बाइबल व्याख्या

यिर्मयाह 33:3

बाइबल
यह वचन Evanka family द्वारा समर्पित है· स्नेहपूर्ण स्मृति में

पाठ

यिर्मयाह जेल में है। पहरे के आँगन में बन्द, नगर घेर लिया गया है, और उसकी अपनी भविष्यवाणियाँ उसकी बेड़ियों का कारण बनी हैं। ठीक वहीं, दूसरी बार, परमेश्वर का वचन उस तक पहुँचता है। और वह वचन कोई रिहाई का आदेश नहीं, बल्कि एक निमंत्रण है: "मुझसे प्रार्थना कर और मैं तेरी सुनकर तुझे बड़ी-बड़ी और कठिन बातें बताऊँगा जिन्हें तू अभी नहीं समझता।" बोलने वाला अपना परिचय भी देता है, मानो यह ज़रूरी हो कि सुनने वाला जाने कौन बोल रहा है: "यहोवा जो पृथ्वी का रचनेवाला है, जो उसको स्थिर करता है, उसका नाम यहोवा है।" एक बंदी, एक घिरा हुआ शहर, और सृष्टि को थामे रखने वाले का खुला दरवाज़ा।

मर्म

ध्यान दीजिए कि परमेश्वर क्या नहीं कहते। वे यह नहीं कहते कि प्रार्थना करने पर दीवारें गिर जाएँगी या बाबेल की सेना लौट जाएगी। वे कहते हैं कि वे बताएँगे, प्रकट करेंगे, समझ देंगे। "कठिन बातें" के लिए इब्रानी शब्द बत्सुरोत है, जो किलेबंद शहरों के लिए इस्तेमाल होता है: ऐसी बातें जो गढ़ की तरह बंद हैं, जिन तक अपने बल से पहुँचा नहीं जा सकता। यानी परमेश्वर का उत्तर पहले परिस्थिति नहीं, दृष्टि बदलता है। और यह प्रकाशन उसी के हाथ में है जो पृथ्वी का रचनेवाला है और उसे स्थिर रखता है; जो तारों को उनकी जगह पर टिकाए हुए है, वही आपकी उलझन को नाम देने के लिए झुकता है। प्रार्थना यहाँ सौदेबाज़ी नहीं, बल्कि एक बंद गढ़ के सामने खड़े होकर उसके स्वामी को पुकारना है।

सूत्र

यह निमंत्रण हवा में नहीं लटकता। परमेश्वर ने जो "बड़ी-बड़ी और कठिन बातें" बताने का वादा किया, वे अगली पंक्तियों में खुलने लगती हैं: एक उजड़े शहर का चंगा होना, बंदियों की वापसी, और सबसे बढ़कर यह कि "मैं उनको उनके सारे अधर्म और पाप के काम से शुद्ध करूँगा।" फिर भी असली उत्तर आगे है, पद पंद्रह में: "मैं दाऊद के वंश में धार्मिकता की एक डाल लगाऊँगा।" यानी वह गढ़ जो मानव समझ से बंद था, अंततः किसी सिद्धांत से नहीं, एक व्यक्ति से खुलता है, जिसका नाम ही "यहोवा हमारी धार्मिकता" है। यिर्मयाह की कोठरी में दिया गया यह वादा सीधे उस दिन की ओर इशारा करता है जब परमेश्वर ने अपनी सबसे कठिन बात वचन के रूप में नहीं, देह के रूप में बोली।

दर्पण

आप भी शायद किसी बंद आँगन में बैठे हैं। बेटा जो फ़ोन नहीं उठाता, रिपोर्ट जो अगले हफ़्ते आनी है, वह नौकरी जो चली गई और जिसकी जगह अब तक खाली है। और आपकी प्रार्थना, ईमानदारी से कहें तो, एक ही माँग पर अटकी है: दीवार हटाइए। परमेश्वर इस वचन में दीवार हटाने का वादा नहीं करते, और यही वह जगह है जहाँ यह पद चुभता है। पर उससे भी ज़्यादा चुभने वाले शब्द हैं "जिन्हें तू अभी नहीं समझता।" हम में से अधिकांश मान चुके हैं कि हमने अपनी स्थिति को समझ लिया है; हमारा निष्कर्ष तैयार है, बस परमेश्वर की मुहर चाहिए। यह वचन उस निष्कर्ष को विनम्रता से तोड़ता है और कहता है: तुम्हारे पास पूरी तस्वीर नहीं है, और मेरे पास है।

