुम्हारा सामना नहीं करता।" याकूब समाज में सताए गए निर्दोषों की बात कर रहे हैं, लेकिन जो कान यीशु मसीह की कहानी सुन चुके हैं, वे इस वाक्य में एक और आकृति देखते हैं: वह धर्मी जिसे धनवानों और शासकों ने दोषी ठहराया, और जिसने अपना बचाव नहीं किया। और ध्यान दें, यह वही धर्मी है जो अब "प्रभु का आगमन" बनकर लौट रहा है। जिसे दबाया गया, वही न्यायाधीश है। यही पुराने नियम की पूरी धारा का चरम है: अय्यूब का दुःख, भविष्यद्वक्ताओं का दुःख, अनसुनी पुकारें, सब उस एक में इकट्ठा होकर उत्तर पाती हैं जो मरा, जी उठा, और वापस आएगा।
दर्पण
यह अध्याय हमारी दो सबसे शांत आदतों पर उँगली रखता है। पहली: पैसा जो चुपचाप जमा होता रहता है, जबकि किसी और की मेहनत का हिसाब अधूरा रह जाता है। घर की सहायिका, ठेके का कारीगर, वह जूनियर सहकर्मी जिसका काम आपके नाम से गया, वह भुगतान जो "अगले महीने" पर टलता रहा। याकूब कहते हैं, उनकी पुकार आपके कान तक न पहुँची हो, परमेश्वर के कान तक पहुँच गई है। दूसरी: "एक दूसरे पर दोष न लगाओ।" कलीसिया में बुड़बुड़ाना इतना सामान्य है कि हम उसे पाप भी नहीं मानते। और सोलहवाँ पद तो बेधता है: अपने पाप एक दूसरे के सामने मानो। हम आत्म-छवि बचाने में इतने कुशल हैं कि चंगाई का रास्ता ही बंद कर देते हैं।
प्रश्न
पंद्रहवाँ पद कहता है, "विश्वास की प्रार्थना के द्वारा रोगी बच जाएगा।" पर हम सब उन कमरों में खड़े रहे हैं जहाँ तेल मला गया, प्राचीन आए, विश्वास से प्रार्थना हुई, और वह व्यक्ति नहीं बचा। इसे मीठे शब्दों से ढकना बेईमानी होगी, और "तुम्हारे विश्वास में कमी थी" कहना क्रूरता। ध्यान दीजिए, याकूब उसी सन्दर्भ में अय्यूब का नाम लेते हैं, वह आदमी जिसकी प्रार्थनाओं का उत्तर वर्षों तक चुप्पी था, और जिसके अंत में "प्रभु की अत्यन्त करुणा और दया प्रगट होती है।" यानी उत्तर हमेशा तुरंत नहीं आता, और "उठाकर खड़ा करना" पुनरुत्थान तक खिंच सकता है। यह भरोसा माँगता है, गारंटी नहीं देता। मैं इसे रहस्य के रूप में स्वीकार करता हूँ, सूत्र के रूप में नहीं।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का असली मुख्य पात्र वह प्रभु है जिसके दो नाम यहाँ आते हैं: "सेनाओं के प्रभु," जिनके कान मजदूर की पुकार से भरे हैं, और वह प्रभु जो "अत्यन्त करुणा और दया" वाले हैं। यह विभाजित परमेश्वर नहीं है। उनका क्रोध उनकी करुणा से निकलता है; वे इसलिए धनवानों पर गरजते हैं क्योंकि वे लुटे हुए से प्रेम करते हैं। और यह परमेश्वर दूर से आदेश नहीं देते, वे उस धर्मी में स्वयं दोषी ठहराए गए और मारे गए। इसीलिए उनका न्याय पाखंडी नहीं है: वे उसी अन्याय से गुज़रे जिसका वे हिसाब लेंगे। जो चेहरा द्वार पर खड़ा है, वह उसी का है जिसने अपना सामना नहीं किया था।
एक बारीकी
"प्रथम और अन्तिम वर्षा होने तक धीरज धरता है।" फिलिस्तीन के किसान के लिए ये दो निश्चित मौसम थे, बोने के बाद की बरसात और पकने से पहले की। किसान इंतज़ार करता है, पर आशा में, क्योंकि वर्षा उसके हाथ में नहीं है और फिर भी वह आती है। यह छवि आगे चलकर एलिय्याह पर लौटती है, जिसकी प्रार्थना ने आकाश बंद किया और फिर खोला, "और भूमि फलवन्त हुई।" याकूब जोड़ते हैं, वह "हमारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य था।" यानी वही आकाश जो आपके सिर पर बंद लगता है, प्रार्थना के लिए बंद नहीं है। धीरज निष्क्रिय बैठना नहीं, बल्कि उस वर्षा की प्रतीक्षा है जिसे मसीह अपने आगमन में साथ लाएँगे।
चिंतन
किसकी मेहनत या पीड़ा की पुकार मेरे जीवन में अनसुनी पड़ी है, जो परमेश्वर के कानों तक पहुँच चुकी है?
क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जिसके सामने मैं अपना पाप मान सकता हूँ, या मैं अपनी छवि बचाकर चंगाई से बच रहा हूँ?
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James 5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
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James 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
फिर उसने प्रार्थना की, तो आकाश से वर्षा हुई, और भूमि फली।" ध्यान दे, एलिय्याह कोई स्वर्गदूत नहीं था, वह हमारे जैसा ही दुःख-सुख भोगने वाला इंसान था। बारिश आसमान से आई, पर शुरुआत घुटनों पर हुई। तेरे जीवन की जो ज़मीन सालों से सूखी पड़ी है, वह भी फिर से फल दे सकती है। क्या तू प्रार्थना करना छोड़ तो नहीं बैठा?
देखो, किसान पृथ्वी के बहुमूल्य फल की आशा रखता हुआ, प्रथम और अन्तिम वर्षा होने तक धीरज धरता है।"
किसान बीज बो तो सकता है, पर बारिश नहीं करा सकता। उसका धीरज इसी बात में है कि वह आकाश की ओर देखता रहता है। तेरे हाथ में भी सब कुछ नहीं है। जो तू नहीं कर सकता, उसे परमेश्वर के हाथ में छोड़ना ही धीरज है, हार नहीं।
याकूब अपनी पूरी चिट्ठी इसी वाक्य पर खत्म करता है: "जो कोई किसी भटके हुए पापी को उसके भटकाव से फेर लाएगा, वह उसके प्राण को मृत्यु से बचाएगा।" भटका हुआ भाई कोई दूर का अजनबी नहीं, वह तेरी ही मंडली का है। जिसका नाम अभी तेरे मन में आया, तूने शायद उसके बारे में दूसरों से बात की होगी। पर क्या तू कभी उसके पास गया?
तुम आपस में एक दूसरे के सामने अपने-अपने पापों को मान लो और एक दूसरे के लिये प्रार्थना करो, जिससे चंगे हो जाओ।" ध्यान दो, याकूब कहता है एक दूसरे के सामने, न कि सिर्फ परमेश्वर के सामने। छिपा हुआ पाप भीतर सड़ता रहता है। क्या कोई एक व्यक्ति है जो तुम्हारा सच जानता है और फिर भी तुम्हारे लिए प्रार्थना करता है? चंगाई अक्सर वहीं से शुरू होती है।
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