आज एक कागज़ पर वह एक सवाल लिखिए जिसे आप परमेश्वर से पूछना छोड़ चुके हैं, क्योंकि उत्तर कभी नहीं आया। फिर उसे ज़ोर से पढ़िए और जोड़िए: "यह मैं अभी नहीं समझता, आप बताइए।"

अंतर्पाठ

व्यवस्थाविवरण के अंत में मूसा कहता है कि छिपी हुई बातें परमेश्वर की हैं और प्रकट की गई बातें हमारी और हमारी संतान की। यिर्मयाह 33:3 उस सीमा को मिटाता नहीं, पर उसमें एक दरवाज़ा खोलता है: जो छिपा है वह पुकारने पर बाँटा जा सकता है। पौलुस कुरिन्थियों को लिखते समय इसी धारा में खड़ा है, जब वह कहता है कि आँख ने जो नहीं देखा उसे परमेश्वर ने अपने आत्मा के द्वारा हम पर प्रकट किया है। दोनों जगह तर्क एक ही है: मनुष्य अपने विश्लेषण से परमेश्वर के मन तक नहीं चढ़ सकता, पर परमेश्वर स्वयं उतरकर बता सकते हैं। यिर्मयाह को जेल में, पौलुस को क्रूस की मूर्खता में।

प्रश्न

तो क्या हर प्रार्थना का उत्तर आता है? ईमानदारी से: इस पद को एक सार्वभौमिक गारंटी बनाना इसे तोड़ना है। यह वचन एक नबी को, एक विशेष घड़ी में, अपनी वाचा के भीतर दिया गया था। और ध्यान दीजिए कि उत्तर आने पर भी यिर्मयाह बंदी ही रहा; शहर फिर भी जला; "बड़ी-बड़ी बातें" पूरी होने में सत्तर साल लगे, और उनका असली रूप सदियों बाद खुला। यानी परमेश्वर उत्तर देते हैं, पर अपने समय और अपने ढंग से, और कभी-कभी उत्तर हमारे जीवनकाल से बड़ा होता है। यह सांत्वना कड़वी लग सकती है। पर इसका विकल्प यह है कि हम परमेश्वर को अपनी समय-सारणी में बाँध लें, और तब वे परमेश्वर रह ही नहीं जाते।

मुख्य पात्र

इस पाठ का केंद्र यिर्मयाह नहीं, बोलने वाला है। और वह अपना परिचय सृष्टिकर्ता और स्थिर रखने वाले के रूप में देता है, ठीक उस क्षण जब उसका अपना शहर अस्थिर हो रहा है। वही परमेश्वर पद पाँच में क्रोध और जलजलाहट की बात करते हैं और पद छह में चंगाई की; एक ही मुँह से न्याय और दया। यह विरोधाभास नहीं, गहराई है। और सबसे मार्मिक बात यह है कि वे पहल करते हैं। यिर्मयाह ने पुकारा नहीं था; परमेश्वर का वचन "दूसरी बार" उस तक आया और उसे पुकारना सिखाया। जो परमेश्वर प्रार्थना का निमंत्रण स्वयं भेजते हैं, वे सुनने का इरादा पहले से रखते हैं।

मनन के प्रश्न

आपकी वर्तमान परिस्थिति में वह कौन सी बात है जिसके बारे में आप मान चुके हैं कि आप उसे पूरी तरह समझ गए हैं, और क्या होगा यदि आप गलत हैं?

यदि परमेश्वर का उत्तर आपकी परिस्थिति नहीं बदलता, पर आपकी दृष्टि बदल देता है, तो क्या आप उसे उत्तर मानेंगे?

Jeremiah में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Jeremiah

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Jeremiah and Lamentations: An Introduction and Commentary

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Jeremiah, Lamentations

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Jeremiah 33:3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यिर्मयाह 33:3 का क्या अर्थ है?
यिर्मयाह जेल में है। पहरे के आँगन में बन्द, नगर घेर लिया गया है, और उसकी अपनी भविष्यवाणियाँ उसकी बेड़ियों का कारण बनी हैं। ठीक वहीं, दूसरी बार, परमेश्वर का वचन उस तक पहुँचता है। और वह वचन कोई रिहाई का आदेश नहीं, बल्कि एक निमंत्रण है: "मुझसे प्रार्थना कर और मैं तेरी सुनकर तुझे बड़ी-बड़ी और कठिन बातें बताऊँगा जिन्हें तू अभी नहीं समझता।" बोलने वाला अपना परिचय भी देता है, मानो यह ज़रूरी हो कि सुनने वाला जाने कौन बोल रहा है: "यहोवा जो पृथ्वी का रचनेवाला है, जो उसको स्थिर करता है, उसका नाम यहोवा है।" एक बंदी, एक घिरा हुआ शहर, और सृष्टि को थामे रखने वाले का खुला दरवाज़ा।
यिर्मयाह 33:3 किस विषय में है?
यह निमंत्रण हवा में नहीं लटकता। परमेश्वर ने जो "बड़ी-बड़ी और कठिन बातें" बताने का वादा किया, वे अगली पंक्तियों में खुलने लगती हैं: एक उजड़े शहर का चंगा होना, बंदियों की वापसी, और सबसे बढ़कर यह कि "मैं उनको उनके सारे अधर्म और पाप के काम से शुद्ध करूँगा।" फिर भी असली उत्तर आगे है, पद पंद्रह में: "मैं दाऊद के वंश में धार्मिकता की एक डाल लगाऊँगा।" यानी वह गढ़ जो मानव समझ से बंद था, अंततः किसी सिद्धांत से नहीं, एक व्यक्ति से खुलता है, जिसका नाम ही "यहोवा हमारी धार्मिकता" है। यिर्मयाह की कोठरी में दिया गया यह वादा सीधे उस दिन की ओर इशारा करता है जब परमेश्वर ने अपनी सबसे कठिन बात वचन के रूप में नहीं, देह के रूप में बोली।
यिर्मयाह 33:3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज एक कागज़ पर वह एक सवाल लिखिए जिसे आप परमेश्वर से पूछना छोड़ चुके हैं, क्योंकि उत्तर कभी नहीं आया। फिर उसे ज़ोर से पढ़िए और जोड़िए: "यह मैं अभी नहीं समझता, आप बताइए।"
यिर्मयाह 33:3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
तो क्या हर प्रार्थना का उत्तर आता है? ईमानदारी से: इस पद को एक सार्वभौमिक गारंटी बनाना इसे तोड़ना है। यह वचन एक नबी को, एक विशेष घड़ी में, अपनी वाचा के भीतर दिया गया था। और ध्यान दीजिए कि उत्तर आने पर भी यिर्मयाह बंदी ही रहा; शहर फिर भी जला; "बड़ी-बड़ी बातें" पूरी होने में सत्तर साल लगे, और उनका असली रूप सदियों बाद खुला। यानी परमेश्वर उत्तर देते हैं, पर अपने समय और अपने ढंग से, और कभी-कभी उत्तर हमारे जीवनकाल से बड़ा होता है। यह सांत्वना कड़वी लग सकती है। पर इसका विकल्प यह है कि हम परमेश्वर को अपनी समय-सारणी में बाँध लें, और तब वे परमेश्वर रह ही नहीं जाते।
यिर्मयाह 33:3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपकी वर्तमान परिस्थिति में वह कौन सी बात है जिसके बारे में आप मान चुके हैं कि आप उसे पूरी तरह समझ गए हैं, और क्या होगा यदि आप गलत हैं?
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Jeremiah 33 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 4

पिता, जब मेरी बनाई हुई दीवारें गिर जाती हैं और जिन चीज़ों पर मैंने भरोसा किया था वे टूटकर मलबा बन जाती हैं, तब भी तू वहीं खड़ा है। इन खंडहरों के बीच मुझे थाम ले, और मुझे सिखा कि असली सुरक्षा तेरे सिवा कहीं नहीं मिलती।

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